Rahul Gandhi Raises Questions Over the Manusmriti: दलित–बहुजनों के दुर्दशा का मुख्य कारण : मनुस्मृति की शिक्षाएं !
Rahul Gandhi Raises Questions Over the Manusmriti: मनुस्मृति वर्तमान सत्ताधारी पार्टी के पितृ संगठन आरएसएस वैचारिक आधार है, वह मनुस्मृति राहुल गांधी के सौजन्य से आज चर्चा के शीर्ष पर है. वैसे मनुस्मृति की अमानवीयता को ढेरो लोग लम्बे समय से उजागर करते रहे हैं
एच.एल.दुसाध
न्यूज इंप्रेशन
Lucknow: राहुल गांधी ने आधी आबादी और दलितों की दुर्दशा के लिए: मनुस्मृति पर खड़े किए सवाल जो मनुस्मृति वर्तमान सत्ताधारी पार्टी के पितृ संगठन आरएसएस वैचारिक आधार है, वह मनुस्मृति राहुल गांधी के सौजन्य से आज चर्चा के शीर्ष पर है. वैसे मनुस्मृति की अमानवीयता को ढेरो लोग लम्बे समय से उजागर करते रहे हैं, किन्तु 22 अगस्त को पुणे ‘छात्रों की गूंज’ प्रोग्राम राहुल गांधी ने जिस शालीनता से आधी आबादी की दुर्दशा के लिए मनुस्मृति को जिम्मेवार ठहराया, वह सकते में डालने वाला रहा. पुणे में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के दौरान ‘मनुस्मृति’ और उस पर आधारित पितृसत्तात्मक सोच पर तीखा हमला बोलते हुए उन्होंने कहा था कि महिलाएं किसी की संपत्ति नहीं हैं और वे अपने पिता, पति या पुत्र की अधीनता में रहने के लिए नहीं बनी हैं, बल्कि उनका अपना स्वतंत्र वजूद होता है। उन्होंने मनुस्मृति के एक श्लोक (9.3) का हवाला देते हुए कहा था कि इसमें महिलाओं को बचपन में पिता, युवावस्था में पति और पति की मृत्यु के बाद पुत्र के अधीन रहने की बात कही गई है, जिसे उन्होंने महिलाओं की स्वतंत्रता के खिलाफ और शर्मनाक बताया. उन्होंने छात्रों से पितृसत्ता (patriarchy) को तोड़ने और ऐसी पुरानी सोच को खारिज करने का आह्वान किया था। पुणे से मनुस्मृति के खिलाफ उठी आग अभी ठंढी भी नहीं हुई थी कि राहुल गांधी ने 29 अगस्त को दिल्ली में हल्द्वानी शुद्धिकरण मामले पर प्रेस कांफ्रेंस करके संघ- भाजपा को और आक्रोशित कर दिया. अगर पुणे के छात्रों की गूँज के केंद्र में मनुस्मृति की शिकार आधी आबादी रही , तो 29 अगस्त के दिल्ली प्रेस कांफ्रेंस के केंद्र में दलित! 29 अगस्त को राहुल गांधी ने हल्द्वानी के रामलीला मैदान में मल्लिकार्जुन खड़गे की जनसभा के बाद हुई ‘शुद्धिकरण’ की घटना की निंदा करते हुए कहा था ,’ देश में दो विचारधाराओं के बीच लड़ाई चल रही है. एक जो जाति के आधार पर भेदभाव और उंच-नीच को जिन्दा रखना चाहती है अर्थात मनुस्मृति की विचारधारा. दूसरी, जो संविधान के आधार पर समानता और सम्मान की लड़ाई लड़ रही है. देश में हर दलित व्यक्ति का जन्म से मृत्यु तक , हर जगह ,हर कदम ,अपमान किया जाता है. दलितों को गाँव के कुएं में पानी नहीं पीने दिया जाता , स्कूलों में दलित बच्चों से सफाई कराई जाती है, ये अपराध बीजेपी- आरएसएस करवाते हैं. एक दलित व्यक्ति जितना अधिक सफल होता है , उस पर उतने ही अधिक हिंसक हमले होते है. कारोड़ों लोगों के साथ यह हर दिन होता है. जब हमारे राजस्थान सीएलपी(कांग्रेस विधायक दल ) के नेता टीकाराम जूली किसी मंदिर में जाते हैं, तो भाजपा के नेता शुद्धिकरण अनुष्ठान करते हैं. जब बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी किसी मंदिर में जाते है, तो वहां भी शुद्धिकरण किया जाता है. जब कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे , जिन्होंने अपना पूरा जीवन देश की सेवा में समर्पित कर दिया , जव वे हल्द्वानी के रामलीला मैदान में भाषण देने जाते हैं तो वहां भी शुद्धिकरण किया जाता है. यह सब भाजपा- आरएसएस के लोग करते हैं , और यह भारत के संविधान के अनुसार अपराध है. ऐसे में जो लोग 10 अगस्त के शुद्धिकरण में शामिल रहे उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हो. हम कांग्रेस अध्यक्ष के लिए न्याय की मांग करते हैं.यह केंद्र और राज्य सरकारों का कर्तव्य है कि वे सुनिश्चित करें कि खडगे को न्याय मिले!’ राहुल गांधी ने 29 अगस्त के अपने प्रेस कांफ्रेंस में जूली, मांझी , खडगे जैसे लोगों के साथ होने वाले भेदभाव को उजागर कर दुनिया को सकते में डाल दिया है.21 वीं सदी में कैसे किसी सभी देश का नागरिक विश्वास करेगा कि राजनीति और व्यक्तिगत जीवन में सफलता की बुलंदियों को छूने वाले मांझी, जूली, खड्गे के स्पर्श से मंदिर से लेकर रामलीला मैदान जैसे सार्वजनिक स्थल दूषित हो जाते हैं, जिसके लिए संघ- भाजपा से जुड़े लोगों को ‘शुद्धिकरण’ का अनुष्ठान आयोजित करना पड़ता है. लेकिन यह अप्रिय सचाई है जिसका आज भी दलितों को सामना करना पड़ता है. ऐसा क्यों होता है, इसकी खोज के लिए सुदूर अतीत में जाना होगा, जब दुनिया के दूसरे अंचलों में भी दलितों जैसे मानव समुदायों का वजूद था, जिनके साथ वहां प्रभु वर्ग बीजेपी- आरएसएस के लोगों की भांति ही शोषण- उत्पीड़न और अमानवीय व्यवहार करने का अभ्यस्त था!
गुलामों का सबसे अभागा समुदाय : दलित
दुनिया के जिन मानव समुदायों को शोषण-उत्पीड़न और क्रूरतम व्यवहार का शिकार बनना पड़ा वे हैं, प्राचीन रोम और आधुनिक अमेरिका के गुलाम तथा भारत के दलित. लेकिन प्राचीन रोम के गुलाम जहां इतिहास के पन्नों की वस्तु बनकर रह गए हैं, वहीँ अमेरिका के नीग्रों गुलामों के लिए वहां के गोरे प्रभु-वर्ग द्वारा शोषण-उत्पीड़न भी अतीत का विषय बनकर रह गया है. कल के काले गुलाम आज सप्लायर , डीलर, ठेकेदार, मैनुफैक्चरर्स इत्यादि बनकर उद्योग-व्यापर के क्षेत्र में नया अध्याय रच रहे हैं. वे हालीवुड में बड़े राइटर्स, स्टार्स, डायरेक्टर, प्रोड्यूसर के रूप में अपनी सबल उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं, तो खेल-कूद, म्यूजिक इत्यादि में अमेरिका की खास पहचान उन्हीं से ही है.इन्हीं गुलामों में से किसी की संतान अमेरिका का प्रेसिडेंट पद तक को सुशोभित कर चूका है.पर, भारत के गुलामों(अस्पृश्यों) के विषय में यह दावा नहीं किया जा सकता. वे मानव सभ्यता के विकास और तमाम संवैधानिक सुरक्षा के बावजूद आज भी हिन्दुत्ववादियों का शोषण-उत्पीड़न झेलने के लिए अभिशप्त हैं. बहरहाल जिन लोगों का पशुवत इस्तेमाल कर मानवता को शर्मसार किया गया उनमें एकमात्र अभागे दलित हैं, जिनके शोषण-उत्पीड़न और अवनति में धर्म की सबसे जोरदार भूमिका रही, ऐसा डॉ. आंबेडकर का मानना है. इसके पक्ष में जो उन्होंने युक्ति खड़ा किया है, उसे बाबा साहेब डॉ.आंबेडकर सम्पूर्ण वांग्मय में खंड -9 के पृष्ठ 141-148 पर पढ़ा जा सकता है.
