Gandhi Jayanti 2026: महात्मा गाँधी मानवतावाद के शिखर पुरुष
Gandhi Jayanti 2026: गांधी की मानवतावादी सोच और उनके स्वाधीनता आन्दोलन का लक्ष्य चूँकि हिन्दुत्ववादियों के सामाजिक–आर्थिक सपनों के बिलकुल विपरीत थी, इसलिए वे न सिर्फ उनके आन्दोलन से दूरी बनाए, बल्कि उनसे नफरत भी करते रहे.
एचएल दुसाध
न्यूज इंप्रेशन
Delhi: देश का बहुत बुरा हाल है. मौजूदा हिन्दुत्ववादी सरकार देश के उन तमाम सरकारी संस्थानों को बेच रही है, जहाँ दलित, आदिवासी, पिछड़ों इत्यादि को आरक्षण मिलता था, जो उनकी प्रगति का आधार है. इसका ताजा शिकार अभी- अभी इसरो हुआ है. वर्तमान में बात –बात में दलित और अल्पसंख्यकों की लिंचिंग हो रही है. यही नहीं तेजी से अधिकारविहीन किये जा रहे अल्पसंख्यकों के घरों पर बात-बात में बुलडोजर चलाया जा रहा और डॉ. आंबेडकर के संविधान की जगह मनु का विधान लागू करने की तैयारी चल रही है. ऐसी स्थिति में कांग्रेस एक बार फिर संविधान बचाने तथा आजादी की दूसरी लड़ाई लड़ने की घोषणा करने के लिए सामने आई है ! इन सब बातों को देखते हुए मन में फिर कई सवाल उठ रहे हैं. वह यह कि क्यों कांग्रेस पार्टी स्वाधीनता संग्राम की असंभव सी लड़ाई लड़ी ; क्यों आजादी के बाद देश के नवनिर्माण को खुद को निमग्न करते हुए जिस देश में सुई तक नहीं बनती थी, उस देश में उसने असंख्य स्कूल- कॉलेज- विश्वविद्यालय, अस्पतालों इत्यादि के साथ विज्ञानं व प्रोद्योगिकी के लिए ढेरों अनुसन्धान केंद्र स्थापित करने के साथ सार्वजानिक क्षेत्र के निगमों का जाल फ़ैलाने का चमत्कार घटित कर डाला! आजादी के बाद जब नए भारत के निर्माता पंडित जवाहर लाल नेहरु देश के नवनिर्माण में आगे बढे तो क्यों समाजवादी आचार्य नरेंद्र देव और जयप्रकाश नारायण , कम्युनिस्ट पी.सी.जोशी और अजय घोष, उत्तर साम्प्रदायवादी श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दलित नेता डॉ. बीआर आंबेडकर इत्यादि कई गैर- कांग्रेसियों को अपने मंत्री– मंडल में जगह दिया ? सबसे बड़ी बात है एक सवर्णवादी दल होकर भी क्यों काग्रेस के पंडित नेहरु ही नहीं, इंदिरा गाँधी , राजीव गाँधी ने दलित मुक्ति में डॉ. आंबेडकर के प्रयासों को इतना इतना आगे बढाया कि दलित- आदिवासियों में एक मध्यम वर्ग का उभार हुआ, जिनमें से सैकड़ों लोग आज लेखक – पत्रकार – प्रोफ़ेसर बनकर बौद्धिक दुनिया को विस्मित कर रहे है! बात सिर्फ दलित – आदिवासियों की मुक्ति में आंबेडकर के प्रयासों को आगे बढ़ाने तक सिमित नहीं रही , बल्कि पिछड़ों , अल्पसंख्यकों और महिलाओं की दशा में सुधार के लिए भी कांग्रेस आगे बढ़ी, आखिर क्यों? जब इन ढेर सारे सवालों के सवालों का जवाब जानने का का प्रयास करते हैं तो हम पहुंव जाते है 19 वीं सदी में शुरू भारतीय पुनर्जागरण काल में !
