Manvata Bnam Manuvadi: क्या मोदी राज में मानवतावाद को निगलने जा रहा है मनुवाद !

Manvata Bnam Manuvadi: मनुवादी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके गुण के बजाय जाति से करते हैं. वे भाग्यवाद , पुनर्जन्मवाद में विश्वास करते हैं. जन्म के आधार पर द्विजों/ ब्राहमणों को श्रेष्ठ और अन्य जातियों को निकृष्ट समझते हैं. इस कसौटी पर भारत की कोई भी जाति मनुवादी मानसिकता से मुक्त नहीं है

लेखक: एचएल दुसाध

Delhi: क्या मोदी राज में मनुवाद, मानवतावाद को निगलने जा रहा है? हाल के दिनों में ऐसी कुछ घटनाओं का सैलाब आया है , जिससे किसी के भी मन में यह सवाल उठ सकता है. बहरहाल आने वाले दिनों में मनुवाद मानवतावाद को कितनी चुनौती देने जा रहा है, इसका आंकलन करने के पहले मनु और मानवतावाद में क्या फर्क है, इसके विषय में जानना जरुरी है. आमतौर पर माना जाता है कि मनुवाद और मानवतावाद दो सामाजिक और दार्शनिक विचार है, जहाँ एक असमानता का समर्थन करता है तो दूसरा सबको समान मानता है. जहाँ तक मनुवाद का सवाल है, मनुवाद उस प्राचीन व्यवस्था या विचारधारा को कहते हैं जो महर्षि मनु और मनुस्मृति के नियमों पर आधारित है. इस विचारधारा के पोषकों को मनुवादी कहते हैं. आमतौर मनुवादी के तौर पर उच्च वर्ण के लोग ही ज्यादा जाने जाते हैं, लेकिन सचाई है यह है कि चार वर्ण से जाति/उपजाति के कई हजार भागों में विभाजित हिन्दू समाज के हर जाति/उपजाति का स्त्री-पुरुष ही मनुवादी सोच से ग्रसित रहा है . चूँकि मनुवादी व्यवस्था में दलित, पिछड़े, महिलाएं शक्ति के स्रोतों से लगभग पूरी तरह बहिष्कृत रहे इसलिए उनका मनुवाद समाज में बदनाम नहीं हुआ. लेकिन सच्चाई है कि ये सभी मनुवादी ही हैं. मनुवादी की पहचान है जाति आधारित उंच- नीच, पितृसत्ता, और जन्म आधारित सामाजिक भेदभाव का समर्थन करना और धार्मिक रुढियों और परम्पराओं के प्रति दुर्बलता पोषण करना. मनुवादी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके गुण के बजाय जाति से करते हैं. वे भाग्यवाद , पुनर्जन्मवाद में विश्वास करते हैं. जन्म के आधार पर द्विजों/ ब्राहमणों को श्रेष्ठ और अन्य जातियों को निकृष्ट समझते हैं. इस कसौटी पर भारत की कोई भी जाति मनुवादी मानसिकता से मुक्त नहीं है. मनुवादी व्यवस्था द्वारा सदियों से शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत कर गुलामों की दशा में पहुंचे दलित – बहुजन जातियों के लोग अपने से कथित निम्नतर जातियों के प्रति सम्मान का भाव नहीं रखते . सैकड़ों में जातियों में बंटे खुद दलित तक एक दूसरे के प्रति हिकारत का भाव पोषण करते है. और तो और दलित अपनी ही जाति के निम्नतर स्थिति में पड़े उपजाति को पूरी मनुष्य का दर्जा देने में कोताही बरतते हैं. बहरहाल पहले जहाँ प्रायः शत प्रतिशत हिन्दू ही इस मानसिकता से ग्रसित रहे, वहीँ आज भारी संख्यक हिन्दू काफी हद तक मनुवाद से मुक्त होकर मानवतावादी हो गए हैं. ऐसे लोग जाति, धर्म, लिंग के भेदभाव के बिना सभी मनुष्यों के समान अधिकारों की वकालत करते हैं. वे लोगों के कष्टों को कम करने और जीवन की गुणवत्ता(भौतिक सुख-सुविधाओं) को बेहतर बनाने के लिए प्रयास करते हैं. वे सामान्यतया अलौकिक या ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते, बल्कि इस जीवन को महत्वपूर्ण मानते हैं!

