Jantar Mantar Protest News: छात्र आंदोलन और सरकार

Jantar Mantar Protest News: अगर सरकार पहले ही अनशन करने वालों से वार्ता कर लेती, तो आगे की नौबत ही नहीं आती, परन्तु सरकार तो उनलोगों की नोटिस भी लेना मुनासिब नहीं समझी। 

 

अलखदेव प्रसाद ‘अचल’ 

न्यूज इंप्रेशन 

Bihar: इतिहास गवाह है कि जब छात्रों का गुस्सा फूटता है छात्र जब सड़कों पर आ जाते हैं, तो किसी भी सरकार के लिए संभाल पाना काफी मुश्किल हो जाता है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी छात्रों की अहम् भूमिका रही थी और जयप्रकाश नारायण के 1974 के आंदोलन में भी छात्रों की अहम् भूमिका रही थी। जिसकी वजह से कांग्रेस को अपनी सत्ता गंवानी पड़ी थी। वैसे तो फिलहाल जो छात्रों के मन में गुस्सा फूटा है, वह नीट पेपर लीक को लेकर फूटा है। इसके समर्थन में सोनम वांगचुक ने भी दिल्ली के जंतर-मंतर पर आमरण अनशन किया था। जबकि पता नहीं, उन्होंने उसी सरकार के मंत्रियों के हाथों रातों-रात जूस पीकर अपना अनशन क्यों तोड़ दिया? जो एक रहस्य को जन्म भी दे रहा है। आज भी जंतर-मंतर पर आयशा के कुछ साथी आमरण अनशन पर हैं, और कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व कर्ता भी छात्रों के समर्थन में आज भी आंदोलनरत हैं। ऐसा देखकर जब देश भर के छात्रों को यह लगा कि यह आंदोलन सचमुच में हम लोगों के हित के लिए है, तो जैसे ही आह्वान किया गया था कि हमलोग 20 जुलाई को संसद का घेराव करेंगे, तो बिना बुलाए देश के कोने-कोने से लोग जंतर-मंतर पहुंचना शुरू कर दिए थे। फिर पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार हजारों की संख्या में 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर भीड़ उमड़ पड़ी थी और जंतर- मंतर से संसद की ओर वह आंदोलन की भीड़ कूच कर गयी थी। जिसमें मुख्य मांग थी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा की।

सिर्फ सोई हुई सरकार को जगाना 

अगर सरकार पहले ही अनशन करने वालों से वार्ता कर लेती, तो आगे की नौबत ही नहीं आती, परन्तु सरकार तो उनलोगों की नोटिस भी लेना मुनासिब नहीं समझी। तब तो यह सबकुछ होना ही था। वैसे उस आंदोलन में जो भी शामिल थे, वे निहत्थे थे। अगर उन लोगों के हाथों में कुछ थी, तो सिर्फ तख्तियां थीं। क्षयउन लोगों का उद्देश्य तो सिर्फ सोई हुई सरकार को जगाना था। अपनी मांगों को मनवाना था।इसीलिए हाथ में तरह-तरह की मांगों की तख्तियां लेकर संसद की ओर कूच करते जा रहे थे। जहां सरकार सुन भी नहीं रही हो और जाने से रोकवा भी रही हो, तो आंदोलनकारी लौट तो नहीं ही जाते। जब आंदोलनकारी जाने पर उतारू थे, तो सरकार ने उनके प्रदर्शन को दमन करने के लिए न सिर्फ पुलिस वालों को लगा रखी थी, बल्कि कुछ आर एस एस के गुंडों को भी लगा रखी थी। जो सादे लिवास में पुलिस के साथ ही हाथ में डंडे लेकर प्रदर्शनकारियों पर डंडे बरसा रहे थे। ऐसा नहीं था कि प्रदर्शनकारी इतना अधिक उपद्रव कर रहे थे, जैसा पहले कभी नहीं देखा गया हो। जब पुलिस ने लाठियां बरसाई थी, तो लोग लहूलुहान भी हुए थे, खून से लथपथ भी देखे गए थे। जिनके हाथों की हड्डियां भी टूटी थी, एक लड़की तो पुलिस की मार से मर भी गयी थी। जिन्हें मारकर अधमरा किया गया होगा, तो निश्चित रूप से प्रतिरोध में लोग कुछ रोड़े भी चलाएं होंगे।इससे इनकार नहीं किया जा सकता, जो प्रायः हर प्रदर्शन और आंदोलन में होते रहे हैं। इसे अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता।