हिन्दुओं में क्यों नहीं है विवेक : डॉ. आंबेडकर
अपनी बात की शुरुआत करते हुए डॉ.आंबेडकर लिखते हैं –‘जिन परिस्थितियों में हिन्दुओं ने अस्पृश्यों के विरुद्ध हिंसा तक का सहारा लिया है, वे परिस्थितियां सभी को समान स्वतंत्रता की चाहत की रही हैं. अगर अस्पृश्य अपना जुलूस निकालना चाहते हैं, तब उन्हें हिन्दुओं द्वारा जुलूस निकालने पर कोई ऐतराज नहीं होता . अगर अस्पृश्य सोने और चांदी के जेवर पहनना चाहते है, तब हिन्दुओं को भी वैसा अधिकार रहे, इस पर वे कोई ऐतराज नहीं करते. अगर अस्पृश्य अपने बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिलाना चाहते हैं ,तब वे हिन्दुओं के बच्चों को शिक्षा की पूरी आजादी देने का विरोध नहीं करते . अगर अस्पृश्य कुएं से पानी भरना चाहते हैं , तब हिन्दुओं द्वारा पानी भरने के अधिकार का उपयोग किये जाने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती. इन सबका कोई अंत नहीं है, यहाँ इन्हें गिनाने की जरुरत नहीं है. सीधी सी बात है, वह यह कि अस्पृश्य जो स्वतंत्रता चाहते हैं, वह सिर्फ अपने लिए नहीं है, और वह हिन्दुओं के समान स्वतंत्रता के अधिकार से भीं नहीं है. तब हिन्दू ऐसी इच्छाओं को जो किसी को हानि नहीं पहुंचाती और जो पूर्णतः न्यायसंगत है , अमल में न आने देने के लिए हिंसा पर क्यों उतर आते हैं ? हिन्दू अपने अन्याय को न्यायसंगत क्यों मानते हैं? कौन यह इनकार कर सकता है कि अस्पृश्यों के साथ हिन्दुओं के व्यवहार में जो कुछ अपकर्म होता है, उसे सामाजिक अपराध के अतिरिक्त और कोई संज्ञा नहीं दी जा सकती. यह मनुष्य की मनुष्य के प्रति घोर अमानवीयता है . अगर किसी डॉक्टर के द्वारा मरीज का इसलिए इलाज न करना कि मरीज अस्पृश्य है: अगर हिन्दुओं के एक गिरोह द्वारा अस्पृश्यों के घरों को जला डालना , अगर अस्पृश्यों के कुँओं में मैला डलवा देना अमानवीय कार्य नहीं है, तब मैं सोचता हूँ यह और क्या है? प्रश्न यह है कि हिन्दुओं में विवेक क्यों नहीं है?
इन प्रश्नों का एक ही उत्तर है. अन्य देशों में वर्ग आर्थिक और सामाजिक दृष्टि के आधार पर बने. गुलामों और खेतिहर गुलामों की धर्म में कोई व्यवस्था नहीं थी. इसकी अपेक्षा अस्पृश्यता मुख्यतः धर्म पर आधारित है, हालांकि इससे हिन्दुओं को आर्थिक लाभ होता है. जब कभी आर्थिक या सामाजिक हित की बात होती है, तब कुछ भी पवित्र या अपवित्र नहीं होता. गुलाम – प्रथा और खेतिहर गुलाम-प्रथा क्योंकर मिट गयी और अस्पृश्यता क्यों कर नहीं मिटी, इसका यही स्पष्ट कारण है. दो अन्य प्रश्नों का भी यही उत्तर है. अगर हिन्दू अस्पृश्यता का पालन करते हैं तो इसलिए कि उनका धर्म उसे ऐसा करने का आदेश देता है. अगर उसकी इस स्थापित व्यवस्था के विरुद्ध उठाने वाले अस्पृश्यों का वह नृशंसता और अन्यायपूर्वक दमन करता है, तब उसका कारण उसका अपना धर्म है, जो उसे केवल इस बात की ही शिक्षा नहीं देता कि यह स्थापित व्यवस्था दैवीय विधान है और इसलिए पावन है, बल्कि उस पर यह सुनिश्चित करने का कर्तव्य भी आरोपित करता है कि उसे इस स्थापित व्यवस्था को हर संभव उपाय से कायम रखना है. अगर वह मानवता की पुकार को नहीं सुनता, तब उसका कारण यह है कि उसका धर्म अस्पृश्यों को मानव समझने के लिए उसे बाध्य नहीं करता. अगर अस्पृश्यों को मारने-पीटने, उनके घरों को लूटने तथा जलाने और उनपर अत्याचार करते समय उसे अपने विवेक का कुछ भी ध्यान नहीं रहता, तब उसका कारण यह है कि उसका धर्म उसे इस बात की शिक्षा देता है कि इस सामाजिक व्यवस्था की सुरक्षा करने के लिए किया गया कोई भी कर्म पाप नहीं है.