मनुवाद से मानवतावाद की ओर अग्रसर हुआ : भारत

मनुवादी भारतीयों का मानवतावाद के पथ पर सफ़र भारतीय रेनेसां (पुनर्जागरण) काल (मुख्यतः 19वीं सदी) से शुरू हुआ, जिसकी पहलकदमी उस दौर के भारतीय महापुरुषों : राजा राममोहन राय ,स्वामी विवेवेकानन्द , ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, दयानंद सरस्वती , रविन्द्रनाथ टैगोर, हेनरी विवियन डिरोजियो, केशव चन्द्र सेन, पंडिता रमाबाई, ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले इत्यादि ने की. महान समाज सुधारकों का उदय आकस्मिक नहीं, बल्कि तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक, बौद्धिक और औपनिवेशिक परिस्थितियों का परिणाम था. यह वह दौर था जब भारतीय समाज धर्म-जनित सदियों पुरानी रूढ़ियों, कुरीतियों और अंधविश्वासों में जकड़ा हुआ था. सती, विधवाओं की दयनीय स्थिति, अछूत प्रथा, और गंगा प्रवाह (शिशु हत्या का एक रूप) के अलावा, समाज कई अन्य रूढ़ियों से ग्रसित था ! इन अमानवीय प्रथाओं के खिलाफ कुछ प्रबुद्ध भारतीयों की आत्मा जागी और वे समाज सुधारक बने. ब्रिटिश शासन के साथ-साथ पश्चिमी शिक्षा, विज्ञान, और तर्कवाद (Rationalism) का प्रसार हुआ। अंग्रेजी पढ़ने वाले भारतीयों ने मानववाद, स्वतंत्रता, समानता और लोकतंत्र के पश्चिमी विचारों को समझा, जिसने उन्हें भारतीय समाज की कुरीतियों पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित किया. ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन और हिंदू धर्म की आलोचना ने भी भारतीय बुद्धिजीवियों को सचेत किया. उन्होंने महसूस किया कि धर्म के भीतर से ही रूढ़ियों को खत्म करना आवश्यक है, जिससे पुनर्जागरण की शुरुआत हुई. प्रेस के विस्तार के कारण पुनर्जागरण काल के समाज सुधारक अपने विचारों को अखबारों, पत्रिकाओं और किताबों के माध्यम से जनता तक आसानी से पहुँचा सके, जिससे जनचेतना जागी. 19वीं सदी के पुनर्जागरण काल में सिर्फ उच्च वर्गों में ही नहीं दलित और पिछड़े समाजों में जन्मे कई दूरदर्शी समाज सुधारकों का उदय हुआ , जिन्होंने जाति-आधारित भेदभाव, छुआछूत और अशिक्षा के खिलाफ संग्राम चलाया. इस काल के दलित – बहुजन समाजों में जन्मे प्रमुख समाज सुधारक रहे : महात्मा ज्योतिबा फुले, साबित्री बाई फुले, नारायण गुरु, अय्यंकली , गोपाल बाबा वालंगकर, संग गाडगे महाराज , डॉ. आंबेडकर इत्यादि! भारतीय रेनेसां (पुनर्जागरण) काल में राजा राममोहन राय ,स्वामी विवेवेकानन्द , ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, दयानंद सरस्वती , रविन्द्रनाथ टैगोर, हेनरी विवियन डिरोजियो, केशव चन्द्र सेन, पंडिता रमाबाई, ज्योतिबा फुले, बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर इत्यादि जैसे जिन महापुरुषों ने अपने जन्म और कृतित्व से भारतभूमि पर मानवतावाद को बुलंदी प्रदान किया, उन्हीं की कड़ी में एक रहे महात्मा गांधी, जिन्होंने भारत में मानवतावाद को एक नई उंचाई दी. ब्रिटिश शासन से भारत की स्वतंत्रता के सफल अभियान का नेतृत्व करने वाले महात्मा गांधी ने अहिंसक प्रतिरोध का प्रयोग करके दुनिया भर में नागरिक अधिकारों और स्वतंत्रता के आंदोलनों को प्रेरित किया!