मानवतावाद को एवरेस्ट सरीखी ऊंचाई दिए : महात्मा गांधी
यह भारतीय पुनर्जागरण काल रहा , जिसमें मनुवादी भारतीय मानवतावाद की ओर अग्रसर हुए,जिसकी पहलकदमी उस दौर के भारतीय महापुरुषों : राजा राममोहन राय ,स्वामी विवेवेकानन्द , ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, दयानंद सरस्वती , रवीन्द्रनाथ टैगोर, हेनरी विवियन डिरोजियो, केशव चन्द्र सेन, पंडिता रमाबाई, ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले इत्यादि ने की. महान समाज सुधारकों का उदय आकस्मिक नहीं, बल्कि तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक, बौद्धिक और औपनिवेशिक परिस्थितियों का परिणाम था। यह वह दौर था जब भारतीय समाज धर्म-जनित सदियों पुरानी रूढ़ियों, कुरीतियों और अंधविश्वासों में जकड़ा हुआ था। सती, विधवाओं की दयनीय स्थिति, अछूत प्रथा, और गंगा प्रवाह (शिशु हत्या का एक रूप) के अलावा, समाज कई अन्य रूढ़ियों से ग्रसित था, तब उच्च वर्ण के लोग दलित- पिछड़ों को सताना व उन्हें शक्ति के स्रोतों(आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक- धार्मिक ) से बहिष्कृत रखना धर्म का काम समझते थे. लम्बे समय से अंग्रेजो की पराधीनता झेल रहे भारतीयों में पराधीनता से मुक्ति की कोई चाह नहीं पनपी थी . ऐसे दुर्दिन में कुछ प्रबुद्ध भारतीयों की आत्मा जागी और वे समाज सुधारक बने.ब्रिटिश शासन के साथ-साथ पश्चिमी शिक्षा, विज्ञान, और तर्कवाद (Rationalism) का प्रसार हुआ. अंग्रेजी पढ़ने वाले भारतीयों ने मानववाद, स्वतंत्रता, समानता और लोकतंत्र के पश्चिमी विचारों को समझा, जिसने उन्हें भारतीय समाज की कुरीतियों पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित किया। ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन और हिंदू धर्म की आलोचना ने भी भारतीय बुद्धिजीवियों को सचेत किया। उन्होंने महसूस किया कि धर्म के भीतर से ही रूढ़ियों को खत्म करना आवश्यक है, जिससे पुनर्जागरण की शुरुआत हुई और भारत धीरे–धीरे मानवतावाद के पथ पर चल पड़ा. इस काल में जन्मे जिन महान समाज सुधारकों ने मानवतावाद का परचम लहराया , उन्हीं में से एक रहे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ! ब्रिटिश शासन से भारत की स्वतंत्रता के सफल अभियान का नेतृत्व करने वाले महात्मा गांधी ने अहिंसक प्रतिरोध का प्रयोग करके दुनिया भर में नागरिक अधिकारों और स्वतंत्रता के आंदोलनों को प्रेरित किया. मानवतावाद को एवरेस्ट सरीखी ऊंचाई देने के क्रम में उन्होंने दलित उत्थान का जो काम किया, उससे उनको अलग तरह से याद किया जाता है. महात्मा गांधी को दलित उत्थान (दलितों के उत्थान और सामाजिक समानता) की प्रेरणा मुख्य रूप से उनके मानवीय मूल्यों, दक्षिण अफ्रीका के अनुभवों और हिंदू धर्म के भीतर व्याप्त छुआछूत जैसी कुरीतियों को दूर करने की इच्छा से मिली थी। गांधीजी का यह दृढ़ विश्वास था कि सभी मनुष्य ईश्वर की संतान हैं, इसलिए किसी को ‘अछूत’ मानना गलत है. उन्होंने दलितों को ‘हरिजन’ (ईश्वर के जन) नाम दिया। छुआछूत को मिटाकर वे हिंदू समाज में एकता लाना चाहते थे ताकि स्वतंत्रता की लड़ाई में सभी वर्ग एकजुट हो सकें. गांधीजी ने अस्पृश्यता को हिंदू धर्म पर एक कलंक माना और इसे दूर करने के लिए स्कूलों की स्थापना, मंदिर प्रवेश और स्वच्छता अभियान जैसे प्रयास किए. उसी महात्मा ने सितम्बर 1932 में, डॉ. आंबेडकर द्वारा समर्थित पृथक निर्वाचन मंडल के विरोध में आमरण अनशन किया, जिसके बाद पूना-पैक्ट के जरिये आरक्षण की शुरुआत हुई और परवर्तीकाल में संविधान में जिसकी स्थाई व्यवस्था हुई . इस आरक्षण ने दलितों को शक्ति के स्रोतों में हिस्सेदारी सुलभ कराकर हजारों साल की गुलामी से काफी हद तक मुक्त होने का मार्ग प्रशस्त कर दिया. आंबेडकर के जिस संविधान ने दलित बहुजनों को गुलामी से मुक्त करने में महती भूमिका निभाई, उस संविधान के लागू होने के 6 साल बाद ही बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर का निधन हो गया ,किन्तु उनके निधन के बाद संविधान को प्रभावी बनाये रखने में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु से लेकर लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गाँधी,राजीव गाँधी , डॉ. मनमोहन सिंह ने हर मुमकिन प्रयास किया, जिसके फलस्वरूप मनुवाद के शिकार दलित-आदिवासी, पिछड़े और महिलाओं के जीवन में सुखद बदलाव आया. आजादी के बाद कांग्रेस के नेता दलित बहुजनों के जीवन में सुखद बदलाव लाने का प्रयास किये तो इसलिए कि महात्मा गांधी जैसे शिखर मानवतावादी उनके प्रेरणा पुरुष रहे !
