Crony Capitalism: क्रोनी कैपिटलिज़्म : क्या लोकतंत्र धीरे-धीरे कॉर्पोरेट तंत्र में बदल रहा है?
Crony Capitalism: आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या लोकतंत्र वास्तव में जनता के हाथ में है, या फिर वह धीरे-धीरे पूँजी और सत्ता के गठजोड़ के नियंत्रण में जा रहा है?
गौतम राणे सागर
Lucknow: भारत स्वयं को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है, परंतु आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या लोकतंत्र वास्तव में जनता के हाथ में है, या फिर वह धीरे-धीरे पूँजी और सत्ता के गठजोड़ के नियंत्रण में जा रहा है? क्या चुनावी राजनीति अब जनहित से अधिक कॉर्पोरेट हितों के इर्द-गिर्द घूमने लगी है? यदि हाँ, तो यह केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संकट भी है।
क्रोनी कैपिटलिज़्म की सबसे खतरनाक विशेषता यह है कि यह खुले तानाशाही मॉडल की तरह दिखाई नहीं देता। यहाँ संविधान बना रहता है, चुनाव होते रहते हैं, संसद चलती रहती है, मीडिया बहस करता दिखाई देता है; लेकिन नीति निर्माण की दिशा धीरे-धीरे कुछ चुनिंदा आर्थिक समूहों के हित में मुड़ने लगती है।
सत्ता और पूँजी का गठबंधन कैसे बनता है?
जब सरकारें बड़े उद्योगपतियों को “राष्ट्र निर्माण का साझेदार” बताकर विशेष रियायतें देने लगती हैं, जब सरकारी संपत्तियों का निजीकरण सीमित समूहों तक सिमटने लगे, जब छोटे व्यापारियों की तुलना में बड़े कॉर्पोरेट घरानों को नीति और वित्तीय ढाँचे में अधिक सुविधा मिले — तब क्रोनी कैपिटलिज़्म जन्म लेता है।
यह गठबंधन कई स्तरों पर काम करता है
चुनावी चंदा, मीडिया नियंत्रण, नीति निर्माण पर प्रभाव, सरकारी ठेकों का केंद्रीकरण, बैंकिंग और वित्तीय संरक्षण, और प्रशासनिक दबाव। धीरे-धीरे लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति नागरिक से हटकर “नेटवर्क” के पास चली जाती है।चुनाव महँगे हुए, राजनीति कॉर्पोरेट निर्भर हुई।भारत में चुनाव अब वैचारिक संघर्ष से अधिक संसाधनों का युद्ध बनते जा रहे हैं। जिस राजनीतिक दल के पास अधिक धन, मीडिया पहुँच और डिजिटल प्रचार तंत्र है, उसकी राजनीतिक क्षमता भी उतनी अधिक दिखाई देती है। यही कारण है कि राजनीतिक दल बड़े कॉर्पोरेट चंदों पर निर्भर होते चले गए। परिणामस्वरूप नीतियाँ भी उन्हीं आर्थिक शक्तियों के अनुकूल बनने लगती हैं जो चुनावी व्यवस्था को वित्तीय ईंधन देती हैं।
यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है, क्योंकि गरीब नागरिक वोट तो दे सकता है, लेकिन नीति निर्माण को प्रभावित करने की उसकी क्षमता लगातार कमजोर होती जाती है।
मीडिया : चौथा स्तंभ या कॉर्पोरेट विस्तार?