मनुवादी व्यवस्था का हिमायती : संघ

भारतीय पुनर्जागरण के गर्भ से निकले महात्मा गांधी का अन्दोलन देश के कोटि-कोटि लोगों को अहिंसात्मक स्वाधीनता आन्दोलन से जुड़ने और धार्मिक- रुढियों से मुक्त होकर मानवतावाद की राह पर चलने के लिए प्रेरित किया . अगर भारतीय पुनर्जागरण से निकला मानवतावाद और गाँधी के नेतृत्व में चला भारत का स्वाधीनता आन्दोलन किसी को नहीं के बराबर स्पर्श कर सका तो, वह थे हिन्दू राष्ट्र के प्रति समर्पित हिन्दुत्ववादी ! यह भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी कही जाएगी कि महात्मा गांधी के स्वाधीनता आन्दोलन के समान्तर भारत में हिंदुत्ववादी आन्दोलन सावरकर , हेडगेवार और हिन्दू महासभा के नेतृत्व में विकसित हुआ,जिसे बुलंदी प्रदान किया आरएसएस ने. संघ की गतिविधियाँ हिन्दू राष्ट्र के निर्माण और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर केन्द्रित रहीं . सांस्कृतिक राष्ट्रवाद वह विचार है जो राष्ट्र की पहचान को केवल राजनीतिक सीमाओं या भूगोल से न जोड़कर उसकी प्राचीन संस्कृति , सभ्यता ,परम्पराओं और जीवन मूल्यों से जोड़ता है.बहरहाल इतिहास में विचरण करने पर पता चलता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा आज़ादी की प्रत्यक्ष लड़ाई (जैसे कांग्रेस के आंदोलन) के बजाय हिंदू राष्ट्र निर्माण और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का रास्ता चुनने के पीछे कई वैचारिक और रणनीतिक कारण थे, जिनमें प्रमुख रहा हिन्दू राष्ट्र की आड़ में कर्म आधारित वर्ण- व्यवस्था के जरिये देश को परिचालित करने की रणनीति!

अधिकांश विद्वानों के मुताबिक़ हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा, जिसे हिंदुत्व के रूप में भी जाना , भारत में एक राजनीतिक विचारधारा है जो हिन्दू धर्म-संस्कृति और पहचान पर आधारित एक राष्ट्र राज्य की स्थापना की वकालत करती है. इसके पीछे की आर्थिक सामजिक सोच में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता पर जोर , पारम्परिक मूल्यों का संरक्षण , और एक मजबूत , एकीकृत हिन्दू समुदाय का निर्माण करना है. कुल मिलाकर हिन्दू राष्ट्र के पीछे क्रियाशील सामाजिक- आर्थिक सोच को जमीन पर उतारने के लिए हजारों साल पुरानी वर्ण – व्यवस्था अर्थात मनुवादी – व्यवस्था को लागू करना संघ का लक्ष्य रहा है. मनुवादी – व्यवस्था के ज़रिये ही संघ हिन्दू राष्ट्र में अपनी सामाजिक- आर्थिक सोच को जमीन पर उतारना चाहता है, इसका संकेत हिंदुत्व के महानायक सौ साल से अधिक समय से दे रहे हैं. आज से शताधिक वर्ष पूर्व हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को परिभाषित करने वाले विनायक दामोदर सावरकर ने इस बात पर जोर दिया था कि राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था पश्चिम से उधार ली गई अवधारणाओं के बजाय प्राचीन देशी विचारों पर आधारित होनी चाहिए . जाहिर है उन्होंने वर्ण- व्यवस्था उर्फ़ मनुवाद आधारित प्राचीन हिन्दू व्यवस्था द्वारा राजनीतिक- आर्थिक व्यवस्था परिचालित करने का निर्देश दिया था . हिन्दू राष्ट्र के अग्रणी विचारक प्रो. बिनॉय कुमार सरकार ने 1920 के आसपास अपनी पुस्तक ‘ बिल्डिंग ऑफ़ हिन्दू राष्ट्र ‘ में हिन्दू राज्य की संरचना और हिन्दू राज्य की सामाजिक – आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था के लिए जो दिशा निर्देश प्रस्तुत किया था वह कौटिल्य , मनु और शुक्र जैसे विचारकों और महाभारत पर आधारित था. जाहिर है सरकार महोदय ने भी मनुवादी सामाजिक- आर्थिक व्यवस्था की कामना की थी . प्राचीन मनुवादी – व्यवस्था द्वारा ही भविष्य के भारत की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था चले,  इसके प्रबल पैरोकार ‘ बंच ऑफ़ थॉट्स ‘ के लेखक और आरएसएस के दूसरे प्रमुख एमएस गोलवलकर भी रहे. जिनकी आर्थिक सोच पर भाजपाइयों के गर्व का अंत नहीं है, ‘एकात्म मानववाद’ के रूप में भारतीय जनसंघ और आज की भाजपा के राजनीतिक दर्शन को सामने लाने वाले उस पंडित दींन दयाल उपाध्याय ने सामाजिक- आर्थिक मुक्ति के साधन के रूप में साम्यवाद और पूंजीवाद को अस्वीकार करते कहा था कि हिन्दुओं की आर्थिक मुक्ति, भारतीय संस्कृति और मूल्यों पर आधारित एक न्यायसंगत और आत्मनिर्भर आर्थिक प्रणाली के माध्यम से ही संभव हो सकती है! स्पष्ट है कि पंडित उपाध्याय भी मनुवादी – व्यवस्थाधारित सामाजिक- आर्थिक व्यवस्था की कामना किये थे. हिंदुत्व के प्रातः स्मरणीय इन मनीषियों की सोच का प्रतिबिम्बन ही संघ के हिन्दू राष्ट्र की सामाजिक – आर्थिक सोच में हुआ है. सरल शब्दों में कहा जाय हिन्दू –राष्ट्र की आड़ में संघ का हिडेन एजेंडा मनुवादी- व्यवस्था लागू करना रहा है. हिन्दू राष्ट्र का असल एजेंडा मनुवादी अर्थात कर्म आधारित वर्ण- व्यवस्था लागू करना है, इसकी गवाही हिंदुत्व के पुरोधाओं के विचार ही नहीं , 2025 के कुम्भ में जारी हिन्दू राष्ट्र का मसौदा भी देता है!

