Jantar Mantar Protest: छात्र आंदोलन:विराम या समाप्त?

Jantar Mantar Protest: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तो यह भी कहा था कि हमारी सरकार यूपीए की सरकार नहीं है। यह एनडीए की सरकार है और इसमें इस्तीफे नहीं होते। इसका मतलब यह हुआ कि भाजपा सरकार के मंत्रियों पर भले ही गंभीर से गंभीर भ्रष्टाचार का आरोप लगते रहें।

अलखदेव प्रसाद ‘अचल’

न्यूज इंप्रेशन 

Bihar: दिल्ली के जंतर मंतर से लेकर राज्यों और उनके जिलों में जो नेट पेपर लिक मामले को लेकर आंदोलन उफान पर रहे, उनकी एकमात्र मांग थी शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा। भाजपा सरकार का जो दागदार चरित्र रहा है, उसके अनुसार सरकार भी इस बात को लेकर अडिग थी कि किसी भी हालत में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं होगा। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तो यह भी कहा था कि हमारी सरकार यूपीए की सरकार नहीं है। यह एनडीए की सरकार है और इसमें इस्तीफे नहीं होते। इसका मतलब यह हुआ कि भाजपा सरकार के मंत्रियों पर भले ही गंभीर से गंभीर भ्रष्टाचार का आरोप लगते रहें। भाजपा के मंत्री निकम्मा साबित होते रहें, फिर भी ये इस्तीफा नहीं देंगे। जंतर मंतर के इस आंदोलन ने यह साबित कर दिखा दिया कि जनता की ताकत के सामने तानाशाह से तानाशाह सरकार को भी झुकना ही पड़ता है। क्योंकि प्रजातंत्र में सरकार तो जनता ही बनवाती है, फिर जब जनता बना सकती है, तो बिगाड़ क्यों नहीं सकती है? जबकि जंतर-मंतर के छात्र आंदोलन को कुचलने, उन्हें देशद्रोही और चीन पाकिस्तान का एजेंट कहकर बदनाम करने,उसमें हिन्दू -मुस्लिम करने जैसे जितने भी उपाय हो सकते थे, उसे करने में सरकार बाज नहीं आयी थी। सरकार ने पुलिस के माध्यम से दमनात्मक कार्रवाई तो की ही थी, हद तो तब हो गई थी, जब जंतर-मंतर तक खाना पहुंचाने वाले लोगों पर भी पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था। उन्हें जाने से रोका तक गया था।ताकि आंदोलनकारी छात्र खाना खाए बिना, पानी पिए बिना तड़पने लगें।इससे और अधिक हद क्या हो सकती है? परंतु आंदोलनकारी थे, जो सब कुछ बर्दाश्त करने के लिए तैयार थे, लेकिन झुकने के लिए तैयार नहीं थे।

छात्रों ने करके दिखा दिया कि आंदोलन किसको कहते हैं

शिक्षा सहित विभिन्न समस्याओं को लेकर इस तरह से आंदोलन करने का काम विपक्षियों का होता है, परंतु भाजपा सरकार ने 12 सालों में विपक्षियों को इतना कमजोर कर दिया कि विपक्षी पार्टी के लोग अपने को सक्षम नहीं समझ सके। फलस्वरूप इतने बड़े आंदोलन न कर सके। शायद इसलिए भी कि विपक्षियों को यह लग रहा था कि भाजपा हर बार बहुमत में आ जा रही है, उसके बजाए हमलोग कमजोर हैं। कमजोर समझने का एक कारण यह भी रहा कि विपक्षियों में सरकार को झुकाने के लिए आपसी एकजुटता का भी अभाव रहा।विपक्षी पार्टियां समय-समय पर एकजुट होने की कोशिश भी की, परंतु उन्हें उसमें सफलता नहीं मिल पाई। कांग्रेस की सरकार में जिस तरह से दिल्ली का रामलीला मैदान हो या फिर पटना का गांधी मैदान, जिस तरह से लोग लाखों की तादाद में आंदोलन करने के लिए पहुंचते थे, अब ऐसा नहीं देखा जा रहा है। अब तो सिर्फ ट्वीट करके ही लोग विरोध जताने में ज्यादा विश्वास रख रहे हैं।जो काम आज विपक्षी पार्टियों को करना चाहिए था, वह काम पहली बार छात्रों ने करके दिखा दिया। दिखा दिया कि आंदोलन किसको कहते हैं। छात्रों के इस आंदोलन को लेकर छात्रों को साथ देने के सिवा विपक्षी पार्टियों के सामने कोई विकल्प ही नहीं था। इसलिए जिन्हें लगा कि इन छात्रों को साथ देना चाहिए, तो कांग्रेस, सपा, माकपा , भाकपा, भाकपा माले, आजाद पार्टी सहित कई पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने छात्रों के आंदोलन को निश्चित रूप से ताकत प्रदान करने का काम किया। परंतु विपक्षी पार्टियों को इस आंदोलन से यह सीख लेने की जरूरत है कि अगर हम जनहित के लिए सोचेंगे, उसके लिए काम करेंगे और आंदोलन करेंगे, तो निश्चित रूप से जनता हमारे साथ रहेगी।जैसा कि जंतर-मंतर पर देखा गया।