दलितों के दुर्भाग्य का मुख्य कारण : हिन्दू धर्म और उसकी शिक्षाएं
वस्तुतः इस बारे में और अधिक तूल देने के कोई आवश्यकता नहीं . यह निर्विवाद है कि अस्पृश्यों के दुर्भाग्य का मुख्य कारण हिन्दू धर्म और उसकी शिक्षाएं हैं. जहाँ तक गुलाम-प्रथा का सम्बन्ध गैर-इसाई धर्म व इसाई धर्म और अस्पृश्यता का संबंध हिन्दू-धर्म से है. इन दोनों के बीच तुलना करने से यह पता चल जायेगा कि इन दोनों धर्मों का मानव संस्थाओं पर कितना भिन्न-भिन्न प्रभाव पड़ा है. अगर पहले धर्म से मानव समाज का उत्थान हुआ, तो हिन्दू धर्म के कारण मानव समाज का कितना अधिक पतन हुआ. जो लोग अकसर गुलाम –प्रथा के साथ अस्पृश्यता की तुलना करते हैं, वे यह नहीं सोचते कि वे विरोधी स्थितियों की परस्पर तुलना कर रहे हैं. कानून के अनुसार गुलाम स्वतंत्र व्यक्ति नहीं थे , तो भी सामाजिक दृष्टि से उन्हें वह सारी स्वतंत्रता प्राप्त थी , जो उनके व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक थीं. इनकी अपेक्षा एक अस्पृश्य व्यक्ति कानून के अनुसार स्वतंत्र व्यक्ति तो है, फिर भी सामाजिक तौर पर उसे अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए कोई भी स्वतंत्रता प्राप्त नहीं थी .
यह निश्चय ही विरोधपूर्ण स्थिति है, जो साफ़ नजर आती है. इस विरोध पूर्ण स्थिति का क्या कारण है? इसका एक ही कारण , और वह यह कि वहां धर्म गुलामों के पक्ष में था, जब कि यहां यह अस्पृश्यों के विपक्ष में है. रोम के क़ानून में यह घोषित किया गया कि गुलाम की कोई व्यक्तिगत सत्ता नहीं है. लेकिन रोम के धर्म ने इस सिद्धांत को कभी भी स्वीकार नहीं किया. और उस सिद्धांत को किसी भी हालत में सामाजिक क्षेत्र में लागू करना स्वीकार नहीं किया. उसने गुलाम को मित्र होने योग्य समझकर उसके साथ मानवोचित व्यवहार किया. हिन्दू कानून में यह घोषित किया गया कि अस्पृश्य का कोई व्यक्तित्व नहीं है. गैर-इसाई धर्म के विपरीत, हिन्दू धर्म ने इस सिद्धांत को स्वीकार ही नहीं किया, बल्कि उसे सामाजिक क्षेत्र में लागू भी कर दिया . चूँकि हिन्दू कानून ने अस्पृश्य का कोई व्यक्तित्व स्वीकार नहीं किया, इसलिए हिन्दू धर्म उसे मानव नहीं माना कि वह मित्रता के योग्य हो सकता है.’ अस्पृश्यों की दुर्दशा के मूल में हिन्दू धर्म कि क्रियाशीलता को प्रमाणित करने के बाद डॉ.आंबेडकर आगे बताते हैं कि किस तरह धर्म ने रोम और अमेरिका के गुलामों के व्यक्तित्व के विकास में सहायता की. इतना सब बताने के बाद शेष में निष्कर्ष देते हुए कहते हैं-‘संक्षेप में कहा जा सकता कि कानून और धर्म दो ऐसे तत्व हैं जो व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करते हैं. कभी-कभी तो उनका चोली-दामन का साथ होता है और कभी वे एक दूसरे की खामियों को सुधारने का काम भी करते हैं. इन दोनों तत्वों में कानून का संबंध व्यक्ति से है, जब कि धर्म निर्वैक्तिक होता है. कानून क्योंकि व्यक्ति पर आधारित है, इसलिए वह अन्याय और असमानता का कारण हो सकता है. परन्तु धर्म के साथ यह बात नहीं है, इसलिए वह निष्पक्ष रह सकता है. यदि धर्म निष्पक्ष होगा, तो वह कानूनी असमानता को दूर करने की क्षमता रखता है. रोम में गुलामों के संबंध में ऐसा ही हुआ. इसी कारण धर्म के विषय में कहा जाता है कि वह मनुष्य को उदात्त बनाने के लिए है, न कि उसे अवनत करने के लिए. हिन्दू धर्म एक अपवाद है. इसने अस्पृश्यों को अधः प्राणी बना दिया. इसने हिन्दू को अमानुषिक बना दिया. इस अधः प्राणी की स्थापित व्यवस्था से और न अमानुषिकता से ही त्राण पाने का कोई उपाय दीखता है.’