2025 में सामने आया हिन्दू राष्ट्र का मसविदा स्पष्ट करता है कि उसका सर्वोच्च उद्देश्य हजारों वर्ष पूर्व की उस वर्णाश्रम – व्यवस्था अर्थात मनुवादी – व्यवस्था की पुनर्स्थापना है, जिस मनुवादी व्यवस्था के कारण कभी दलित घर से बाहर निकलते समय अपना पद- चिन्ह मिटाने के लिए कमर में झाड़ू और थूकने के लिए गले में हँड़िया बांधकर चलते थे: लिखना – पढना , राजनीति में शिरकत करना जिनके लिए अधर्म रहा.यह वही मनुवादी व्यवस्था थी जिसके कारण सती-प्रथा के तहत महापंडित राहुल सांकृत्यायन के मुताबिक सवा करोड़ नारियों को अग्नि-दग्ध कर मार डाला गया; विधवा प्रथा के तहत कोटि –कोटि नारियों की यौन कामना को बर्फ की सिल्लियों में तब्दील कर दिया गया तो बालिका विवाह प्रथा के तहत अरबों बच्चियों को बाल्यावस्था से सीधे युवावस्था में उछाल दिया गया. इसी मनुवादी मानसिकता के कारण जब अखिलेश यादव जैसा शूद्र मुख्यमंत्री आवास छोड़ता है तो उसका शुद्धिकरण किया जाता है.यह वही मनुवादी व्यवस्था है, जिसमें शक्ति के समस्त स्रोत- आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक- प्रायः शत प्रतिशन तीन उच्च वर्ण के पुरुषों के लिए आरक्षित रहे! यही वह मनुवादी सोच है जिसके कारण हल्द्वानी के जिस मैदान में देश के सबसे कद्दावर दलित नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने सभा किया , उसका हिन्दुत्ववादियों द्वारा शुद्धिकरण किया गया. इस सोच से प्रेरित सितम्बर के दूसरे सप्ताह तक ऐसी कई घटनाएँ सामने आई हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि भारत में मनुवाद, मानवतावाद को निगल जायेगा!

