Indira Gandhi Death Anniversary: लोकतंत्र को सामाजिक क्रांति का धारदार हथियार बनाने वालीं विरल नेत्री इंदिरा गांधी

Indira Gandhi Death Anniversary: 31 अक्टूबर है : भारत रत्न इंदिरा गांधी का शहादत दिवस ! आज ही के दिन 1984 में  नई दिल्ली  के सफदरगंज रोड स्थित उनके आवास पर सुबह 9:30 बजे ऑपरेशन ब्लूस्टार  के बाद उनके दो अंगरक्षकों : बेअंत सिंह  और सतवंत सिंह  ने गोली मार कर उनकी हत्या की थी।

 

लेखक: एचएल दुसाध

Delhi : 31 अक्टूबर है : भारत रत्न इंदिरा गांधी का शहादत दिवस ! आज ही के दिन 1984 में  नई दिल्ली  के सफदरगंज रोड स्थित उनके आवास पर सुबह 9:30 बजे ऑपरेशन ब्लूस्टार  के बाद उनके दो अंगरक्षकों : बेअंत सिंह  और सतवंत सिंह  ने गोली मार कर उनकी हत्या की थी। ऑपरेशन ब्लूस्टार एक भारतीय सैन्य अभियान था, जो 1 से 8 जून, 1984 के बीच किया गया था। यह आदेश पंजाब के  अमृतसर  में  हरमिंदर साहिब परिसर की इमारतों से सिख उग्रवादी नेता  जनरैल सिंह भिंडरवाले और उनके सशस्त्र अनुयायियों को हटाने के लिए  इंदिरा गांधी  ने दिया था।  पवित्र मंदिर पर सैन्य कार्यवाही की दुनिया भर के सिखों ने आलोचना की थी।ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद प्रधानमंत्री गाँधी के जीवन पर खतरे की धारणा बढ़ गई थी। तद्नुसार, हत्या-प्रयास के डर से आसूचना ब्यूरो  द्वारा सिखों को उसके निजी अंगरक्षक टुकड़ी से हटा दिया गया था। हालाँकि, इंदिरा गाँधी की राय थी कि इससे उनकी सिख विरोधी छवि जनता के बीच मज़बूत होगी और उनके राजनीतिक विरोधियों को मज़बूती मिलेगी। अतः उन्होंने  विशेष सुरक्षा दल  को अपने सिख अंगरक्षकों को फिर से बहाल करने का आदेश दिया, जिसमें बेअंत सिंह भी शामिल थे! 31 अक्टूबर ,1984 को इंदिरा जी की शहादत के बाद पूरे विश्व में गहरा शोक व्यक्त किया गया था. वैश्विक नेताओं ने उनकी हत्या को कायरतापूर्ण और आतंकवाद की कृत्य बताते हुए उनकी दृढ इच्छाशक्ति , अद्वितीय साहस और दूरदर्शी नेतृत्व की सराहना की थी.