दलित-आदिवासी–पिछड़ों और आधी आबादी की दुर्दशा के लिए जिम्मेवार: मनुस्मृति की शिक्षाएं
डॉ. आंबेडकर ने दलितों की शोषण-उत्पीड़न और अवनति के पृष्ठ में हिन्दू धर्म की क्रियाशीलता का उपरोक्त तथ्य बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में प्रस्तुत किया था.लेकिन अस्पृश्यों को मुक्त करने की दिशा में आंबेडकर के ऐतिहासिक प्रयासों के बावजूद इक्कीसवीं सदी में भी स्थिति में खूब बदलाव नहीं आया है. वे आज भी उन स्वतंत्रताओं का इस्तेमाल अबाध रूप से नहीं कर सकते जिनका उपभोग करने का हिन्दू अभ्यस्त हैं. वे आज भी अमेरिका के काले गुलामों की भांति सप्लायर, डीलर, मीडिया कर्मी, फ़िल्मकार इत्यादि बनने का दुसाहसपूर्ण सपना नहीं देख सकते.आज दलित भले ही संविधान के जोर से राष्ट्रपति बन जाए, लेकिन जाति परिचय देकर मंदिरों में ईश्वर की कृपा- लाभ के लिए नहीं जा सकता. अगर मंदिरों में प्रवेश कर भी जाए तो बाद उसके लिए शुद्धिकरण का अनुष्ठान करना पड़ता है.इसके लिए जिम्मेवार है हिन्दू धर्म निर्मित प्रभु वर्ग की मानसिकता. लेकिन हिन्दू धर्म का इतना ही अपराध नहीं है कि इसने हिंदुत्ववादियों में मानवता-विरोधी सोच कूंट-कूंट कर भर दिया है: इसका सबसे बड़ा अपराध तो यह है कि इसने दलितों के साथ आदिवासी, पिछड़ों और महिलाओं के रूप में आधी आबादी को चिरकाल के लिए शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक इत्यादि) से दूर धकेल कर इन्हें गुलामों से भी बदतर हालात में पहुंचा दिया है. इसके ऐसा करने पर देश लगभग 93 प्रतिशत मानव संसाधन से चिरकाल के लिए महरूम हो गया और हम डेढ़ हजार सालों तक विदेशियों की गुलामी झेलने के लिए अभिशप्त हुए. भारी आश्चर्य का विषय है कि ऐसे हिन्दू –धर्म की ठेकेदार बनी भाजपा का देश पर अप्रतिरोध्य शासन हो गया है और व्यक्तिगत स्वार्थवश इससे जुड़ने के लिए ढेरों दलित- बहुजन प्रतिभाएं एक दूसरे से होड़ लगा रही हैं.बहरहाल दलित , आदिवासी, पिछड़े और आधी आबादी को हजारों साल से शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत गुलामों की स्थिति में बने रहने के यदि हिन्दू धर्म और शिक्षाए जिम्मेवार हैं तो एकल रूप से सर्वाधिक जिम्मेवार हैं मनुस्मृति की शिक्षाएं.उम्मीद है राहुल गांधी द्वारा मनुस्मृति पर सवाल खड़े करने के बाद विवेकवान हिन्दू मनुस्मृति की बहुजन संहारक शिक्षाओं से राष्ट्र को अवगत कराने के लिए सामने आएंगे!
( लेखक उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के विचार विभाग के चेयरमैन हैं )