सितम्बर 2026 में सामने आया : मनुवाद का तांडव

4 सितम्बर को खुद को कट्टर हिन्दू कहने और मुल्ला- मुक्त भारत का सपना देखने वाले मीडिया इन्फ़्लुएन्सर स्वतंत्र भरद्वाज का एक डरावना वीडियों सामने आया ,जिसमें उसने दावा किया था कि उसने जून में जंतर-मंतर पर सीजेपी के आन्दोलन के दौरान दलित कार्यकर्त्ता निशु आजाद के पिता का सिर फोड़ डाला था, लेकिन अपने राजनीतिक संपर्कों के चलते गिरफ्तारी से बच गया. उसने खुद को चिराग पासवान और कपिल शर्मा तथा प्रधानमंत्री मोदी को अपना बड़ा भाई बताया था . उस विडयो ने पूरे देश को सकते में डाल दिया था. बाद में निशु आजाद की शिकायत पर 5 सितम्बर को उसकी गिरफ्तारी हुई लेकिन लोगों को चौकाते हुए कुछ दिन बाद ही 15 सितम्बर को उसको 3 सप्ताह की अंतरिम जमानत भी मिल गई. इससे पूरा देश हैरान है, क्योंकि लोग यह मानकर चल रहे थे कि उसकी जमानत नहीं हो पायेगी. बहरहाल जमानत पर छूट कर आने के बाद उसका एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमे वह दलित- पिछड़ों को कीड़ा – मकोड़ा और खुद को ब्राह्मण शेर बताते हुए आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर आज़ाद को देख लेने की धमकी देता नजर आ रहा है. हालाँकि जमानत पर छूटने की एक बड़ी शर्त यह भी कि वह मीडिया में कोई बयान जारी नहीं करेगा. उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के रहने वाले बर्तन व्यापारी और सामाजिक कार्यकर्त्ता विनोद साहनी को 9 सितम्बर को बुरी तरह पीटा गया , जिससे अगले दिन उसकी मौत हो गई. उन्होंने फेसबुक पर कथित तौर पर कुछ विवादित और आपत्तिजनक पोस्ट किये थे,जिसके बाद जब वह 9 सितम्बर की रात दूकान बंद कर वापस आ रहे थे, उच्च जाति के 8-10 लोगों ने उन्हें रास्ते में घेरकर लाठी-डंडों से पीट- पीट कर लहुलुहान कर दिया, जिससे अगले दिन उनकी मौत हो गई. विनोद साहनी पहले सपा में थे ,उसके बाद वह आज़ाद समाज पार्टी में आ गए.उनके बच्चों के मुताबिक वंचित वर्गों पर उच्च वर्ण के लोगों के अत्याचार-अनाचार के खिलाफ वह काफी मुखर रहते थे. यही उनके मौत का कारण बन गया. उनके मौत के आरोप में गिरफ्तार सभी लोग अपर कास्ट के हैं. 11 सितम्बर को दलित उत्पीड़न की एक भयावह घटना सोशल मीडिया के जरिये देश की राजधानी में सामने आई.वायरल विडियो के मुताबिक 10 सितम्बर की शाम मुंडका से बीजेपी के विधायक गजेंद्र दराल ने उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के कंझावला के बीजेपी मंडल अध्यक्ष सुनील कुमार को मीटिंग के बहाने वोटर लिस्ट लेकर बीजेपी कार्यालय बुलाया . आरोप है कि वहां सुनील को बंधक बनाकर रातभर पाइप, डंडे और बेल्टों से बेरहमी से पीटा गया. मारपीट के दौरान सीसीटीवी कैमरे बंद कर दिए गए और कार्यालय को अंदर से लॉक कर दिया गया. आरोप है कि सुनील को गाली – गलौच और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया गया तथा कपडे उतारकर पीटा जिससे उनके शरीर की खाल तक फट गई.पीड़ित परिवार और विपक्षी पार्टियों के भारी विरोध प्रदर्शन के बाद 15 सितम्बर को कंझावला थाने में विधायक गजेन्द्र दराल व अन्य के खिलाफ एससी /एसटी एक्ट, आर्म्स एक्ट इत्यादि के तहत मामला दर्ज हो पाया.

हांल ही में लखीमपुर खीरी जिले से एक बेहद गंभीर और चौकाने वाला मामला सामने आया है, जहाँ एक सरकारी उच्च प्राथमिक विद्यालय में कक्षा 8 के एक दलित छात्र को उसकी शिक्षिका द्वारा जातिगत रूप से प्रताड़ित करने का आरोप लगा है. शिक्षिका पर आरोप लगा है कि उसने छात्र को जाति सूचक शब्द ‘भंगी’ कहे . उसे छूने से मना किया और सरकारी किताबें देने से इनकार कर स्कूल से भगा दिया. छात्र का रोते हुए 10 से 12 सितम्बर के बीच सोशल मीडिया पर एक विडिओ वायरल हुआ, जिससे यह घटना प्रकाश में आई! 18 सितम्बर को इस लेख को पूरा किये जाने के पूर्व 17 सितम्बर को दो ऐसी ख़बरें प्रकाश में आईं जो इस बात को पुख्ता करती हैं कि देश में मनुवाद का नंगा नाच चल रहा है.17 सितम्बर को रायबरेली के अभिषेक ठाकुर का वीडियो सामने आया है जिसमे वह भीम आर्मी और दलितों को चुन-चुनकर मारने की धमकी देता नजर आ रहा है. कांग्रेस के दिग्गज नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के विरुद्ध हुए ‘शुद्धिकरण’ कांड का असर मनुवादियों पर नहीं पड़ा, इसका बड़ा साक्ष्य 8 सितम्बर तेलेंगाना के सिद्दिपेट जिले में मिला. वहां बीआरएस नेताओं और समर्थकों ने उस रास्ते का हल्दी का पानी और दूध छिड़क कर ‘शुद्धिकरण’ किया, जहाँ से दलित कार्यकर्ताओं और कांग्रेस नेताओं ने विरोध प्रदर्शन करते हुए मार्च किया था. इस मामले में 15 सितम्बर को 7 बीआरएस नेताओं को गिरफ्तार किया गया. लेकिन ‘शुद्धिकरण’ विचारधारा में विश्वास करने वालों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा और 17 सितम्बर को कोलकाता जैसे प्रगतिशील महानगर से इस किस्म की एक और घटना की खबर आ गई, जिसमें बताया गया है कि 2007 वहां के सुरेन्द्रनाथ कॉलेज में वाइस प्रिंसिपल और शिक्षक- प्रभारी के रूप में कार्यरत मोहम्मदी तरन्नुम को इस्तीफे के पत्र पर जबरन हस्ताक्षर कराया गया. इसके पहले छात्रों ने उन्हें उनके ही कार्यालय में 23 घंटे घेरकर रखा था. पुलिस सुरक्षा में उनके वहां से जाने के बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के नेतृत्व में छात्रों के एक समूह ने उनके चैम्बर में अगर बत्तियां जला और गंगा जल छिड़ककर चैम्बर का ‘शुद्धिकरण’ किया. इसके पहले स्वाधीनता संग्राम के दौरान ढेरों क्रान्तिकारी देने वाले जादवपुर यूनिवर्सिटी के गेट नम्बर चार के पास साधुओं और नागा साधुओं का जुलुस निकाला गया. जुलुस का नाम दिया गया था ‘गेरुआ सम्मान यात्रा’. 3 किलोमीटर लम्बे इस मार्च का नेतृत्व पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने किया था. जादवपुर यूनिवर्सिटी परिसर में वामपंथी छात्र संगठनों और संघ जुड़े एबीवीपी के मध्य चल रहे विवाद और झड़पों के विरोध में इस मार्च का आयोजन किया गया था.