 इंदिरा गाँधी : स्वतंत्रता संग्राम से निकली बेमिसाल नेत्री इंदिरा गांधी भी अपने पूर्ववर्तियों की भांति स्वतंत्रता संग्राम से निकली हुई नेत्री थीं. शुरू से स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय इंदिरा गांधी ने बचपन में बाल-चरखा संघ की स्थापना कीं और असहयोग आन्दोलन के दौरान कांग्रेस पार्टी की सहायता के लिए 1930 में बच्चों के सहयोग से ‘वानर- सेना का निर्माण किया. सितम्बर 1942 में उन्हें जेल में डाल दिया गया. 1947 में इन्होने गांधी जी के मार्ग दर्शन में दंगा प्रभावित क्षेत्रों में काम किया. इंदिरा गाँधी 1966 से 1977 तक लगातार तीन पारी के लिए के लिए भारत गणराज्य का प्रधानमंत्री रहीं. और उसके बाद चौथी पारी में 1980 से लेकर 1984 में उनकी हत्या तक भारत की प्रधानमंत्री रहीं. स्वाधीन भारत के इतिहास में एक मात्र महिला प्रधानमंत्री बनने का गौरव उनके ही नाम है. 16 वर्ष तक देश की प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी के शासन काल में कई उतार- चढाव आए. उन्हें 1975 में आपातकाल और 1984 में सिख दंगा जैसे कई मुद्दों पर भारी विरोध झेलना पड़ा. बावजूद इसके रुसी क्रांति के साल में जन्मीं इंदिरा गाँधी ने अपने कार्यकाल में जैसे क्रन्तिकारी निर्णय लिए, उसका कोई जवाब नहीं है. उनके 1971 के बांग्लादेश युद्ध में विश्व शक्तियों के सामने न झुकने के नीतिगत और समयानुकूल निर्णय क्षमता से पाकिस्तान को पराजित किया और बांग्लादेश को मुक्ति दिलाकर स्वतंत्र भारत को एक नया गौरवपूर्ण क्षण दिलवाया! ऐतिहासिक बांग्लादेश युद्ध 3 दिसम्बर, 1971 को भारत ने पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली मुसलमानों और हिन्दुओं को बचाने के पकिस्तान के साथ युद्ध करने का फैसला किया. यह युद्ध 13 दिनों तक चला. उसके बाद भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश की अंतरिम सरकारों के बीच एक लिखित फैसला हुआ , जिससे बांग्लादेश मुक्ति युद्ध समाप्त हो गया. इस युद्ध में 93 हजार पाकिस्तानी सैनिको को घुटने टेकने पर मजबूर किया. यह एक विश्व रिकॉर्ड था. इसके पूर्व आधुनिक विश्व में इतनी भारी संख्या में किसी भी देश ने शत्रु देश के सैनिकों को आत्म समर्पण के लिए मजबूर नहीं किया. युद्ध के समय स्वाधीनता आन्दोलन से निकले दलित नेता रक्षा मंत्री थे.उन्होंने जिस तरह युद्ध के दौरान रक्षा मंत्री के रूप अपनी भूमिका अदा किया, पूरी दुनिया में उनकी सराहना हुई.

भारत एक सर्वोच्च शक्ति के रूप में उभरा

‘भारत को बांग्लादेश युद्ध से कई फायदे हुए. दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन बदल गया, जिससे भारत एक सर्वोच्च शक्ति के रूप में उभरा. गंभीर शरणार्थी समाया सुलझा लिया गया और 1 करोड़ शरणार्थियों को शीघ्रतापूर्वक बिना किसी रुकावट के उनके घरों में बांग्लादेश भेज दिया गया. इसने 1962 में मिली अपमानजनक पराजय की याद को धो दिया और भारत खोया गौरव और आत्मसम्मान फिर से प्राप्त हो गया. भारत ने न केवल अपने एक मुश्किल पडोसी को पराजित किया था, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा में अपनी विदेश नीति की स्वाधीनता को भी उजागर कर दिया.उसने यह दिखा दिया कि भारत यदि अभी एक विश्वशक्ति नहीं भी हो तो भी दुनिया के रंगमंच पर कमजोर राजनीतिक हस्ती नहीं रहा. बांग्लादेश युद्ध सही अर्थों में इंदिरा गांधी की एक व्यक्तिगत जीत थी . उनकी दृढ़ता,कठोर निश्चय एवं पूरे संकट के दौरान उन्होंने जो बेहतरीन नेतृत्वकारी गुणों के प्रदर्शन किया था,उसक भारतीय लोग सराहना करने लगे. उनकी लोकप्रियता आसमान छूने लगी और विभिन्न देशों में भारत और उनकी खुद की प्रतिष्ठा काफी बढ़ गयी. वे अपनी शक्ति और गौरव के चरम शिखर थीं. अनेक भारतीय उनकी चर्चा आधुनिक काल की दुर्गा और शक्ति के अवतार के रूप में करने लगे.’( स्रोत : आजादी के बाद का भारत, पृष्ट- 325.). बहरहाल बांग्लादेश युद्ध से मिली शक्ति और समर्थन से पुष्ट होकर इंदिरा गांधी कई क्रांतिकारी निर्णय लेने की दिशा में आगे बढ़ी, जो भारत के नव निर्माण में मील का पत्थर साबित हुए!

