Women’s Reservation Bill: भाजपा का विधवा विलाप 

Women’s Reservation Bill: महिला आरक्षण विधेयक तो संसद में 2023 में भी पास हो चुका था। उस समय शरद यादव जैसे नेताओं ने यह भी सवाल उठाया था कि महिलाओं को राजनीति में आरक्षण मिले, पर दलित महिलाओं की तरह ही पिछड़ी जाति की महिलाओं को भी आरक्षण मिले। 

 

अलखदेव प्रसाद ‘अचल’ 

न्यूज इंप्रेशन 

Bihar: फिलहाल लोकसभा में भाजपा सरकार जिस नारी शक्ति वंदन अधिनियम को महिला आरक्षण विधेयक के नाम पर पास करवाना चाहती थी, जिसमें सफलता नहीं मिल सकी।उस विधेयक को औंधे मुंह गिर जाना पड़ा। दरअसल वह महिला आरक्षण विधेयक था ही नहीं। परन्तु जब भाजपाइयों का मंशा पूरा नहीं हुआ, तो गला फाड़ फाड़कर कह रहे हैं कि यहां का विपक्ष महिला विरोधी है। उनलोग नहीं चाहते हैं कि राजनीति के क्षेत्र में महिलाएं सशक्त हों।इसीलिए विपक्षियों ने इस विधेयक को पारित नहीं होने दिया। सबसे हास्यास्पद तो यह है कि एनडीए गठबंधन के नेता भी गठबंधन धर्म निभाने के लिए वही राग अलापते हुए विपक्षियों को महिला विरोधी ठहरा रहे हैं। चाहे मुख्य मीडिया में इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया हो या फिर प्रिंट मीडिया,सभी के सभी भाजपा सरकार के पक्ष से विपक्षियों को दोषी ठहराने में लगे रहे। क्योंकि उन्हें भी तो सरकार से ही विज्ञापन लेना है। फिर नैतिकता ताख पर चली जाए, तो चली जाए, क्या फर्क पड़ने वाला है?

महिला आरक्षण विधेयक तो संसद में 2023 में भी पास हो चुका था

सच तो यह है कि महिला आरक्षण विधेयक तो संसद में 2023 में भी पास हो चुका था। जिसमें विपक्ष भी खुलकर समर्थन किया था। पर उस समय शरद यादव जैसे नेताओं ने यह भी सवाल उठाया था कि महिलाओं को राजनीति में आरक्षण मिले, पर दलित महिलाओं की तरह ही पिछड़ी जाति की महिलाओं को भी आरक्षण मिले। अगर ऐसा नहीं होता है, तो जेनरल वर्ग की ही महिलाओं का वर्चस्व स्थापित हो जाएगा। पिछड़ी जाति की महिलाएं आज भी राजनीतिक और आर्थिक रुप से काफी पिछड़ी हुई हैं। जबकि भाजपा पिछड़े वर्गों की महिलाओं के पक्ष में इसलिए नहीं है कि जब पिछड़े वर्ग की महिलाएं राजनीति में आगे आ जायेंगी, तब हमलोगों का वर्चस्व नहीं रह सकेगा। भाजपा सरकार को राजनीति में महिला आरक्षण से कोई मतलब नहीं है। अगर भाजपा या भाजपा गठबंधन को महिलाओं के आरक्षण से मतलब रहता, तो अपनी ही पार्टी में महिलाओं को सर्वोच्च पदों पर जरुर रखते। महिलाओं को लोकसभा या विधानसभा में महिलाओं को 33% आरक्षण जरुर देते। पर ऐसा नहीं देखा जा रहा है। जबकि इसका अनुपालन विपक्ष भी नहीं कर रहा है। फिर भाजपाई या भाजपा सरकार के पक्षधर किस मुंह से ऐसा कह रहे हैं कि हमलोग तो नारी शक्ति वंदन विधेयक सदन में पास करवा कर नारियों को सशक्त बनाना चाहते हैं, पर विपक्ष इसमें बाधक बन रहा है। उन लोगों का यह आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद है। ये वे ही लोग हैं, जिनकी सरकार में सबसे अधिक महिलाओं की इज्ज़त तार तार होती रही हैं और ये लोग न सिर्फ ख़ामोश रहे हैं, बल्कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बलात्कारियों के पक्ष में खड़े रहे हैं। ऐसे तो अनगिनत उदाहरण हैं,पर कुछ दृष्टांतों के साथ उनके चरित्र को देखा जा सकता है।

सरकार में नारियां सिर्फ अपमानित होती रही हैं, सम्मान की बात क्या करेगा?