मनुवाद के समक्ष बेबस : मानवतावाद

बहरहाल उपरोक्त घटनाओं के आधार पर दावे से कहा जा सकता है कि सितम्बर 2026 के पहले पखवाड़े तक मनुवाद के समक्ष मानवतावाद बुरी तरह असहाय रहा. ऐसा नहीं कि मानवतावाद को असहाय करने वाली घटनाएँ उपरोक्त घटनाओं तक सिमित रहीं : नहीं, रोजाना ऐसी अन्य कई घटनाएँ भी हुईं ,जिनका स्थानाभाव में इस लेख में उल्लेख करना संभव नहीं. एक बात यह भी है कि जिन्होंने सितम्बर के पूर्वार्द्ध में अपनी मनुवादी सोच के चलते मानवतावाद को क्षतिग्रस्त किया ,उनमें प्रायः सभी ही संघ- भाजपा और उनके आनुषांगिक संगठनों से सम्बद्ध लोग रहे. ऐसे में दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि संघ के परोक्ष समर्थन से पुष्ट होकर ही स्वतंत्र भरद्वाज , गजेंद्र दराल, अभिषेक ठाकुर , शुभेंदु अधिकारी, एबीवीपी के छात्रों इत्यादि ने सितंबर को डरावना माह बनाया. इसे समझने के लिए सत्य हिंदी के पत्रकार मुकेश कुमार की उस टिपण्णी पर ध्यान देना होगा,जिसमें उन्होंने स्वतंत्र भारद्वाज जैसों को ‘हिन्दू आतंकवाद’ और संघ समर्थित तत्वों से जोड़ा था, जिसे लेकर मीडिया पर काफी बहस हुई थी. 4 सितम्बर को उन्होंने एक्स पर लिखा था,’ ये हिन्दू आतंकवाद नहीं है तो क्या है? अगर हिटलर के जर्मनी से चाहें तो गेस्टापो का शब्द भी इनके लिए हो सकता है. ये संघ परिवार की फैक्ट्री में निर्मित हत्यारे दस्ते हैं.इसलिए मोदी से लेकर भागवत तक सब चुप हैं. अगर इस तरह की भाषा किसी दूसरे धर्म के मानने ने बोली होती तो उसका इनकाउंटर कर दिया जाता !’ लेकिन स्वतंत्र भारद्वाजों को पता है ,उनका इनकाउंटर तो दूर लम्बी जेल भी नहीं हो सकती.इसलिए वे अंतरिम जमानत पर आकर फिर दलित-पिछड़ों की कीड़े-मकोड़ों से तुलना करते हुए उनको ललकारने की हिमायत करने लगते हैं. इस विषय में राहुल गांधी का यह बयान भी काबिले गौर है,जो उन्होंने हल्द्वानी शुद्धिकरण घटना के बाद दिया था . उन्होंने कहा था ,’ देश में हर दलित व्यक्ति का जन्म से मृत्यु तक , हर जगह ,हर कदम ,अपमान किया जाता है. दलितों को गाँव के कुएं में पानी नहीं पीने दिया जाता , स्कूलों में दलित बच्चों से सफाई कराई जाती है, ये अपराध बीजेपी- आरएसएस करवाते हैं. एक दलित व्यक्ति जितना अधिक सफल होता है , उस पर उतने ही अधिक हिंसक हमले होते है. करोड़ों लोगों के साथ यह हर दिन होता है. जब हमारे राजस्थान सीएलपी(कांग्रेस विधायक दल ) के नेता टीकाराम जूली किसी मंदिर में जाते हैं, तो भाजपा के नेता शुद्धिकरण अनुष्ठान करते हैं. जब बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी किसी मंदिर में जाते है, तो वहां भी शुद्धिकरण किया जाता है. जब कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे , जिन्होंने अपना पूरा जीवन देश की सेवा में समर्पित कर दिया , जव वे हल्द्वानी के रामलीला मैदान में भाषण देने जाते हैं तो वहां भी शुद्धिकरण किया जाता है. यह सब भाजपा- आरएसएस के लोग करते हैं!’