अपने दौर में विश्व की सबसे साहसिक नेत्री : इंदिरा गाँधी

1960 और 1970 का दशक वैश्विक स्तर पर समाजवाद और आर्थिक राष्ट्रवाद (Economic Nationalism) का दौर था। इस दौरान इंदिरा गांधी द्वारा भारत में बैंकों, एलआईसी (बीमा क्षेत्र), कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण और राजाओं के प्रिवीपर्स का खात्मा जैसे फैसले निश्चित रूप से भारत के इतिहास में बेहद साहसिक और युगांतरकारी थे।हालांकि, अगर वैश्विक संदर्भ में देखा जाए, तो उसी दौर में दुनिया के कई अन्य शासकों ने भी अपने-अपने देशों में इसी तरह के आक्रामक और जोखिम भरे राष्ट्रीयकरण के निर्णय लिए थे।उस दौर के कुछ प्रमुख वैश्विक शासकों और उनके फैसलों की तुलना नीचे दी गई है!

1970 में चिली के राष्ट्रपति बनने के बाद, साल्वाडोर अलेंदे ने देश के सबसे बड़े आर्थिक स्रोत—तांबे की खदानों (Copper Mines) का पूरी तरह से राष्ट्रीयकरण कर दिया। ये खदानें अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण में थीं। इसके अलावा उन्होंने विदेशी बैंकों और बड़े उद्योगों का भी सरकारीकरण किया।जोखिम और परिणाम: अमेरिकी हितों को सीधी चुनौती देने के कारण अमेरिकी खुफिया एजेंसी (CIA) के समर्थन से चिली में सैन्य तख्तापलट हुआ, जिसमें 1973 में अलेंदे को अपनी जान गंवानी पड़ी। यह इंदिरा गांधी के फैसलों से भी अधिक जोखिम भरा वैश्विक कदम था।1969 में सत्ता में आते ही मुअम्मर गद्दाफी गद्दाफी ने लीबिया में सक्रिय ब्रिटिश और अमेरिकी तेल कंपनियों का जबरन राष्ट्रीयकरण कर दिया और विदेशी सैन्य अड्डों को देश से बाहर निकाल दिया।परिणाम स्वरूप इस साहसिक आर्थिक राष्ट्रवाद ने लीबिया को रातों-रात एक बेहद अमीर देश बना दिया, लेकिन गद्दाफी पश्चिमी देशों के निशाने पर आ गए। ठीक उसी दौर (1972 से 1977) में इंदिरा गांधी से प्रेरित होकर भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान में जुल्फिकार अली भुट्टो ने ‘इस्लामी समाजवाद’ के तहत एक झटके में देश के 10 बड़े बुनियादी उद्योगों, जीवन बीमा, निजी बैंकों और जहाजरानी (Shipping) का राष्ट्रीयकरण कर दिया था。यह कदम हूबहू इंदिरा गांधी की आर्थिक नीतियों जैसा ही था, जिसने वहां के बड़े पूंजीपति घरानों (जैसे दाऊद और सहगल समूह) की कमर तोड़ दी थी।पूंजीवादी देश होने के बावजूद, ब्रिटेन की कंजर्वेटिव (दक्षिणपंथी) सरकार के प्रधानमंत्री एडवर्ड हीथ ने 1971 में देश की प्रतिष्ठित लेकिन दिवालिया हो रही ऑटोमोबाइल और एयरोस्पेस कंपनी रोल्स-रॉयस (Rolls-Royce) का राष्ट्रीयकरण कर दिया था ताकि रोजगार और देश की साख बचाई जा सके!