हिन्दुत्ववादियों की सामाजिक- आर्थिक सोच के विपरीत रहा : गांधी के स्वाधीनता आन्दोलन का लक्ष्य
भारतीय पुनर्जागरण के गर्भ से निकले महात्मा गांधी का अन्दोलन देश के कोटि-कोटि लोगों को अहिंसात्मक स्वाधीनता आन्दोलन से जुड़ने और धार्मिक- रुढियों से मुक्त होकर मानवतावाद की राह पर चलने के लिए प्रेरित किया. अगर भारतीय पुनर्जागरण से निकला मानवतावाद और गाँधी के नेतृत्व में चला भारत का स्वाधीनता आन्दोलन किसी को नहीं के बराबर स्पर्श कर सका तो, वह थे हिन्दू राष्ट्र के प्रति समर्पित हिन्दुत्वादी ! यह भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी कही जाएगी की महात्मा गांधी के स्वाधीनता आन्दोलन के समान्तर भारत में हिंदुत्ववादी आन्दोलन सावरकर , हेडगेवार और हिन्दू महासभा के नेतृत्व में विकसित हुआ, जो हिन्दू राष्ट्र के निर्माण और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर केन्द्रित था. सावरकर से शुरू हुई हिंदुत्व की इस राजनीति का एक अन्तराल के बाद आरएसएस ठेकेदार बन बैठा. वैसे तो संघ के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का घोषित लक्ष्य भारतीय सामाज को संगठित करना और प्राचीन सभ्यतागत मूल्यों व ‘हिन्दू राष्ट्र’ की अवधारणा के आधार पर राष्ट्रीय पुनर्जागरण व चरित्र निर्माण करना था. किन्तु सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की आड़ में इसका असल लक्ष्य एक विशेष सामाजिक- आर्थिक सोच को जमीन पर उतारना रहा और वह थी हिन्दू राष्ट्र में कर्म आधारित वर्ण-व्यवस्था लागू कर शक्ति के समस्त स्रोत हिन्दू ईश्वर के उत्तमांग(मुख-बाहु- जंघे) से जन्मे लोगों के हाथों सौंपना था ! यह दुनिया की सबसे अमानवीय सामाजिक- आर्थिक सोच थी. क्योंकि वर्ण- व्यवस्था के विधानों के अनुसार देश परिचालित होने पर शक्ति के समस्त स्रोत उच्च वर्ण के पुरुष वर्ग, जिसकी वर्तमान में आबादी बमुश्किल 8-10 प्रतिशत हो सकती है, के हाथ में आ जाता और हिंदुओं की शेष 90 प्रतिशत से अधिक आबादी अधिकारविहीन गुलामों में तब्दील हो जाती. हिन्दुत्ववादियों के विपरीत गांधी जिस स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व कर रहे थे ,उसका लक्ष्य ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से भारत को पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता दिलाना और एक न्याय व समतापूर्ण और आत्मनिर्भर समाज का निर्माण करना. राजनीतिक आजादी के साथ उनका लक्ष्य छुआछूत को मिटाना, दलित और पिछड़ों का उत्थान करना और महिलाओं को अधिकार दिलाना; देश के सभी धर्मों के लोगों (विशेषकर हिन्दू और मुस्लिम) के मध्य एकता कायम करना तथा आजादी के बाद के भारत में शक्ति के समस्त स्रोत विविधतामय भारत के विविध समूहों – सवर्ण, दलित,आदिवासी ,पिछड़े और अल्पसंख्यकों – के मध्य वाजिब मात्रा में वितरित करना था. चूँकि गांधी के स्वाधीनता संग्राम का लक्ष्य हिन्दुत्ववादियों के सामाजिक- आर्थिक सोच के बिलकुल उलट थी, इसलिए आजादी के बाद सारा कुछ हिन्दू ईश्वर के उत्तमांग से जन्मे 8 से 10 प्रतिशत लोगों के हाथों में सौंपने का सपना देख रहे हिन्दुत्ववादी स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान गांधी का साथ नहीं दिए !