बहरहाल देश ने इस सितम्बर के पहले पखवाड़े में मनुवाद का जो तांडव देखा है, उसके पृष्ठ में संघ- भाजपा की क्रियाशीलता को चिन्हित करने के लिए पत्रकार मुकेश कुमार या राहुल गांधी के बयानों का सहारा लेने की कोई जरुरत नहीं. जिसके पास थोड़ी भी सामाजिक-राजनीतिक समझ है, वह बड़ी आसानी से उपलब्धि कर लेगा कि संघ ने इस देश में मनुवादी व्यवस्था लागू करने के लिए हिन्दू युवाओं को एक बर्बर दस्ते के रूप में तब्दील कर दिया है, जो राजसत्ता का परोक्ष समर्थन पाकर मानवता को असहाय कर दिए हैं. ऐसे में अब कोई संदेह नहीं रहना चाहिए कि आज मनुवाद ,मानवतावाद को निगलने जा रहा है, जिसकी झलक इस सितम्बर ने दिखा दिया है. अब यक्ष प्रश्न पैदा होता है कि मनुवाद के मानवताग्रासी रूप अख्तियार करते दौर में कैसे मानवतावाद की रक्षा की जाय! इसके लिए एक ही उपाय नजर आ रहा है किसी विशुद्ध मानवता नेता के नेतृत्व में मानवतावादियों को लामबंद कर चैम्पियन मनुवादी संघ के खिलाफ आरपार की वैचारिक लड़ाई छेड़ी जाय. लेकिन एक ऐसे दौर में जबकि संघ का राजनीतिक संगठन भाजपा इडी , सीबीआई इत्यादि संवैधानिक संस्थाओं का दुरूपयोग कर विपक्षी नेताओं को या तो अपने पाले में कर लिया है या उनकी जुबान बंद कर दिया है, किसी विशुद्ध मानवतावादी नेता की तलाश कठिन हो गई है . ऐसे निराशा भरे दौर में ले दे हमारी नजरें राहुल गांधी पर टिक जाती है.