राष्ट्रीयकरण उस दौर की एक वैश्विक लहर थी

यद्यपि उद्योगों का राष्ट्रीयकरण उस दौर की एक वैश्विक लहर थी, लेकिन इंदिरा गांधी के निर्णय दो मायनों में पूरी दुनिया से अलग और विशिष्ट थे! पहला, उद्योगों का राष्ट्रीयकरण तो कई देशों ने किया, लेकिन भारत की तरह सैकड़ों सालों से स्थापित राजशाही के विशेषाधिकारों (Privy Purses) को लोकतांत्रिक तरीके से कानूनन खत्म करना अपने आप में एक अनोखा सामाजिक-राजनीतिक प्रयोग था, जिसे इंदिरा गांधी ने न्यायपालिका और अपनी ही पार्टी के पुराने नेताओं (सिंडिकेट) के भारी विरोध के बावजूद अंजाम दिया। दूसरा, जहां लीबिया या अन्य देशों में सैन्य या तानाशाही ताकतों के दम पर राष्ट्रीयकरण किया गया, वहीं इंदिरा गांधी ने इसे भारतीय लोकतंत्र, संसद के संशोधनों और कानूनी लड़ाइयों (जैसे 26वां संविधान संशोधन) के जरिए लागू किया।लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि राष्ट्रीयकरण के आर्थिक फैसले लेने वाले वह दुनिया की अकेली शासक नहीं थीं (भुट्टो, अलेंदे और गद्दाफी भी उसी राह पर थे), लेकिन एक साथ पूंजीवाद (निजी बैंक/बीमा) और सामंतवाद (राजा-महाराजाओं) दोनों मोर्चों पर एक लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर एक साथ प्रहार करने का साहस केवल इंदिरा गांधी ने ही दिखाया था। देश के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में बैंकों और कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण सहित प्रिवी पर्स के खात्मे जैसा निर्णय लेने वालीं इंदिरा गांधी ने देश की सुरक्षा के लिए परमाणु परिक्षण जैसा साहसिक फैसला लेने की दिशा में आगे बढीं. पडोसी देश चीन परमाणु संपन्न हो चुका था.चीन से आसन्न खतरे से बचने के लिए इंदिरा गांधी ने परमाणु कार्यक्रम को प्राथमिकता की सूचि में रखा. इसके चलते मई, 1974 में भारत ने पहली बार राजस्थान के पोखरण में ‘स्माईलिंग बुद्धा’ नाम से सफलता पूर्वक भूमिगत परीक्षण किया!

आपातकाल : दलित वंचितों का स्वर्णकाल

लेकिन देश के नवनिर्माण के लिए एक से बढकर एक साहसिक फैसले लेने वालीं इंदिरा गाँधी का 1975 में आपातकाल लागू करने का फैसला काफी विवादित रहा, जिसे लेकर आज भी बुद्धिजीवी उनकी आलोचना करते रहते हैं.लेकिन ’इंदिरा गाँधी ने आपातकाल लागू करने के अपने कदम को , देश के राजनीतिक हितों की रक्षा एवं मुख्यतया अन्य तीन आधारों पर उचिंत ठहराया . पहला, भारत की सुरक्षा , स्थायित्व, अखंडता और लोकतंत्र को जेपी आन्दोलन के विखंडनवादी चरित्र से खतरा था. जेपी के भाषणों का हवाला देते हुए उन्होंने विपक्षी दलों पर सशस्त्र सेनाओं और पुलिस को बगावत करने के लिए उकसाने का आरोप लगाया. दूसरा,गरीबों और सुविधाविहीन जनता के हितों में द्रुत आर्थिक विकास के कार्यक्रमों को लागू करने की आवश्यकता थी.तीसरा, उन्होंने भारत को कमजोर और अस्थिर बनाने का उद्देश्य से विदेशों में तोड़फोड़ और हस्तक्षेप की आशंका के प्रति आगाह किया था.’(स्रोत: आज़ादी के बाद का भारत,पृष्ट:334 ). बहरहाल आपातकाल आज भी कई लोगों के लिए निदनीय हो सकता है, लेकिन वह दलितों के लिए स्वर्णकाल रहा. आपातकाल के दौरान ही विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक पदों पर आरक्षण के लिए सहमति दी. इसके आगे दलित शिक्षा में गुणवत्ता के सम्बन्ध में श्रीमती गांधी ने उसी समयावधि केन्द्रीय विद्यालयों में अनुसूचित जाति/ जनजाति के बच्चो को आरक्षण देने का निर्णय लिया. आपातकाल के दौरान ही उनके लिए आई.आई.टी. के द्वार खुले. इसी समय में ठोस दलित मध्यम वर्ग की जड़ें गहरी हुईं. अन्य मुद्दों जैसे न्यायालयों में उच्च स्तर पर अनुसूचित जाति / जनजाति के न्यायधीशों की नियुक्ति की समस्या को इंदिरा गांधी ने ही सुलझाया. बाद में उनके योग्य पुत्र राजीव गांधी के दो फैसलों से दलित समाज में मिडिल क्लास के विस्तार में बड़ा चमत्कार किया.कम्प्यूटर क्रांति के जनक राजीव गांधी के कार्यकाल में स्थापित नवोदय विद्यालयों ने जहा शहरों से दूर ग्रामीण इलाके के एससी-एसटी समुदाय के प्रतिभावान छात्रों को टॉप क्लास की गुणवत्ती शिक्षा मुहैया कराया.आज एम्स, आईआईएम, आईआईटी में जितने एससी- एसटी के छात्र नजर आते हैं, अधिकांश ही केन्द्रीय और नवोदय विद्यालय से निकले मिलेंगे. नवोदय विद्यालय के बाद इंदिरा पुत्र राजीव गांधी के जरिये वजूद में आया अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति(अत्याचार निवारण ) अधिनियम 1989 हिन्दुओं के अत्याचारों मानवेतरों को बचाने में एक अभूतपूर्व ढाल बना!