लोकतंत्र में मीडिया का कार्य सत्ता से प्रश्न पूछना होता है। परंतु जब मीडिया संस्थानों का आर्थिक नियंत्रण बड़े औद्योगिक समूहों के हाथों में केंद्रित होने लगे, तब पत्रकारिता का चरित्र भी बदलने लगता है।
आज कई बार वास्तविक मुद्दे —
बेरोजगारी, किसान संकट, छोटे उद्योगों का पतन, आर्थिक असमानता, सार्वजनिक संपत्तियों का हस्तांतरण
मुख्य बहस से गायब दिखाई देते हैं; जबकि भावनात्मक और ध्रुवीकरण आधारित विषय राष्ट्रीय विमर्श पर हावी रहते हैं।
यह संयोग नहीं, बल्कि आधुनिक राजनीतिक-आर्थिक संरचना की रणनीति भी हो सकती है।
राष्ट्रवाद और बाजारवाद का नया गठबंधन
आधुनिक राजनीति में एक नया मॉडल उभरा है — आक्रामक राष्ट्रवाद और कॉर्पोरेट पूँजी का गठबंधन। जनता को सांस्कृतिक और भावनात्मक मुद्दों में व्यस्त रखा जाता है, जबकि आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण तेज़ी से आगे बढ़ता रहता है।
आम नागरिक धर्म, जाति और पहचान की बहसों में उलझा रहता है, जबकि दूसरी ओर:
प्राकृतिक संसाधनों का निजीकरण, सार्वजनिक संस्थानों का कमजोर होना, श्रम सुरक्षा में कमी, और बाजार पर कुछ बड़े समूहों का नियंत्रण लगातार बढ़ता जाता है।
यही क्रोनी राजनीति की सबसे बड़ी सफलता है — जनता को भावनात्मक रूप से सक्रिय रखना, लेकिन आर्थिक रूप से निष्क्रिय बनाना।
क्या मध्यम वर्ग भी भ्रम में है?
भारतीय मध्यम वर्ग अक्सर यह मान लेता है कि बड़े कॉर्पोरेट समूह “विकास” का प्रतीक हैं। लेकिन वास्तविक प्रश्न यह है कि विकास किसके लिए हो रहा है?
यदि GDP बढ़े लेकिन:
युवाओं को स्थायी रोजगार न मिले, छोटे उद्योग बंद हों, किसान कर्ज में डूबे रहें, उपभोक्ता महँगाई से परेशान रहे, और संपत्ति कुछ हाथों में केंद्रित होती जाए, तो यह विकास नहीं, बल्कि असमानता का संस्थागत विस्तार हो सकता है।
लोकतंत्र का भविष्य किस पर निर्भर करेगा?
लोकतंत्र केवल मतदान से जीवित नहीं रहता। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब:
आर्थिक शक्ति विकेंद्रीकृत हो, संस्थाएँ स्वतंत्र हों, मीडिया निर्भीक हो, न्याय व्यवस्था निष्पक्ष हो, और नागरिक राजनीतिक रूप से जागरूक हों। B. R. Ambedkar ने चेतावनी दी थी कि राजनीतिक समानता तब तक अधूरी रहेगी, जब तक आर्थिक और सामाजिक असमानता बनी रहेगी। आज भारत उसी ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है।
अजीब विडंबना है!
राष्ट्र के नाम पर सम्बोधन क्या गरीबों के छलने के हथियार बनते जा रहे हैं, गरीबों से ही हर त्याग की अपेक्षा क्यों? सरकार के सहयोग से देश की संपत्तियों पर सांप की तरह कुंडली मारकर बैठने वाले यह उद्योग घराने क्या राष्ट्र हो गये हैं, जिनके बचाव में हर बार सरकार का मुखिया खड़ा होकर देश के सामने हांथ फैलाकर त्याग की भीख मांगने लगता है कि; आप यात्रा न करें, सोना न खरीदे। जब आप विश्वगुरु होने का दंभ भरते हैं तब क्या आप में इतना भी विवेक नही है कि आपात स्थिति से निपटने की रणनीति समय से पहले ही बना लेनी चाहिए? उद्योग घरानों को अपनी कोख में इसीलिए बिठाकर रखते हैं ताकि जो धन गरीब अपना खून जलाकर और हड्डी गलाकर कमाया है, भविष्य की सुरक्षा और धन की बचत के लिए बैंकों में जमा कर रखा है उसे आप अपने चहेतों के विलासिता का संसाधन इकट्ठा करने के लिए कर्ज़ के नाम पर दान कर सके?
अंतिम प्रश्न
सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि क्रोनी कैपिटलिज़्म मौजूद है या नहीं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या लोकतंत्र के भीतर इतनी शक्ति बची है कि वह पूँजी और सत्ता के गठबंधन को संतुलित कर सके? यदि जनता केवल मतदाता बनकर रह गई और आर्थिक-राजनीतिक निर्णय कुछ प्रभावशाली नेटवर्कों तक सीमित हो गए, तो लोकतंत्र का बाहरी ढाँचा भले बना रहे, उसकी आत्मा धीरे-धीरे खो सकती है।
(राष्ट्रीय संयोजक, संविधान संरक्षण मंच)