राहुल गांधी : 21वीं के चैम्पियन मानवतावादी

इसमें कोई शक नहीं कि मानवतावाद की कसौटी पर नेता राहुल गांधी का कोई जोड़ नहीं है. उनका समस्त क्रियाकलाप उन्हें 21वीं के चैम्पियन मानवतावादी नेता के रूप में स्थापित कर दिया है. अगर मानवतावादी की यही कसौटी हैं कि ऐसे लोग जाति, धर्म, लिंग के भेदभाव के बिना सभी मनुष्यों के समान अधिकारों की वकालत करते हैं तथा वे लोगों के कष्टों को कम करने और जीवन की गुणवत्ता(भौतिक सुख-सुविधाओं) को बेहतर बनाने के लिए प्रयास करते हैं तो इस इस कसौटी पर वह आधुनिक भारत के श्रेष्ठ मानवतावादियों: महात्मा गांधी- आंबेडकर और नेहरु की कतार में दीखते हैं. इससे भी बड़ी बात है कि संघ के सौ सालों के इतिहास में उन्होंने खुद को चैम्पियन संघ- विरोधी साबित कर दिया है. राहुल गांधी के विरोधी तक मानते हैं संघ- भाजपा के खिलाफ जो इमानदार संघर्ष राहुल गांधी ने चलाया है, वैसा संघ के सौ सालों के इतिहास में और कोई नहीं कर पाया. संघ अपने जिस राजनीतिक संगठन के जोर से भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने के करीब पहुँच गया है, राहुल गांधी उसे घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिए है. चुनाव आयोग के सहारे किसी तरह सत्ता में टिके नॉन- बायोलिजिकल प्रधानमंत्री मोदी आज राहुल गांधी से खौफजदा होकर देश को चुनावी निरंकुशता (Electoral Autocracy ) वाले देशों की श्रेणी में पहुंचा दिया है. लोकतांत्रिक मूल्यों का अध्ययन करने वाले अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के मुताबिक, ’चुनावी लोकतंत्र‘ के रूप में मशहूर भारत की स्थिति अब उतनी ही निरंकुश देश की हो चली है, जितनी कि उसके पड़ोसी देश पकिस्तान की है. लेकिन चैम्पियन संघ विरोधी के रूप में राहल गांधी की सबसे बड़ी भूमिका है, वह यह है कि उन्होंने संघ- भाजपा के सामाजिक- आर्थिक सोच की सबसे कारगर काट ढूंढ ली है! आमतौर संघ- विरोधी चिन्तक इस बात की चर्चा नहीं करते कि तमाम राजनीतिक-सामाजिक संगठनों की तरह संघ-भाजपा का भी एक विशेष सामाजिक- आर्थिक सोच है, जिसे वह हिन्दू राष्ट्र में कर्मआधारित वर्ण- व्यवस्था के ज़रिए जमीन पर उतारना चाहता है. हिन्दू धर्म में अंध आस्था के कारण संघ की समस्त गतिविधियों का प्रधान लक्ष्य शक्ति के समस्त स्रोत – आर्थिक. राजनीतिक शैक्षिक , धार्मिक – उच्च वर्ण पुरुषों के हाथ में सौपना है तथा दलित.आदिवासी .पिछडों और आधी आबादी को उस स्टेज में पहचाना जिसमें बने रहने का निदेश हिन्दू धर्मशास्त्र देते हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि शक्ति के स्रनोतों के भोग का धर्मसम्मत अधिकार सिर्फ सवर्ण पुरुषों को है: विपरीत इसके दलित, आदिवासी ,पिछड़े और महिलाओं का शक्ति के स्रोतों का भोग अधर्म है!, अपनी इस सामाजिक- आर्थिक सोच को जमीन पर उतारने के लिए ही वह धर्माधारित वर्ण- व्यवस्था का विधान लागा करना चाहता है. सौ सालों के संघ के इतिहास में उसकी सामाजिक-आर्थिक सोच की कारगर काट लेकर कोर्ड सामने आया है तो वह मानवतावादी राहल गांधी ही हैं उन्होंने शक्ति के समस्त स्रोतों और सहित ‘पॉवर सेक्टर’ में ‘जितनी आबादी – उतना हक’ के जरिये संघ- भाजपा के सामाजिक – आर्थिक सोच. जिसे जमीन पर उतारने के लिए वह हिन्दू राष्ट्र स्थापित करना चाहता है, की अभूतपूर्व काट पैदा कर दी है. उन्होंने शक्ति के समस्त स्रोतों सहित पॉवर सेक्टर में’ जितनी आबादी – उतना हक ‘ लाग करने के निरंतर आह्नन के जरिये उन्होंने एक कशल मनोचिकित्सक की भांति मनु्वादी व्यवस्था के गुलामों की सार्डक में बडा बदलाव ला दिया है और उनमें देश की टॉप 10 कंपनियों में जगह बनाने, अस्पताल खोलने , वीसी डत्यादि बनने सहित बडा ठेकेदार. सप्लायर डत्यादि बनने की चाह कुंडली मारने लगी है. और सत्ता में आने पर कांग्रेस ‘ जितनी आबादी – उतना हक'” सिद्धांत लाग् कर दालेत आदिवासी, पिछडों में उभरी उच्चाकांक्षा को जमीन पर उतारने का अवसर देगी. डसके प्रति ढेरों लोग आशावादी हो चले हैं. बहरहाल आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक इत्यादि तमाम क्षेत्रों में राहल गांधी का ‘जितनी आबादी , उतना हक’ सिद्धांत मनवादी व्यवस्था के वंचितों को प्राडवेट कंपनियों. अस्पतालों . अख़बारों – चैनलों क मालिक और मैनेजर : यूनिवर्सिटियों वीसी, बड़े लेवल के ठेकेदार , सप्लायर इत्यादि तो बनाएगा ही, यह सिद्धांत सामाजिक- आर्थिक विषमताजन्य समस्त समस्यायों से देश को निजात भी दिला सकता है. ऐसे में सवाल पैदा होता है कि इस सितम्बर में मनवाद का मानवताग्रासी रूप देखने के बाद क्या दलित, आदिवासी , पिछडे,आधी आबादी और धार्मिक अल्पसंख्यक 21 वीं सदी के चैम्पियन मानवतावादी राहल गांधी के पीछे लामबंद होने का मन बनायेंगे!

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