जितनी आबादी –उतना हक़ के जरिए राहुल गांधी ने दिया : कांग्रेस की समावेशी नीति को अभूतपूर्व विस्तार!

आज आजादी के 79 वर्ष बाद जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो पाते हैं देश को आजाद कराने वाली कांग्रेस ने आजादी के बाद मिले लोकतंत्र को सामाजिक परिवर्तन के एक धारदार हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हुए देश में एक क्रांति घटित कर दिया.इसी शक्ति के जोर से कांग्रेस आजादी के बाद के 79 वर्षों में कुल 54- 55 सत्ता में रहते हुए रियासतों के खात्मे के साथ भूरि-भूरि स्कूल- कॉलेज, विश्वविद्यालय, अस्पताल , नवरतन कंपनियों के असंख्यक सरकारी उपक्रम खड़े किए .कांग्रेस द्वारा स्थापित इन्हीं स्कूल, कॉलेज, राष्ट्रीयकृत बैंक, कोयला खदान, बीमा क्षेत्र और नवरतन कंपनियों सहित कांग्रेस राज में स्थापित की गयी अन्य सैकड़ों सरकारी कंपनियों में जॉब पाकर दलित, आदिवासी ,पिछड़े,महिलाएं शक्ति के उन स्रोतों में हिस्सेदारी पाने लगे, जिनसे धर्माधारित मनुवादी – आरक्षण के तहत वे सदियों से बहिष्कृत रहे. मनुवादी व्यवस्था में शक्ति के समस्त स्रोतों – आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक , धार्मिक – का दलित, आदिवासी, पिछड़े और आधी आबादी के लिए पूरी तरह अधर्म घोषित कर 7-8 % संख्या के स्वामी अपर कास्ट पुरुषों लिए आरक्षित कर दिए गए थे. कांग्रेस ने लोकतंत्र से मिली शक्ति के जोर से संविधान के जरिए हिन्दू अर्थात मनुवादी आरक्षण को ध्वस्त कर शक्ति के समस्त स्रोत मनुवादी व्यवस्था के वंचितों के लिए मुक्त करने का क्रांतिकारी काम अंजाम दिया. लेकिन मनुवादियों को पंडित नेहरु, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा, राजीव गाँधी, नरसिह राव, डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा अंजाम गया सामजिक परिवर्तन का काम कभी रास नहीं आया .पिछले सौ सालों से मनुवादी व्यवस्था का पोषक संघ शक्ति के समस्त 7-8 % उच्च वर्ण पुरुषों के हाथ में देकर दलित, आदिवासी,पिछड़ों और आधी आबादी सेयुक्त शेष 90 प्रतिशत से अधिक वंचित हिन्दू आबादी को उस स्टेज में पहुचाने की जुगत में लगा रहा और अंततः राम मंदिर आन्दोलन के जरिये भारतीय लोकतंत्र को कब्जे में करने में सफल रहा! संघ प्रशिक्षित पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी ने राम मंदिर मिली राजसत्ता का इस्तेमाल शक्ति के समस्त स्रोत दैवीय अधिकारी वर्ग के हाथ में देने के लिए बाकायदे विनिवेश मंत्रालय खोलकर नेहरु – शास्त्री- इंदिरा द्वारा खड़े किये गए सरकारी उपक्रमों को बेचने में किया.लेकिन जब सत्ता में आकर दूसरे संघी पीएम वाजपेयी को बौना बनांते हुए सारा कुछ बेचने में सर्वशक्ति लगाना शुरू किया, तब लगा कि नेहरु- इंदिरा – राजीव गांधी ने शक्ति के समस्त स्रोतों में मनुवादी व्यवस्था के वंचितों को हिस्सेदारी दिलाने का जो प्रयास चलाया, उस पर पूरी तरह पानी फिर जायेगा. वैसे में अपने पुरुखों की समावेशी नीति को नए तेवर और कलेवर में ‘जितनी आबादी- उतना हक़’ सिद्धांत के साथ 2024 के लोकसभा में उतरे. चूँकि भाजपा की सबसे बड़ी कमजोरी सामाजिक न्याय और डाइवर्सिटी है और राहुल गांधी ने उसे जितनी आबादी – उतना हक़ के जरिये 2024 तुंग पर पहुंचा दिया,इसलिए भाजपा लगभग पूरी तरह हार ही गई थी : वह तो चुनाव आयुक्त राजीव कुमार के चमत्कार से लगभग 80 सीटें बचाने में कामयाब हो गई ,जिससे वह सत्ता में है !