जिस दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सदन में महिला वंदन पर ज्ञान पेल रहे थे और यह साबित करने में लगे थे कि हमलोग तो महिलाओं को सम्मान देना चाहते हैं, पर विपक्ष बाधक बन जाता है। उसी दिन उत्तर प्रदेश में एक भाजपा विधायक का बिगड़ैल बेटा राह चलते दरवाजे पर खड़ी एक लड़की से रेट तय कर रहा था। खुलयाम बोल रहा था कि साथ चलने का कितना लोगी। वह वीडियो अभी भी वायरल है। लड़की ने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई, पर कोई सुनने वाला नहीं। यही मोदी ने लाल किले से भाषण झाड़ा था, उसी दिन गुजरात की बिल्किस बानो के बलात्कारियों और उसके बच्चों के हत्यारों को जमानत पर छोड़ा गया। उनके जेल से निकलते ही बलात्कारियों और हत्यारों की आरती उतारी गयी थी। जब जम्मू के कठुआ में आठ साल की मुस्लिम लड़की आसिफा के साथ सामूहिक बलात्कार कर हत्या कर दी गयी थी। जब आरोपियों को जेल भेजा गया था, तो इनके ही लोग तिरंगा यात्रा निकालकर बलात्कारियों को देशभक्त साबित कर रहे थे और रिहा करने की मांग कर रहे थे।हाल ही में महाराष्ट्र का बाबा अशोक खरात, जिसके कुकर्म में लिप्त कितने वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते लोगों ने देखा। फिर भगवा ध्वज लहराते हुए हिन्दू संगठन के लोग रिहा करने की मांग कर रहे थे और अशोक खरात की गिरफ्तारी को हिन्दू धर्म का अपमान बता रहे थे।जब हाथरस की दलित बेटी के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था और उसकी हत्या कर दी गयी थी। तब यही भाजपा सरकार उसके परिजनों से मिलने पर रोक लगा दी गई थी। उस घटना की सच्चाई दिखाने वाले पत्रकार को जेल में डाल दिया गया था। फिर बलात्कारियों को भी रिहा कर दिया गया था। क्योंकि बलात्कारी भाजपा समर्थक थे। भाजपा की ही सरकार में विधायक कुलदीप सिंह सेंगर और चिन्मयानंद जैसे बलात्कारियों को जेल जाना पड़ा। भाजपा के लिए काम करने वाले आसाराम और राम-रहीम जैसे बलात्कारियों को यही भाजपा सरकार चुनाव में पैरोल पर छोड़वाती है। भाजपा की ही नेत्री सेक्स स्कैंडल में लिप्त पकड़ी गई हैं। उस समय नारी सम्मान कहां चला जाता है? मणिपुर की घटना विदेशों तक में चर्चा में रही थी। जिसमें एक औरत को खुलयाम नंगे घुमाया गया था। पर न उसपर प्रधानमंत्री कुछ बोल सके थे, न सालों तक मणिपुर जा सके थे। पता नहीं नारियों के सम्मान पर बोलने में शर्म भी आती है या नहीं। अगर शर्म आती तो कभी नहीं बोलते।जिसकी सरकार में नारियां सिर्फ अपमानित होती रही हैं, वह सम्मान की बात क्या करेगा?

 नारी शक्ति वंदन विधेयक की आड़ में परिसीमन का विधेयक

जहां तक गिरने वाले विधेयक में जो घालमेल का सवाल है, वह यह है कि यह कहने के लिए तो नारी शक्ति वंदन विधेयक था, पर इसकी आड़ में लोकसभा क्षेत्र के परिसीमन का विधेयक था। भाजपा चाहती थी कि जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों की संख्या 545 से बढ़ाकर 850 कर दें। जिसमें उतरी भारत में जहां भाजपा मजबूत है, वहां सीटें बढ़ाने के पक्ष में थी। जहां दक्षिण भारत में भाजपा का संगठन कमजोर है, वहां सीटें नहीं के बराबर बढ़ाना चाहती थी। ताकि देश में भाजपा की अकेली बहुमत की सरकार बनायी जा सके और मनमानी की जा सके। भाजपा सरकार के इस मंशा को प्रायः सभी विपक्षियों ने भांप लिया था कि भाजपा सरकार की नीयत में खोट है। फलस्वरूप लोकसभा में पारित ही नहीं होने दिया। विपक्षी दलों का तर्क है कि सरकार पहले जाति जनगणना करवावे। जिसमें जिसकी जितनी संख्या हो, उसके अनुसार उसे भागीदारी दी जाए। भाजपा जातीय जनगणना से दूर भागना चाहती है। भाजपा यह जानती है कि पार्टी और सरकार में जिन जातियों का वर्चस्व है,उनकी जनसंख्या अपेक्षाकृत बहुत कम है। इसलिए भाजपा और उसके समर्थक यह दुष्प्रचार करने में लग गए हैं कि विपक्ष महिला विरोधी है, इसलिए इस बिल का विरोध किया।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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