Ayodhya Ram Mandir donation Scan: अयोध्या चोरी प्रकरण: छाती पीटने का औचित्य क्या?

Ayodhya Ram Mandir donation Scan: देश के कोने-कोने से एक ही आवाज़ सुनाई दे रही है कि अयोध्या में राम मंदिर के चढ़ावे को लेकर कथित बड़े घोटाले की चर्चा है।

गौतम राणे सागर

न्यूज इंप्रेशन 

Lucknow: देश के कोने-कोने से एक ही आवाज़ सुनाई दे रही है कि अयोध्या में राम मंदिर के चढ़ावे को लेकर कथित बड़े घोटाले की चर्चा है। प्रबंधन समिति पर चढ़ावे में हेराफेरी के आरोप लगाए जा रहे हैं। प्रश्न यह उठता है कि क्या स्वयं रामलला ने लोगों को बताया कि उनके चढ़ावे का दुरुपयोग हुआ है? यदि नहीं, तो यह बात सामने आई कैसे? एक और प्रश्न भी विचारणीय है। जब आस्था के आधार पर हम यह स्वीकार करते हैं कि भगवान राम सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी हैं, तब उनके सामर्थ्य पर संदेह करने का औचित्य क्या है? यदि चढ़ावे का धन उनका है, तो उसकी रक्षा की जिम्मेदारी भी उन्हीं की मानी जाएगी। दान की वस्तु का लेखा-जोखा रखना किस प्रकार की आस्था का प्रतीक है? दान वह है जिसे अपने आराध्य के चरणों में समर्पित कर दिया जाए और फिर उसके प्रतिफल या उपयोग की अपेक्षा न रखी जाए। समर्पण के बाद यदि दाता उसका हिसाब मांगने लगे, तो दान का भाव ही समाप्त हो जाता है। जो लोग इस कथित प्रकरण को अत्यधिक बड़ा मुद्दा बना रहे हैं, संभव है कि उनकी चिंता का केंद्र धार्मिक आस्था से अधिक राजनीतिक लाभ-हानि हो। यदि किसी की आस्था वास्तव में अपने आराध्य में है, तो उसे उनके न्याय, सामर्थ्य और दंड देने की क्षमता पर भी विश्वास होना चाहिए। कौन जानता है कि जो कुछ हुआ या हो रहा है, वह भी किसी ऐसी व्यवस्था का हिस्सा हो जिसे मनुष्य समझने में सक्षम न हो?

सभी सजग नागरिकों से मेरा निवेदन है कि वे अपने-अपने कार्यक्षेत्र में आत्ममंथन करें। क्या हम सब अपने-अपने दायित्वों का निर्वहन पूर्ण ईमानदारी से करते हैं? क्या प्रभावशाली पदों पर बैठे सभी लोग बिना किसी अनुचित लाभ की अपेक्षा के प्रत्येक कार्य कर देते हैं? और यदि कोई उन्हें भ्रष्ट कह दे, तो क्या वे उसे सहज स्वीकार कर लेते हैं? दूसरी ओर, जो लोग वास्तव में ईमानदार होते हैं, वे अनुचित लाभ के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं।

इसी दृष्टांत को रामलला के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। वे भक्तों की प्रार्थनाएँ सुनते हैं, उनकी याचनाओं पर विचार करते हैं और उचित इच्छाओं की पूर्ति भी करते हैं। हमारे पास जो कुछ भी है, वह उनके आशीर्वाद का ही परिणाम माना जाता है। ऐसे में क्या वे अपने ही दिए हुए ऐश्वर्य में से कोई हिस्सा चाहेंगे? वे आराध्य हैं, निवेशक नहीं। इसलिए उन्हें रिश्वत या लेन-देन की मानसिकता से जोड़ना उनकी महिमा का अवमूल्यन है। यदि उन्होंने भक्तों का चढ़ावा स्वीकार न किया हो, तो वह मनुष्यों के हाथों में चला गया—यह मनुष्य की प्रवृत्ति का प्रश्न हो सकता है, ईश्वर की आवश्यकता का नहीं। मेरा मानना है कि आराध्य रिश्वतखोर नहीं होते। देवताओं को भक्तों के धन की आवश्यकता नहीं होती। यदि वास्तव में ईश्वर की मर्यादा का सम्मान करना है, तो उनके नाम पर चढ़ावे की परंपरा पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। वे असीम शक्तियों के स्वामी हैं; भौतिक संपत्ति और माया से सदा निर्लिप्त हैं।

(राष्ट्रीय संयोजक, संविधान संरक्षण मंच)

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