गांधी की मानवतावादी सोच और उनके स्वाधीनता आन्दोलन का लक्ष्य चूँकि हिन्दुत्ववादियों के सामाजिक–आर्थिक सपनों के बिलकुल विपरीत थी, इसलिए वे न सिर्फ उनके आन्दोलन से दूरी बनाए, बल्कि उनसे नफरत भी करते रहे. उनके अन्दर गांधी के प्रति पल रही नफरत का ही महाविस्फोट 30 जनवरी ,1948 को हुआ , जब नाथूराम गोडसे ने उन्हें गोली मारा. कहने को गांधी की हत्या के पीछे भारत विभाजन के समय की परिस्थितियां थी, जिससे उन्हें उनपर मुस्लिम तुष्टिकरण तथा हिन्दू हितों की अनदेखी का आरोप लगाने का अवसर मिला. लेकिन असल कारण यह रहा कि जिन वृहत्तर लक्ष्यों को लेकर गांधी स्वाधीनता संग्राम चला रहे थे, उससे उनके हिदू राष्ट्र निर्माण के सपनों की राह में बड़ा अवरोध पैदा हो गया था, जिससे मौका-माहौल देखकर हिन्दुत्ववादियों ने उन्हें रास्ते हटा दिया.मरणोपरांत वही गांधी कांग्रेस के प्रेरणा पुरुष बन गए और उनसे प्रेरणा लेकर कांग्रेसियों ने ऐसी नीतियाँ बनायीं, जो हिंदुत्ववादियों की सामाजिक- आर्थिक सोच के बहुत विपरीत रही!
संघ की सामाजिक-आर्थिक सोच पर : प्रधानमंत्री नेहरु का प्रहार
बहुतों को पता नहीं कि सावरकर- हेडगेवार- गोलवलकर सहित अन्य असंख्य हिंदुत्ववादी नायकों ने आधुनिक भारत में शुक्र ,कौटिल्य , मनु जैसे विचारकों का विधान लागू करने का जो सपना देखा था , उस पर सबसे बड़ा प्रहार करने वाले भारतीय संविधान के निर्माण के पृष्ठ में पंडित नेहरु की विराट भूमिका रही. उन्होंने 13 दिसंबर , 1946 को संविधान सभा में ‘ उद्देश्य प्रस्ताव ‘ नाम से जो प्रस्ताव पेश किया , वह भारतीय संविधान के मूल सिद्धांतों को निर्धारित करने वाला रहा और बाद में भारत संविधान की प्रस्तावना का आधार बना, जो संविधान के उद्देश्यों और मूल्यों को दर्शाता है. उनका उद्देश्य प्रस्ताव 22 जनवरी , 1947 को सर्वसम्मति से अपनाया गया और 26 नवम्बर,1949 को संविधान सभा द्वारा अंगीकृत और अधिनियमित किया गया. नेहरु के उस प्रस्ताव में कहा गया था,’ सभी भारतीयों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक निष्पक्षता ; पद और अवसर की समानता , कानून के समक्ष समानता ; और अभिव्यक्ति , विश्वास , आस्था , उपासना , व्यवसाय , संघ और कार्य की बुनियादी स्वतंत्रता – कानून और सार्वजानिक नैतिकता के अधीन – की गारंटी दी जानी चाहिए.’ नेहरु का यह उद्घोष संघ की सामाजिक- आर्थिक सोच के खिलाफ एक क्रान्तिकारी उद्घोष था , जिसे संघी आज तक भूल नहीं पाए है और अपना आक्रोश समय- समय पर जाहिर करते रहते हैं. जवाहरलाल नेहरु ने आधुनिक भारत के निर्माण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई . उन्होंने योजना आयोग की स्थापना करने के साथ , विज्ञानं और प्रौद्योगिकी के विकास को बढ़ावा दिया. भारत के विकास में असाधारण योगदान देने वाली तीन पंच वर्षीय योजनाओं की शुरुआत करने वाले पंडित नेहरु की नीतियों से देश में कृषि और उद्योग के नए युग की शुरुआत हुई,जो वर्ण-व्यवस्था द्वारा सदियों से शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत हिन्दू तबकों के जीवन में बड़ा बदलाव लाने में बुनियादी काम किया!
संघ की सामाजिक – आर्थिक सोच की राह का बड़ा अवरोध: गांधी परिवार
नेहरु के हिन्दू राष्ट्र विरोधी विचार का अनुसरण उनके परिवार के बाद के लोग भी करते रहे. कुछ कमियों और सवालों के बावजूद इंदिरा गांधी ने वर्ण-व्यवस्था के वंचित हिन्दुओं के जीवन में बदलाव लाने के लिए गरीबी उन्मूलन , सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता वाली नीतियाँ बनाया . उनकी नीतियों में भूमि सुधार, राजाओं के प्रिवी पर्स का खात्मा, बैंकों , एलआईसी , खदानों इत्यादि के राष्ट्रीयकरण और 20 सूत्रीय कार्यक्रम से वंचितों के जीवन में बड़े बदलाव आए.उनके सौजन्य से सर्वाधिक वंचित दलित हिन्दुओं को मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज के एडमिशन में आरक्षण मिला और उनमें एक ऐसा मध्य वर्ग उभरा जो साहित्य सृजन के साथ सामाजिक और राजनीतिक संगठनों के निर्माण में भारी अर्थदान कर सका. अनिच्छा पूर्वक राजनीति में आए इंदिरा गांधी के योग्य पुत्र राजीव गांधी भी अल्पआयु में निधन के पूर्व कुछ ऐसे काम कर गए ,जो संघ की सामाजिक- आर्थिक व्यवस्था की राह में बड़ा अवरोध साबित हुआ. 18 साल की उम्र में वोट का अधिकार दिलाने और पंचायती राज अधिनियम के जरिये गावों की आबादी को अपना फैसला खुद करने की आजादी देने वाले राजीव गांधी ने दो ऐसे काम किये जो संघी सामाजिक- आर्थिक व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती साबित हुए. पहला, कम्प्यूटर क्रांति! राजीव गांधी की कम्प्यूटर क्रांति संभवतः भारत की सबसे बड़ी क्रांति है, जिसकी जद में आज दो वर्ष के बच्चे तक आ गए है. उनकी उस क्रांति का विरोध संघ परिवार सहित अधिकांश दलों ने किया था. उन्होंने जब दिल्ली में एटीएम मशीन लगाई आरएसएस ने भारत बंद का आह्वान कर दिया था. उनकी इस क्रांति ने वर्ण- व्यवस्था से अंधकारमय हुए भारत में सूचना और ज्ञान का आलोक फैला दिया था. अगर उन्होंने यह क्रांति नहीं की होती तो आज भारत के युवा, जिसमें सुविधाभोगी के साथ वंचित हिन्दुओं के युवा भी शामिल हैं,किस स्थिति में होते ,उसकी कल्पना कर रोंगटे खड़े हो जायेंगे. कम्प्यूटर क्रांति के साथ 1986 की अपनी शिक्षानीति के जरिये राजीव गांधी ने अज्ञानता के अंधकार में घिरे गावों की प्रतिभाओं को सर्वोच्च स्तर की शिक्षा मुहैया कराने के लिए देश भर में जवाहर नवोदय विद्यालयों की जो श्रृंखला खड़ी की उससे गुरुकुल शिक्षा के हिमायतियों के होश उड़ गए और वे आज भी उन्हें माफ़ नहीं कर पाए हैं! उनका दलित – उत्पीड़न निवारण अधिनियम- 1989 भी संघ को कभी नहीं भाया! प्रधानमंत्री का पद ठुकराने वाली नेहरु- गांधी परिवार की बहू सोनिया- गांधी कभी अपनी सास और पति की भांति सत्ता की बागडोर तो नहीं थामीं ,किन्तु उनके योग्य मार्गदर्शन में ढेरों ऐसे काम हुए जो हिन्दू राष्ट्रवादियों के लिए भारी पीड़ादायक रहे. सबसे पहले तो उन्होंने धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय के डॉ. मनमोहन सिंह को पीएम बनाकर उन्हें निराश किया. बाद में उसी मनमोहन सिंह ने सोनिया गांधी के मार्गदर्शन में भारतीय अर्थव्यवस्था को उंचाई देने का ऐतिहासिक काम किया. उनकी नीतियों से भारत एक विश्व आर्थिक महाशक्ति बना और देश में विशाल मध्यम वर्ग का उदय हुआ, जिसमें जन्मजात वंचित हिन्दुओं : दलित, आदिवासी,पिछड़ों और महिलाओं की भी हिस्सेदारी रही. मनमोहन सिंह की उसी अर्थनीति की फसल आज मोदी भी काट रहे हैं. मनरेगा, शिक्षा का अधिकार, स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार , सामाजिक सुरक्षा योजनाओं इत्यादि के हिन्दू वंचितों के जीवन में सुधार लाने वाले कार्य सोनिया गांधी की ही देखरेख में हुए. उन्हीं की देखरेख में 2006 में उच्च शिक्षा में और 2012 में पिछड़ों को पेट्रोलियम प्रोडक्ट के वितरण में आरक्षण मिला; उन्हीं के दौर में मध्य प्रदेश से डाइवर्सिटी की आइडिया निकली, जिसके फलस्वरूप आज दलित, आदिवासी, पिछड़ों जैसे वंचित हिन्दुओं में नौकरियों से आगे बढ़कर सप्लाई, डीलरशिप, ठेकेदारी, मीडिया इत्यादि में हिस्सेदारी की चाह पैदा हुई, जिसका ऐतिहासिक असर सामने आने लगा है. सोनिया गांधी की देखरेख में ही फरवरी , 2023 में कांग्रेस की ओर से पहली बार सामाजिक न्याय का पिटारा खुला, जिसे आगे बढ़ाते हुए उनके पुत्र राहुल गांधी हिन्दू राष्ट्र की राह में सबसे बड़ी चुनौती बन गए हैं !
हिन्दू राष्ट्र की राह में सबसे बड़ी चुनौती : राहुल गांधी
अगर हिन्दुत्ववादियों की अमानवीय सामाजिक- आर्थिक सोच की राह में चुनौती खड़ी करने में नेहरु- गांधी परिवार में कोई कमी रह गई तो उसे पूरा करते दिख रहे हैं, राहुल गांधी , जिनमें लोग नेहरु- इंदिरा- राजीव और सोनिया गांधी का मिलाजुला अक्स देख रहे है. भारत के इतिहास में एक महान जननायक के रूप में उभर चुके राहुल गांधी आज हिन्दू राष्ट्र की राह में एवरेस्ट बनकर खड़े हो गए. भारत के इतिहास में मनुवादी व्यवस्था के जरिये सामाजिक अन्याय का जो विशाल अध्याय रचित हुआ, उसकी उपलब्धि करते हुए राहुल गांधी ने घोषणा कर दिया है कि सामाजिक और आर्थिक अन्याय सबसे बड़ी समस्या है और सामाजिक न्याय लागू करके ही भारत को सुन्दर और समतामूलक बनाया जा सकता है. आज जननायक राहुल के ‘जितनी आबादी – उतना हक़’ के नारे से भारत का चप्पा –चप्पा गूंज रहा है. जिस दिन कांग्रेस सत्ता में आई उस दिन राहुल गांधी का जितनी आबादी- उतना हक़ सिद्धांत 90 % वंचित हिन्दुओं को शक्ति के स्रोतों में वाजिब हिस्सेदारी मार्ग प्रशस्त करा देगा . तब संघ का थोड़े से सुविधाभोगी वर्ग के हिन्दुओं के हाथों में शक्ति के समस्त स्रोत सौंपने का सपना धूलिसात हो जायेगा. ऐसा न हो ,इसके लिए संघ देश में वह माहौल बनाने जुट गया है जो महात्मा गांधी की हत्या के पूर्व बनाया था.आइये आज राष्ट्रपिता की 157 वीं जयंती के दिन संकल्प लें कि जिन लोगों ने बापू की हत्या की उनकी सामाजिक- आर्थिक सोच को कभी साकार नहीं होने देंगे!
(लेखक उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के विचार विभाग के चेयरमैन हैं )
