Efforts to Suppress the Truth : सच को दबाने की जद्दोजहद
Efforts to Suppress the Truth: जो सरकार जनता की आवाज को अनसुनी कर दे और सरकार से मांग करने वाले आंदोलनकारियों को देशद्रोही करार देने लगे, वैसी सरकार से देश का हित कभी संभव हो ही नहीं सकता।
अलखदेव प्रसाद ‘अचल’
न्यूज इंप्रेशन
Bihar: जो सरकार जनता की समस्याओं को सुनने उसपर ध्यान देने के बजाय सच को दबाने और कुचलने के षड्यंत्र में अपनी सारी शक्ति लगा दे। जो सरकार जनता की मांगों को नजर अंदाज कर दे, जो सरकार जनता की आवाज को अनसुनी कर दे और सरकार से मांग करने वाले आंदोलनकारियों को देशद्रोही करार देने लगे, वैसी सरकार से देश का हित कभी संभव हो ही नहीं सकता। आज हमारे देश में जो सरकार का रवैया है, इसका जीता जागता प्रमाण है। प्रजातंत्र में आंदोलन करने का अधिकार किसी भी नागरिक को होता है। आंदोलन के माध्यम से कोई भी विपक्षी पार्टी हो या कोई संगठन, अपनी मांगों की ओर सरकार का ध्यान आकृष्ट करवाना चाहता है। दुनिया में जहां भी प्रजातंत्र है, वहां ऐसा ही होता है। क्योंकि जनता के बहुमत से ही सरकार बनती है। आजादी के बाद हमारे देश में भी ऐसा ही होता आ रहा है। जब भी सरकार जनता की समस्याओं पर ध्यान नहीं देती है, तो लोग सरकार के विरुद्ध आंदोलन करते ही रहे हैं। सरकार का कर्तव्य होता है कि उस पर ध्यान दे कि कहां हमारे अंदर खामियां हैं। इसके लिए हमें क्या करना चाहिए। हां, कुछ सरकार ऐसी भी होती है, जो आंदोलनकारियों की मांगों को, उनकी आवाज को अनसुनी कर देती है। इतना जरूर है कि लोग सरकार से जितनी अपेक्षा रखते हैं कि हमारी मांगे पूरी हो जाए, वैसा सरकार भी नहीं करती है। कुछ मांगे पूरी करती है, तो कुछ नहीं भी करती है। कुछ के लिए सरकार आश्वासन देती है। पर जब जिससे आम जनता को लगता है कि सरकार के इस रवैए से आम लोगों को काफी नुकसान है, तो सरकार को सुनना ही पड़ता है।
वर्तमान सरकार जनता की बातें सुनना ही नहीं चाहती
हमारे देश की जो वर्तमान सरकार है, वह बनी तो है जनता के बहुमत से ही, पर जनता की बातें सुनना ही नहीं चाहती है और संविधान की धज्जियां उड़ाकर निरंकुश बनना चाहती है। चुनाव आयोग को हथियार बनाकर हर राज्य में बहुमत में आना चाहती है। सरकार के निरंकुश रवैए के खिलाफ जो सड़कों पर उतरना चाहते हैं। सरकार के गलत रवैए के खिलाफ आवाज उठाना चाहते हैं, उन्हें कुचल देना चाहती है। हास्यास्पद तो यह है कि जहां हमारी सरकार को आंदोलनकारी की मांगों पर ध्यान देना चाहिए, उसके बजाय हमारी सरकार वैसे आंदोलनकारियों को ही देशद्रोही घोषित करने पर तूली हुई है। उन्हें बदनाम कर देना चाहती है। उसके लिए मुख्य मीडिया का तो सहारा ले ही रही है। उसके जो आई टी सेल वाले हैं,वे लोग भी रात-दिन इसी काम में लगे हुए हैं। ताकि आम जनता समझ सके कि आंदोलनकारी ही गलत रास्ते पर हैं। और यह काम सरकार बहुत ही बेशर्मी के साथ करती जा रही है।
तिरंगा लेकर आंदोलन कर रहे पर पुलिस द्वारा लाठियां बरसवा रही है
सबसे हास्यास्पद तो यह है कि कभी यही काम सरकार की पार्टी तब करती थी,जब यहां कॉग्रेस की सरकार होती थी। 90 के दशक में बीजेपी वालों ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद के खिलाफ और राम मंदिर के निर्माण के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक की तिरंगा यात्रा निकाली थी। जब वही तिरंगा लेकर लोग सड़कों पर निकल रहे हैं, तो सरकार को नागवार गुजर रही है। दिखाने के लिए तो भाजपा सरकार के लोग आज भी समय-समय पर तिरंगे का इस्तेमाल करते हैं, परन्तु बलात्कारियों और अपराधियों को बचाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। यह दिखाने के लिए इस्तेमाल करते हैं कि हम लोग राष्ट्रभक्त हैं। वहीं जब आज दिल्ली में कई पार्टी और संगठन के लोग हाथों में तिरंगा लेकर आंदोलन कर रहे हैं, सरकार उन पर पुलिस द्वारा लाठियां बरसवा रही है। लोगों को अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करने से रोकवा रही है और आंदोलन को कुचलने का अथक प्रयास कर रही है। प्रजातंत्र में इसे ही तानाशाही रवैया कहते हैं।