लोकतंत्र बचाने के लिए : राहुल गाँधी लड़ रहे है आजादी की दूसरी लड़ाई

चूँकि राहुल गांधी ने जितनी आबादी – उतना हक़ के जरिये अपने पुरुखों की समावेशी नीति को अभूतपूर्व विस्तार देकर संघ के राजनीतिक संगठन भाजपा के सत्ता में आने का द्वार रुद्ध कर दिया है और भाजपा मनुवादी व्यवस्था लागू करने की दहलीज पर पहुँच गई है, इसलिए वह सत्ता में आने का कोई भी रास्ता नहीं छोड़ना चाहती.उसे पता है कि राहुल गाँधी एक बार सत्ता में आ गए तो उसे 50 साल तक सत्ता से दूर हो जाना पड़ेगा. ऐसे में जितनी आबादी – उतना हक़ से पार्टी की स्थिति महफूज करने के लिए पीएम मोदी ने भारतीय लोकतंत्र को अपहृत करने की योजना बनाई. उस योजना के तहत उन्होंने भारत को चुनावी निरंकुशता वाले : चीन, पाकिस्तान, फिलिपीन ,बांग्लादेश , नेपाल की श्रेणी में पहुंचा दिया ,जिससे कहने के लिए वोट तो होगा,पर परिणाम पहले से तय रहेगा. भारत को चुनावी निरंकुशता वाले देशों की श्रेणी में पहुचाने के बाद उन्होंने ज्ञानेश कुमार को साथ लेकर बड़े पैमाने पर वोट चोरी की परिकल्पना की, जिसमें जरिया बना : एसआईआर! चुनावी निरंकुशता और एसआईआर ने भारतीय लोकतंत्र की वह शक्ति छीन ली है, जिसके जरिये इंदिरा जी ने बैंकों, कोयला खदानों, एलआईसी इत्यादि के राष्ट्रीय कारण सहित राजाओं का प्रिवी पर्स छीनने का चमत्कार किया. राहुल गांधी उसी लोकतंत्र के पुनरुद्धार के लिए आजादी की दूसरी लड़ाई लड़ रहे हैं. यह लड़ाई तभी जीती जा सकती है, जब इंदिरा जी की नीतियों से शक्ति स्रोतों में हिस्सेदारी पाया तबका करो- मरो के संकल्प के लोकतंत्र के पुनरुद्धार की लडाई में इंदिरा जी के पौत्र : राहुल गांधी का साथ दें. राहुल गांधी अगर आजादी की दूसरी लड़ाई हांर गए तो मनुवादी संघ प्रतिक्रांति का सैलाब पैदा कर देगा !

 (लेखक उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के विचार विभाग के चेयरमैन हैं)

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