सरकार पहले उनके बीच से प्रतिनिधि मंडल को बुलवाता रहा

सवाल यहां नहीं है, सवाल वहां है कि आजादी के बाद जब भी कोई धरना प्रदर्शन करता रहा, तो सरकार उनके बीच से प्रतिनिधि मंडल को बुलवाता रहा है। उसकी बातों पर विचार विमर्श करती रही है। परंतु यहां तो जंतर-मंतर पर बीस-बीस, पच्चीस-पच्चीस दिनों तक लगातार लोग आमरण अनशन पर बैठे रहे, परंतु सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंग सकी। वह उनके प्रतिनिधि मंडल से बातें तक नहीं करना चाही कि आखिर आपकी मांगे क्या हैं? उस पर विचार करने में हम कहां तक सक्षम या अक्षम हैं? जो सरकार इतना अहंकारी, निरंकुश और तानाशाह हो, तो फिर जनता भी खामोश कैसे रह सकती है? सरकार का जो रवैया रहा, उससे स्पष्ट है कि यहां कोई आमरण अनशन करते-करते मर भी जाए, तो सरकार को उसकी परवाह नहीं है। तो क्या यही प्रजातंत्र है? भाजपा सरकार बार-बार ‘सबका साथ और सबका विकास की बातें करती रहती है, उसका यही विकास है कि जनता की आवाज सुन भी नहीं सकती है ? सरकार के ऐसे रवैये से तो यही पता चलता है कि उसे जनता सिर्फ वोट दे दे। सरकार क्या करेगी क्या नहीं करेगी ? इस पर जनता सवाल न पूछे। तो प्रजातंत्र में कभी ऐसा होता भी है क्या? कभी ऐसा हुआ है क्या? आंदोलनकारी को दमन कर कुचल देने से आंदोलन समाप्त हो जाता है क्या? ” किसी भी आंदोलन को दमन से जितना ही अधिक कुचला जाता है, आंदोलन उतना ही अधिक विकराल रूप धारण करता जाता है। सत्ता में चूर लोगों को यही बात समझ में नहीं आ रही है। अगर आती, तो जरूर इस पर सरकार विचार करती। सरकार तो बस चाहती है कि हम पुलिस वालों से दमन करवा कर आंदोलन को खत्म कर देंगे, जो संभव नहीं है।

दूसरे राज्यों में भी छात्रों का आंदोलन उफान है मार रहा 

परिणाम यह हुआ छात्रों का यह आंदोलन दर्जनों राज्यों में आग की तरफ फैल गया और उसके बाद रोज दिन इस तरह के छात्रों का आंदोलन उफान मार रहा है और वहां की सरकार सिर्फ पुलिस को आगे कर आंदोलन को कुचलना चाह रही है, जो सरकार की भूल है। ऐसा भी नहीं है कि आंदोलन में सिर्फ विपक्षी पार्टियों के ही घरों के छात्र-छात्राएं हैं,बल्कि इस आंदोलन में वैसे सभी छात्र शामिल हैं, जिन्हें लगता है कि देश में व्याप्त भ्रष्टाचार,बेरोजगारी और आसमान छूती महंगाई का कारण यह सरकार है। यह सर्वविदित है कि भाजपा सरकार में बारह वर्षों के दौरान सैकड़ों बार पेपर लिक हुई है,इसे संयोग कहा जाएगा या प्रयोग। भाजपा की सरकार में बड़े-बड़े पदों पर अपने ही कार्यकर्ताओं को बैठाया जा रहा है।विश्वविद्यालयों के कुलपति, अधिकांश प्रोफेसर अपने ही कार्यकर्ताओं एवं समर्थकों को बनाया जा रहा है।हर विभाग में इस तरह का खेल जारी है।इससे आम पढ़े-लिखे लोगों की अपेक्षाएं कैसे पूरी होगी ? जब शिक्षा विभाग में इतने व्याप्त भ्रष्टाचार है, तो शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगने पर भी सरकार क्यों ख़ामोश है? शायद इसलिए कि सरकार जानती है कि शिक्षा मंत्री के रूप में धर्मेंद्र प्रधान ने जिस तरह से इस विभाग में आर एस एस के एजेंडे को लागू किया है, वैसा धर्मेंद्र प्रधान को छोड़कर नीचता वाला कार्य कोई दूसरा नहीं कर सकता है।

सरकार के नेता और समर्थक आंदोलनकारियों को सोशल मीडिया पर अपशब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं

वैसे यह सरकार लोगों के बीच यह भ्रम फैलाने की कोशिश भी कर रही है। अपने समर्थकों से सोशल मीडिया के माध्यम से यह लगातार ट्रोल करवा रही है कि यह आंदोलन छात्रों का नहीं है, बल्कि विपक्षियों का है, जो सरकार को सिर्फ अस्थिर करना चाहते हैं। विपक्षी पार्टी के लोग ही छात्रों को ऐसा करने के लिए उकसा रहे हैं और उनके साथ खड़े भी हैं। इसमें सच्चाई भी है और सच्चाई रहनी भी चाहिए। क्योंकि कोई भी पार्टी जनता की आवाज बनना चाहती है। फिर अगर विपक्ष इन छात्रों की आवाज बन ही रही है, तो इसमें गलत क्या है? सबसे हास्यास्पद तो यह है कि सरकार आंदोलनकारियों की बातें सुनने के बजाय, उनकी मांगों पर विचार करने के बजाय, उन्हें गुंडे, मवाली और न जाने क्या-क्या कह कर बदनाम करने की साजिश रच रही है। सरकार के कई नेता और समर्थक आंदोलनकारियों को ट्रोल कर सोशल मीडिया पर अपशब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं। तो क्या ऐसा करने से सरकार के प्रति जो लोगों का आक्रोश है, वह शांत हो जाएगा और आंदोलन स्वत: समाप्त हो जाएगा? नहीं तो फिर इसके गंभीर परिणाम किसे अधिक और किसे कम भुगतना पड़ेगा,यह तो आने वाला समय ही बताएगा। परंतु यह तो कहा ही जा सकता है कि आज की सरकार का जो आंदोलनकारियों के प्रति रवैया है, उससे यह साबित होता है कि सरकार फासीवाद के रास्ते पर चल पड़ी है। सरकार को न छात्रों की समस्याओं से मतलब है और न आम जनता की समस्याओं से मतलब है। उसे अगर मतलब है, तो सिर्फ अपनी सत्ता से मतलब है।

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