अब छात्र जो जाग चुके हैं, अब सोने वाले नहीं हैं 

छात्र आंदोलन को देखकर जब सरकार को यह लगने लगा कि जिस तरह से पूरे देश में हमारी सरकार के विरुद्ध आंदोलन उफान पर बढ़ते जा रहा है। छात्रों को भयभीत करने के हथकंडे भी अपनाए जा रहे हैं, पर इसका उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। जिद्द पर अड़े रहने से नुकसान छोड़ फायदा नहीं है। सरकार को यह लगने लगा कि यह आंदोलन नेतृत्व विहीन है। ऐसा न कि यहां भी श्रीलंका और नेपाल जैसी स्थिति बन जाए। इसपर गंभीर चिंतन कर अंततः न चाहते हुए भी शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान से इस्तीफा ले लिया गया। आंदोलनकारियों की मांगे पूरी हो गई और स्वत: आंदोलन भी बैक कर गया। लगा कि जो हमारी मांगे थी, वह तो पूरी हो गई। परंतु अब सवाल यह उठता है कि क्या धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा दे देने से और प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्री का प्रभार सौंप देने से शिक्षा व्यवस्था में सुधार हो जाएगा?क्या इसकी गारंटी है कि अब नीट परीक्षा में पेपर लीक नहीं होंगे? क्या विभिन्न विश्वविद्यालयों में जो धर्मेंद्र प्रधान ने आरएसएस और भाजपा से जुड़े कार्यकर्ताओं और समर्थकों को कुलपति के पद पर बैठाया था, प्रोफेसरों की बहाली की थी, शिक्षण संस्थानों को भगवाकरण किया था। शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से चौपट कर दिया था? प्रहलाद जोशी को आने से या फिर नया शिक्षा मंत्री बना देने से सब कुछ सुधर जाएगा? क्योंकि सरकार का चरित्र तो वही है। सरकार जिस तरह से शिक्षा के क्षेत्र में धर्मेंद्र प्रधान के माध्यम से अपने एजेंडे को लागू कर रही थी, उसी तरह से नया शिक्षा मंत्री,उन एजेंडे को लागू नहीं करवाएगी?सारे तंत्रों पर से सरकार का नियंत्रण खत्म हो जाएगा क्या? अगर नहीं, तो फिर आंदोलनकारी अपनी जिन मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे थे, क्या उन्हें समस्याओं से मुक्ति मिल जाएगी? अगर फिर उसी तरह से सब कुछ होता रहा, तो फिर आंदोलन को वापस लेने का क्या महत्त्व रह जाएगा? क्योंकि शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी न सिर्फ नरेन्द्र मोदी का पिट्ठू है, बल्कि अडानी का भी उतना ही अधिक पिट्ठू है। वैसे व्यक्ति से जहां नयी शिक्षा नीति का ही भगवाकरण कर दिया गया है, वहां शिक्षा व्यवस्था में कितना सुधार की अपेक्षा की जा सकती है? ऐसी स्थिति में फिर छात्र क्या करेंगे? क्योंकि आपने सुधार तो टहनी में की है,जड़ में नहीं। जो भी होगा, पर इतना तो तय है कि इस आंदोलन से सरकार अगर न भी समझी हो, तो उसे इतना तो समझ में आना ही चाहिए कि अब हम कुछ भी करते रहेंगे, तो छात्र निश्चिंत रहने वाले नहीं हैं। जहां हम छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करेंगे, वहां छात्र अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करेंगे और जब एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए सड़कों पर उतरेंगे, तो हमारी किरकिरी होना सिर्फ तय ही नहीं है, बल्कि इसका दुष्परिणाम भी भुगतने जैसी स्थिति बन सकती है। अब देखना है कि इस आंदोलन के सरकार आगे क्या-क्या करती है? पर इतना तो तय है कि अब छात्र जो जाग चुके हैं, अब सोने वाले नहीं है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *