Reservation Protest : आरक्षण विरोध का मनोवैज्ञानिक
Reservation Protest : महामारी का रूप अख्तियार कर चुका आरक्षण विरोध, खासकर, 1990 में मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद से ही यह महामारी सामने आना शुरू हुई.
लेखन: एच एल दुसाध
Delhi : आप मानें या न माने वर्षों से आरक्षण विरोध भारत में एक महामारी का रूप ले चुका है. खासकर, 1990 में में मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद से ही यह महामारी सामने आना शुरू हुई. तब आरक्षण के विरोध में ही भाजपा के एलके अडवाणी ने सितम्बर 1990 से रथ यात्रा निकाल कर मंदिर आन्दोलन को हवा दिया, जिसके फलस्वरूप देश की बेशुमार संपदा और असंख्य लोगों की प्राण हानि हुई. आरक्षण के विरोध में मदिर आन्दोलन चलाकर ही भाजपा सत्ता में आई और उस राजसत्ता का इस्तेमाल उसने सरकारी संस्थानों को बेचने और बेचने और देश का माहौल विषाक्त बनाने में किया. उसके बाद कई ऐसे मौके आए जब आरक्षण विरोधी लोग शहीदी तेवर के साथ सड़कों पर उतरे और देश में गृह- युद्ध के हालात पैदा किए ।हालाँकि गृह –युद्ध के हालात पैदा होने के बावजूद देश इससे बचा रहा, लेकिन समय-समय पर आरक्षण विरोध की लहरे उठती रहीं. पहले इसमें सामान्यतया सवर्ण युवा नजर आते थे , अब जागतिक समस्यायों से निर्लिप्त रहने वाले साधु- संत भी मैदान में उतर आते हैं. बहरहाल शक्ति के समस्त स्रोतों(आर्थिक-राजनीतिक- शैक्षिक- धार्मिक ) पर सवर्णों का एकाधिकार देखते हुए उनका आरक्षण विरोध विस्मित करने वाला मामला लगता है. मई 2024 में प्रकाशित ‘ वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब’ की रिपोर्ट के मुताबिक़ 89 % धन-दौलत पर सामान्य वर्ग का कब्जा रहा. वहीँ उस रिपोर्ट के मुताबिक विशाल संख्यक पिछड़ा वर्ग 9 % पर तो दलित वर्ग सिर्फ 2. 6 % धन पर जीवन निर्वाह के लिए विवश रहा. आज यदि कोई ध्यान से देखे तो पता चलेगा कि पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमें 80 से 90 % फ्लैट्स सामान्य वर्ग अर्थात सवर्णों के हैं. मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शौपिंग मॉलों में 80-90 % दुकानें इन्हीं की हैं. चारसे आठ-दस लेन की सडकों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता हैं , उनमें 90 % से ज्यादे गाड़ियाँ इन्हीं की होती हैं. देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर प्रायः तमाम चैनल्स इन्हीं के होते हैं. फिल्म और मनोरंजन तथा ज्ञान- उद्योग पर 90 % से ज्यादा कब्ज़ा इन्हीं का है. संसद- विधानसभाओं में वंचित वर्गों के जन प्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो, किन्तु मंत्रिमंडलों में दबदबा इन्हीं का रहता है. मंत्रिमंडलों के लिए गए फैसलों को अमली जामा पहनने वाले 80 से 90 % अधिकारी इन्हीं वर्गों से हैं. न्यायिक सेवा, शासन-प्रशासन , उद्योग-व्यापार , फिल्म-मीडिया , धर्म और ज्ञान सेक्टर में सवर्णों जैसा दबदबा आज की तारीख दुनिया के किसी भी समुदाय में नजर नहीं आएगा !
आरक्षण विरोध के पीछे की इनविजिबल साइक्लोजी
अतः भारत का जो तबका हजारों साल से हिन्दू आरक्षण व्यवस्था(वर्ण- व्यवस्था ) का प्रायः शतप्रतिशत भोग किया एवं जिसका आज भी शक्ति के स्रोतों पर उसका कब्ज़ा उसके संख्यानुपात से पांच से छः गुना ज्यादा है, वह क्यों सब समय दुनिया के सबसे अधिकार विहीन मानव समुदायों(एससी, एसटी,ओबीसी) के आरक्षण(प्रतिनिधित्व) के खिलाफ विरोध की तरंगे पैदा करते रहता है, यह खुद में दुनिया का भारी विस्मय है, जिसका मनोवैज्ञानिक अध्ययन भी हुआ है! ढेरों समाज विज्ञानियों के मुताबिक सवर्णों द्वारा आरक्षण विरोध के पीछे एक इनविजिबल साइक्लोजी काम करती है . आरक्षण का विरोध करने वाले सवर्ण (सामान्य वर्ग) के मानस में कई सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारक काम करते हैं। इसे ‘ योग्यता का भ्रम’ (Myth of Meritocracy), ‘वंचित होने का डर’ (Fear of Deprivation) और ‘सांस्कृतिक पहचान का संकट’ के रूप में समझा जा सकता है।समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर, सवर्णों द्वारा आरक्षण विरोध के पीछे छुपी अदृश्य साइकोलॉजी (Psychology) के मुख्य पहलू निम्नलिखित हैं:1- योग्यता का भ्रम (Myth of Meritocracy)व्यक्तिगत प्रयास बनाम विशेषाधिकार: सवर्ण मानसिकता अक्सर यह मानती है कि सफलता केवल कड़े परिश्रम और व्यक्तिगत प्रतिभा (Merit) से मिलती है। वे अपनी सफलता में अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक पूंजी (Social and Cultural Capital) के योगदान को नहीं देख पाते।ऐतिहासिक संदर्भ की अनदेखी: इस साइकोलॉजी में यह स्वीकार करना मुश्किल होता है कि सदियों से मिले सामाजिक विशेषाधिकारों के कारण उनकी शुरुआती रेखा (Starting Line) वंचित वर्गों से बहुत आगे है।2- शून्य-योग खेल की मानसिकता (Zero-Sum Game Mentality)दूसरे की जीत, अपनी हार: आरक्षण विरोधी मानसिकता इसे एक ‘शून्य-योग खेल’ की तरह देखती है। इसका मतलब है कि अगर किसी आरक्षित वर्ग के व्यक्ति को नौकरी या सीट मिलती है, तो सवर्ण को लगता है कि उसका अवसर ‘छीन’ लिया गया है।सापेक्षिक अभाव (Relative Deprivation): भले ही सवर्ण आर्थिक रूप से मजबूत हों, लेकिन जब वे किसी वंचित वर्ग के व्य क्ति को आगे बढ़ते देखते हैं, तो उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से अपने स्तर में गिरावट या नुकसान का अहसास होता है।3.- स्थिति और वर्चस्व खोने का सामाजिक डर (Status Anxiety): पारंपरिक सामाजिक संरचना में सवर्ण हमेशा शीर्ष पर रहे हैं। आरक्षण के कारण जब निचले पायदान के लोग नीति-निर्माण, प्रशासन और उच्च पदों पर बैठते हैं, तो सवर्णों की ‘चेतना’ को ठेस पहुंचती है।पहचान का संकट: समानता की प्रक्रिया को अक्सर सवर्ण समाज अपने विशेषाधिकारों पर हमले और अपनी सामाजिक पहचान के अवमूल्यन के रूप में देखता है। 4- आर्थिक असुरक्षा और संसाधनों का सीमित अवसर: आधुनिक समय में सरकारी नौकरियों और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अवसर बेहद सीमित हैं। इस भारी प्रतिस्पर्धा में जब अवसर और कम होते दिखते हैं, तो असुरक्षा की भावना गुस्से और विरोध के रूप में बाहर आती है।5- गरीबी का तर्क: सवर्णों में भी एक बड़ा वर्ग आर्थिक रूप से कमजोर है। उनका मानना है कि जाति के बजाय केवल आर्थिक स्थिति (Economic Status) ही आरक्षण का आधार होनी चाहिए, क्योंकि वे जातिगत भेदभाव की अदृश्य ताने-बाने को महसूस नहीं कर पाते।5. ऐतिहासिक अपराधबोध से इनकार (Denial of Historical Guilt)’मैंने क्या किया?’ वाली भावना: आधुनिक सवर्ण युवा पीढ़ी का तर्क होता है कि अतीत में हुए जातिगत भेदभाव के लिए वे जिम्मेदार नहीं हैं। इसलिए, उनके अवसरों को कम करके अतीत की गलतियों को क्यों सुधारा जा रहा है? यह सोच सदियों से संचित सामाजिक असमानता को दूर करने की सामूहिक जिम्मेदारी से इनकार करती है!
आरक्षण विरोध की इनविजिबल साइक्लोजी की जड़ें: मानव सृष्टि में हिंदू धर्म के दैवीय सिद्धांत में
बहरहाल आरक्षण विरोध के पीछे जो इनविजिबल साइक्लोजी क्रियाशील रहती उसकी की जड़ें मानव सृष्टि में हिंदू धर्म के दैवीय सिद्धांत में निहित है। स्मरण रहे जितने भी ईश्वर विश्वासी संगठित धर्म हैं, सबकी मानव सृष्टि में अपनी- अपनी दैवीय सिद्धांत (divine theory) हैं । इस्लाम, ईसाई धर्मों के दैवीय सिद्धांत के मुताबिक उनके भगवानों ने जोड़ा जोड़ा नर मादा के रूप में मनुष्य पैदा किए, वही हिंदुओं के दैवीय सृष्टि सिद्धांत के मुताबिक ईश्वर ने अपने भिन्न- भिन्न अंगों से गुण कर्म के आधार पर भिन्न भिन्न प्रजाति के मनुष्य पैदा करने के साथ उनके अधिकार और कर्तव्य निर्धारित किए। इस थ्योरी के मुताबिक हिंदू ईश्वर के उत्तमांग ( मुख, बाहु, जंघे जैसे best organ) से पैदा हुए पुरुषों को शक्ति के स्रोतों के भोग का दैवीय अधिकारी / एकाधिकारीघोषित किया गया। हिंदू ईश्वर के उत्तमांग के विपरीत उसी के जघन्य अंग ( पैर जैसे worst organ ) से जन्मे लोगों के लिए शक्ति के स्रोतों का भोग अधर्म घोषित करते हुए उनके हिस्से में डाल दिया गया ईश्वर के उत्तमांग से जन्मे तीन उच्चतर वर्णों की सेवा, वह भी पारिश्रमिक रहित: service without ramuneration! हिंदुओं के इस डिवाइन थ्योरी ने ब्राह्मण,क्षत्रिय और वैश्य पुरुषों में खुद को शक्ति के स्रोतों के भोग अधिकारी वर्ग मानने की मानसिकता पैदा कर दी। यही वह अदृश्य मनोवैज्ञानिक कारण है ,जिससे शुद्रातिशूद्रों को अपनी तरह खुशहाल व शक्ति संपन्न देखकर उनके सीने पर सांप लौटने लगता है। बहरहाल मानव सृष्टि में हिन्दुओं का यही वह दैवीय- सिद्धांत है जिस कारण हिन्दू भगवान के उत्तमांग से जन्मे विशुद्ध हिंदू( सवर्ण) कभी उसी ईश्वर के जघन्य अंग (पैर) से जन्मे लोगों को रत्ती भर भी अधिकार देने की मानसिकता से पुष्ट न हो सके। हिंदू धर्म के इसी दैवीय- सिद्धांत के कारण 92. 5 % गैर- सवर्ण आबादी चिरकाल के लिए शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत होने के लिए अभिशप्त हुई ।हिंदू धर्म की शक्ति के स्रोतों के बंटवारे वाले दैवीय – सिद्धांत के कारण ही भारत में 92.5% आबादी ( दलित, आदिवासी, पिछड़ों और आधी आबादी, जिसमें सवर्ण महिलाएं भी हैं) के मानव संसाधन का जो दुरूपयोग हुआ, वह मानव जाति के इतिहास की बेनजीर घटना है!
संविधान में है हिंदू धर्म के अन्यायपूर्ण अर्थशास्त्र के प्रतिकार की ताकत
हिंदू धर्म के शक्ति के स्रोतों के बंटवारे वाले इसी अर्थशास्त्र को ध्वस्त करने का अभियान ज्योतिबा फुले, शाहू जी,पेरियार इत्यादि से शुरू हुआ,जिसमें डॉ आंबेडकर के प्रयत्नों से कुछ हद तक पूर्णता मिली।फुले ने 1873 में जिस आरक्षण प्रणाली का सूत्र गुलामगिरी में दिया ,उसे व्यापकता प्रदान किया डॉ आंबेडकर ने संविधान की उद्देशिका में भारत के लोगों को तीन न्याय: सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक का प्रावधान रचकर किया।संविधान में इस तीन न्याय की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि हिंदू धर्म की डिवाइन थ्योरी ने 7.5 % उच्च वर्णो को छोड़कर शेष आबादी को हजारों साल से शक्ति के स्रोतों से सम्पूर्ण रूप से बहिष्कृत करके रखा था। संविधान की उद्देशिका में उल्लिखित तीन न्याय के प्रावधान हिंदू धर्म के चरम अन्यायपूर्ण अर्थशास्त्र का प्रतिकार करते हैं।लेकिन संविधान प्रदत्त ये अधिकार उच्च वर्ण समुदायों को दैवीय अधिकार वाले सिद्धांत के कारण कभी रास नहीं आए,क्योंकि मानव सृष्टि में हिंदू धर्म के दैवीय सृष्टि सिद्धांत ने उच्च वर्ण हिंदुओं को विशुद्ध अमानुष और बर्बर मानव समुदाय में तब्दील कर रखा था, जिससे उनमें अपने ही बहिष्कृत सहधर्मियों को शक्ति के स्रोतों में हिस्सेदारी देने की मानसिकता ही विकसित न हो सकी । इसलिए हिन्दू धर्म के दैवीय सिद्धांत के विश्वासी शासक आजाद भारत में मुकम्मल समतामूलक भारत का निर्माण न कर सके! लेकिन आजादी के शुरुआती 50 ,60 सालों तक जो उच्च वर्ण के लोग सत्ता पर काबिज रहे ,वे हिन्दू धर्म के दैवीय सिद्धांत में आस्था के कारण संविधान के प्रावधानों को लागू करने में सर्वशक्ति नहीं लगाए,बावजूद इसके आजाद भारत के शुरुआती चार -पांच दशकों में काफी हद तक संविधान में उल्लिखित तीन न्याय लागू हुए।लेकिन आज हिंदू धर्म का ठेकेदार बनी जो पार्टी सत्ता में है वह हिंदू धर्म की डिवाइन थ्योरी में 100% आस्था के कारण यह मन प्राण से विश्वास करती है कि हिंदू ईश्वर के घटिया अंग से जन्मी 90% से अधिक आबादी के लिए शक्ति के स्रोतों का भोग अधर्म है।इसलिए वह संविधान को कागजों की शोभा बनाकर मनु का विधान लागू करने के करीब पहुंच गई।इसी हिंदुत्ववादी सरकार का शह पाकर उच्च वर्ण छात्र,ब्यूरोक्रेट्स, न्यायाधीश से लेकर जागतिक चिंताओं निर्लिप्त साधु- संत तक आज आरक्षण के खात्मे से लेकर उसे कमजोर करने की तरकीबें ढूंढने सर्वशक्ति लगाते रहते है।कारण,आरक्षण हिंदू धर्म के गुण- कर्म सिद्धांत की अनदेखी कर हिंदू धर्म के 90% से अधिक सर्वहाराओं ( डिवाइन प्रोलोटेरियट्स)को भी शक्ति के स्रोतों के भोग का अधिकार देकर हिंदू धर्म को असहाय बनाता है । तो आज हिंदू जिस इनविजिबल साइक्लोजी के चलते आरक्षणवादियों से कुपित है,उसकी जड़े मानव सृष्टि में हिंदू धर्म की डिवाइन थ्योरी में निहित हैं! और हिंदुत्व धर्म के एकाधिकारी वर्ग में जबतक दुनिया के अन्य समाजों के लोगों की भांति समत्व की मानसिकता विकसित नहीं होती वे अपनी इनविजिबल साइक्लोजी के चलते आरक्षण के खिलाफ अभियान चलाते रहेंगे!
सामने आना बाकी है : आरक्षण विरोध की इनविजिबल साइक्लोजी का भयावह रूप
बहरहाल इनविजिबल साइक्लोजी के चलते 7.5% डिवाइन राइट्स वाले वर्गों की बर्बरता का और वीभत्स रूप देखते के लिए राष्ट्र को मानसिक रूप से तैयार रहना होगा।क्योंकि अभी आरक्षण बहुत सीमित पैमाने पर लागू हुआ है: कहा जा सकता है आरक्षण शैशवावस्था में है।अभी यह शक्ति के समस्त स्रोतों : सप्लाई, डीलरशिप, ठेकेदारी,पार्किंग- परिवहन,आउट सोर्सिंग जॉब, फिल्म – मीडिया, राम मंदिर, शिरडी के साईं बाबा, तिरुपति इत्यादि मंदिरों की हजारों- हजारों करोड़ वाली अर्थव्यवस्था इत्यादि तक प्रसारित नहीं हुआ है । लेकिन कल भारत की सत्ता जिस जननायक राहुल गांधी के हाथ में आनी है, उनकी घोषणाओं पर भी ध्यान देने पर लगता है इनविजिबल साइक्लोजी का पूरा उग्र रूप सामने आना बाकी है! राहुल गांधी हिंदुत्व के अर्थशास्त्र के सौजन्य से सदियों से चली आ रही अन्याय की धारा को रूद्ध करने का संकल्प ले लिए है।उनका कहना है सामाजिक और आर्थिक अन्याय सबसे बड़ी समस्या है और देश में सामाजिक और आर्थिक न्याय लागू करके ही इसे सुंदर व समतामूलक बनाया जा सकता है. इसके लिए वह शक्ति के स्रोतों में जितनी आबादी, उतना हक लागू करने का संकल्प ले चुके हैं।वह कहे जा रहे हैं: ‘ देश चलाता कौन है? किसी भी देश को उसकी उत्पादक शक्ति चलाती है।ऐसे में सवाल उठता है कि अगर उत्पादक शक्ति देश को औजार देती है, ये इमारते देती है तो उसकी शक्ति के खून पसीने के लिए देश क्या देता है? मेरा लक्ष्य है हिन्दुस्तान में इस उत्पादक शक्ति को रिस्पेक्ट और हिस्सेदारी मिले!’ जननायक कहे जा रहे कि मैं ऐसा दिन देखना चाहता हूं जब हिंदुस्तान की हर संस्था और हर सिस्टम में , लीडरशिप में दलित, आदिवासी, पिछड़े हों: मैं वह दिन देखना चाहता हूं जब हिंदुस्तान की टॉप 10 कंपनियों का मालिक दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्ग से हों; वे अखबारों के मालिक बनें, वे प्राइवेट यूनिवर्सिटीयों के वीसी बनें! मैं इसके लड़ रहा हूं और आगे भी लड़ता रहूंगा!’ हिंदू धर्म का प्रभु वर्ग तो सिर्फ सीमित पैमाने पर लागू अक्ष से ही परेशान है,उधर जननायक ने कह दिया है,बात आरक्षण से नहीं बनेगी,मुकम्मल सामाजिक न्याय के लिए ‘पॉवर स्ट्रक्चर’ में जितनी आबादी ,उतना हक लागू करना पड़ेगा. उन्होंने सामाजिक न्याय को बुलंदी प्रदान करने वाले ‘जितनी आबादी, उतना हक’ सिद्धांत को ब्यूरोक्रेसी, न्यायपालिका, सेना, शिक्षण संस्थाओं, मीडिया, सप्लाई इत्यादि के साथ शक्ति के समस्त स्रोतों तक प्रसारित करने की घोषणा दिया है।और लोगों को पूरा विश्वास की जिस दिन कांग्रेस सत्ता में आएगी आरक्षण का दायरा शक्ति के समस्त स्रोतों तक प्रसारित होगा ही होगा.हिंदुओं का प्रभु वर्ग हिंदू धर्म के मानव सृष्टि में दैवीय सिद्धांत में विश्वास के चलते जननायक की समतामूलक भारत निर्माण की योजनाओं के प्रति मानवतावादी दृष्टिकोण अपना पाएगा,इसमें संदेह है.ऐसे में इनविजिबल साइक्लोजी का भयावह रूप देखने के लिए हिंदुओं के डिवाइन प्रोलोतेरीयत वर्ग को खुद को मानसिक रूप से तैयार रखना पड़ेगा!
( लेखक उत्तर प्रदेश कांग्रेस के विचार विभाग के चेयरमैन हैं )