चुनाव आयोग के प्रमुख ज्ञानेश कुमार ने SIR के नाम पर जो देश के करीब 13 करोड़ों लोगों को वोटर लिस्ट से नाम कटवाकर मताधिकार से बेदखल कर दिया। जिसमें अधिकांश वैसे लोग हैं, जिन्हें समझा गया कि ये लोग भाजपा के वोटर नहीं हैं।क्या प्रजातंत्र में इसे किसी कीमत पर जायज ठहराया जा सकता है? अगर जायज नहीं ठहराया जा सकता है, तो फिर आंदोलनकारी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं, तो इसमें गलत क्या है? अगर गलत नहीं है, तो सरकार ज्ञानेश कुमार से इस्तीफा क्यों नहीं ले रही है? सरकार ज्ञानेश कुमार के बचाव में क्यों खड़ी है? इसके बजाय , ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करने वाले आंदोलनकारियों को कुचलवाने के लिए दिल्ली में इतनी पुलिस क्यों लगा रखी है? इसका मतलब है कि सरकार चाहती है कि हम जो कर रहे हैं, वह सही कर रहे हैं? हम अपने ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध में कोई आवाज सुनना नहीं चाहते हैं।
सरकार की तानाशाही और हिटलरशाही रवैया को है दर्शाता
जब चुनाव आयोग के प्रमुख ज्ञानेश कुमार के विरोध में देश के कई पार्टी और संगठन के लोगों ने 10 अक्टूबर को जंतर मंतर पर आंदोलन करने का ऐलान किया था, तो सरकार ने दिल्ली पुलिस के अतिरिक्त बाहर से करीब पैंतीस हजार फोर्स को पूरे दिल्ली में भर दिया था। जंतर मंतर की नाकेबंदी करवा दी थी कि कोई भी आंदोलनकारी जंतर मंतर तक न पहुंचे। जिस पार्टी या संगठन के लोग दिल्ली पहुंच रहे थे, उनके प्रमुख नेताओं को सरकार ने गिरफ्तार करवा लिया था। यूट्यूब चैनल वालों को जबरन उठा लिया था। चारों तरफ पुलिस ही पुलिस लगा दी थी, दिल्ली जाने वाली सैकड़ों रेल गाड़ियों को रद्द कर दिया गया था। हवाई जहाज रद्द कर दिए गए थे। जंतर-मंतर की तरफ जाने वाली मेट्रो ट्रेनों का परिचालन बंद करवा दिया गया था, ताकि इस्तीफे की मांग करने वालों का आंदोलन असफल हो जाए। और जो आज प्रमुख मीडिया वाले गोदी मीडिया के नाम से सुविख्यात हो गए हैं, वे लोग बैठे-बैठे अपने चैनलों पर यह परोस रहे थे कि आंदोलन असफल हो गया। कोई भी आंदोलनकारी जंतर मंतर नहीं पहुंच सके। सरकार के अथक प्रयास के बावजूद आंदोलन थमने का नाम नहीं लिया। जो जहां थे, उसी को लोगों ने जंतर मंतर बना दिया था। उसके बाद लगातार दिल्ली में रोज दिन आंदोलन जारी है। लोग तानाशाह और निकम्मी सरकार के विरुद्ध नारे लगा रहे हैं और मतदाता सूची में पक्षपात करवाने वाले चुनाव आयोग के ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। जिनके साथ सरकार की पुलिस लगातार उन्हें असफल करने के लिए जद्दोजहद कर रही है। उन पर डंडे बरसा रही है। फिर भी लोग मानने के लिए तैयार नहीं हैं।
आखिर यह सब कुछ क्या दर्शाता है ? यह तो यही दर्शाता है कि सरकार यह चाहती है कि हम जो कुछ भी कर रहे हैं, जैसे भी कर रहे हैं, उसको आम लोगों को मनाना ही होगा। सरकार लोगों की किसी मांग को नहीं मानेगी, इसके लिए चाहे जो हो। यह सरकार की तानाशाही और हिटलरशाही रवैया को ही दर्शाता है। जबकि सरकार को समझ लेना चाहिए कि प्रजातंत्र में जनता में बहुत बड़ी ताकत होती है। जनता ही सरकार को बनाती है और जनता ही सरकार को बिगाड़ती भी है। जनता की मनोभावनाओं के विरुद्ध जाकर सरकार सफल नहीं हो सकती है। एक न एक दिन सरकार को जनता के सामने झुकना ही पड़ता है। अब देखना है कि यह सरकार जनता की मनोभावना के विरुद्ध चलकर कितना सफल हो पाती है या फिर घुटने टेकती है!
