Ganesh Shankar Vidyarthi’s Jayanti: इतिहास की मांग है हजारों लेखक-पत्रकार: गणेश शंकर विद्यार्थी की भूमिका में अवतरित हों
Ganesh Shankar Vidyarthi’s Jayanti: देश एक ऐसे देशभक्त पत्रकार की जयंती मना रहा है, जिसे भारतीय पत्रकारिता का युगप्रवर्तक माना गया एवं जिसने सांप्रदायिक सौहार्द के लिए सर्वोच्च बलिदान की मिसाल कायम किया. आपका अनुमान सही है: आज 26 अक्तूबर, 1890 को अपने जन्म से इलाहाबाद के अतरसुइया मोहल्ले को धन्य करने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी की जयंती है
लेखक: एच.एल. दुसाध
न्यूज इंप्रेशन
Delhi: देश एक ऐसे देशभक्त पत्रकार की जयंती मना रहा है, जिसे भारतीय पत्रकारिता का युगप्रवर्तक माना गया एवं जिसने सांप्रदायिक सौहार्द के लिए सर्वोच्च बलिदान की मिसाल कायम किया. आपका अनुमान सही है: आज 26 अक्तूबर, 1890 को अपने जन्म से इलाहाबाद के अतरसुइया मोहल्ले को धन्य करने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी की जयंती है. कायस्थ समाज में जन्मे एक जेलर पिता की संतान विद्यार्थी में बड़ी छोटी उम्र में ही एक विराट पत्रकार और देश-भक्त बनने का लक्षण दिखा था. लेखन के बीज तो उनमें शुरू से ही पड़ गये और मिडिल की पढ़ाई के दौरान ही ‘हमारी आत्मोत्सर्गता’ नामक एक किताब भी लिख डाली थी। यह पुस्तक मिस चार्लोट एम यंग द्वारा लिखित पुस्तक ‘बुक ऑफ गोल्डन डीड्स’ से प्रभावित थी। इसमें उन्होंने उन भारतीय नायकों की कहानियाँ लिखी थी, जिन्होंने दूसरों के लिए अपना बलिदान दिया था। दूसरे शब्दों में यह भारतवासियों के आत्मत्याग की ऐतिहासिक कथाओं का संग्रह था। प्रयागराज में अपनी पढ़ाई के साथ उनकी रचनायें पत्र – पत्रिकाओं में स्थान बनाने लगीं थीं। स्वराज्य अखबार के जरिये उन्होंने उर्दू में लिखना शुरू किया और भारत में अंग्रेज़ी राज के यशस्वी लेखक एवं पत्रकार पंडित सुन्दरलाल के सान्निध्य से वे हिन्दी की ओर आकृष्ट हुए। विद्यार्थी जी सुन्दर लाल जी के साथ उनके हिंदी साप्ताहिक कर्मयोगी के संपादन में सहयोग देने लगे। उनके ही प्रभाव से वे लेखन में अपने नाम के आगे परिवार का पारंपरिक उपनाम ‘श्रीवास्तव’ की बजाय ‘विद्यार्थी’ लिखते थे । वे कहते कि अभी मैं विद्यार्थी हूँ इसलिये लिखता हूँ। जब वे सोलह वर्ष के थे तब उनकी रचना ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। साहित्य में महावीर प्रसाद द्विवेदीज को और पत्रकारिता में पं सुन्दर लाल को वे अपना आदर्श और गुरु मानते थे। साहित्य एवं पत्रकारिता में यह अंतर्धारा उनके प्रत्येक लेखन में झलकती है। उन्हे पढ़ने और लिखने का शौक बचपन से था और इसी शौक ने उन्हें एक ऐसा लेखक – पत्रकार बनाया, जिसकी मिसाल सदियों तक दी जाती रहेगी!
एक निर्भीक पत्रकार
भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में गणेश शंकर विद्यार्थी का स्थान एक ‘मशाल धारक’ और ‘शिरोमणि’ का है। उन्होंने पत्रकारिता को केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता, सामाजिक चेतना और मानवता की सेवा का सबसे सशक्त माध्यम बनाया। उनके योगदान को हिंदी पत्रकारिता के स्वर्णिम युग के रूप में देखा जाता है।विद्यार्थी जी ने वर्ष 1913 में महज 23 साल की उम्र में कानपुर से ‘प्रताप’ नामक साप्ताहिक पत्र (जो बाद में दैनिक हुआ) का प्रकाशन शुरू किया, जो उस दौर में दबे-कुचले, शोषितों, किसानों और मजदूरों की आवाज बना। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के आशीर्वचन को इस पत्र का मूल मंत्र बनाया गया: ‘जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है, वह नर नहीं नर पशु निरा है और मृतक समान है।‘ ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ खुलकर लिखने के कारण ‘प्रताप’ पर कई बार जुर्माने लगाए गए और प्रतिबंध की कोशिशें हुईं, लेकिन विद्यार्थी जी ने कभी समझौता नहीं किया। विद्यार्थी जी की पत्रकारिता केवल राजनीतिक आजादी तक सीमित नहीं थी। उन्होंने राजस्थान के बिजोलिया किसान आंदोलन, अवध के किसान आंदोलनों और मिल मजदूरों की दुर्दशा पर ‘प्रताप’ में धारदार लेख लिखे। उन्होंने पत्रकारिता को सीधे आम जनता और समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति से जोड़ दिया। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को एक सरल, ओजस्वी और जनता के समझ आने वाली भाषा दी। ‘सरस्वती’ और ‘अभ्युदय’ जैसी पत्रिकाओं में काम करने के बाद जब उन्होंने अपनी लेखनी संभाली, तो उनकी भाषा में अद्भुत मारक क्षमता थी, जिसने तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी। गणेश शंकर विद्यार्थी केवल एक संपादक या लेखक नहीं थे, बल्कि वे एक ‘मिशनरी पत्रकार’ थे। आज भी जब निर्भीक, निष्पक्ष और जन-सरोकार से जुड़ी पत्रकारिता की बात होती है, तो गणेश शंकर विद्यार्थी का नाम सबसे शीर्ष पर लिया जाता है। भारत सरकार द्वारा उनकी स्मृति में दिया जाने वाला ‘गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार’ आज भी साहसिक और उत्कृष्ट पत्रकारिता का एक बड़ा पैमाना है!
और वह महात्मा गांधी के आन्दोलन से जुड़ गए!
विद्यार्थी जी का व्यक्तित्व अनोखा था। वे एक तरफ महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलनों (जैसे असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन) में सक्रिय रूप से भाग लेते थे, तो दूसरी तरफ भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और राम प्रसाद बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों के भी गहरे मददगार और संरक्षक थे इनको लेकर ढेरों कहानियां इतिहास के पन्नों में दर्ज । ‘प्रताप’ का दफ्तर क्रांतिकारियों के छिपने और वैचारिक विमर्श का प्रमुख केंद्र था। उन्होंने पत्रकारिता के जरिए इन दोनों धाराओं को देश की आजादी के साझे लक्ष्य के लिए जोड़े रखा।बहरहाल तमाम क्रांतिकारियों के मध्य महात्मा गांधी के आन्दोलन से जुड़ना, उनके अनुकरणीय जीवन का एक अलग पहलू रहा! वर्ष 1916 में लखनऊ में कांग्रेस अधिवेशन के दौरान उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई, जिसने उनके जीवन और काम की दिशा बदल दी और वे उनके आन्दोलन से जुड़ गए.गांधीजी के आंदोलन से उनके जुड़ने के मुख्य कारण निम्नलिखित थे!
विद्यार्थी जी गांधीजी की अहिंसा और नैतिक प्रतिरोध (सत्याग्रह) की शक्ति से बहुत प्रभावित थे। उनका मानना था कि विदेशी सत्ता के खिलाफ देशव्यापी चेतना जगाने के लिए गांधीजी का यह मार्ग सबसे प्रभावी है। महात्मा गांधी का आंदोलन केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था, बल्कि वह समाज के सबसे निचले पायदान के लोगों के हक की बात करता था। गणेश शंकर विद्यार्थी स्वयं किसानों और मजदूरों के हितों के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने अपने अखबार ‘प्रताप’ के माध्यम से शोषित वर्ग की आवाज उठाई और गांधीजी के सिद्धांतों पर चलते हुए कानपुर में टेक्सटाइल वर्कर्स की पहली हड़ताल का नेतृत्व किया। गांधीजी की तरह विद्यार्थी जी भी हिंदू-मुस्लिम एकता और सांप्रदायिक सौहार्द के कट्टर समर्थक थे। वे मानते थे कि बिना आंतरिक एकता के देश की आजादी अधूरी है। वे भारत को ब्रिटिश हुकूमत से पूरी तरह मुक्त देखना चाहते थे। गांधीजी के नेतृत्व में चल रहे असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन उन्हें इस लक्ष्य को हासिल करने का सबसे मजबूत जरिया लगा और वे समर्पित कांग्रेसी के रूप में असाधारण योगदान दिए !
गणेश शंकर विद्यार्थी : एक सच्चे और आदर्श कांग्रेसी
गणेश शंकर विद्यार्थी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक अत्यंत प्रभावशाली, समर्पित और जुझारू नेता थे, जिन्होंने उत्तर प्रदेश (तत्कालीन संयुक्त प्रांत) में स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई दिशा दी। यद्यपि उनकी मुख्य पहचान एक निर्भीक पत्रकार के रूप में है, लेकिन एक कांग्रेसी नेता के रूप में उनका राजनीतिक कद बहुत ऊंचा था। उन्होंने गांधीवादी विचारधारा को अपनाते हुए न केवल अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंका, बल्कि समाज के सबसे निचले तबके (किसानों और मजदूरों) को कांग्रेस से जोड़ने का ऐतिहासिक कार्य किया।उन की सक्रियता और नेतृत्व क्षमता को देखते हुए उन्हें 1929 में उत्तर प्रदेश प्रांतीय कांग्रेस कमेटी (UPCC) का अध्यक्ष चुना गया। सत्याग्रह के प्रथम ‘तानाशाह’: जब 1930 में महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन (सत्याग्रह) की शुरुआत की, तब उत्तर प्रदेश में इस आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए विद्यार्थी जी को कांग्रेस द्वारा पहला ‘तानाशाह’ (आंदोलन का मुख्य संचालक) नियुक्त किया गया था। उन्होंने कांग्रेस के बैनर तले होम रूल आंदोलन (1917-18), असहयोग आंदोलन (1920) और सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) में अग्रणी और सक्रिय भूमिका निभाई. कांग्रेस के आंदोलनों में भाग लेने और ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने के कारण उन्हें पांच बार जेल जाना पड़ा। कानपुर उस समय उद्योगों का एक बड़ा केंद्र था। विद्यार्थी जी ने 1928 में वहां ‘मजदूर सभा’ की स्थापना की और कपड़ा मिल श्रमिकों की हड़तालों का सफल नेतृत्व किया।उन्होंने अपने प्रसिद्ध समाचार पत्र ‘प्रताप’ के माध्यम से रायबरेली और अन्य क्षेत्रों में जमींदारों व अंग्रेजों द्वारा उत्पीड़ित किसानों की समस्याओं को पुरजोर तरीके से उठाया। इसके जरिए उन्होंने कांग्रेस के जनाधार को सीधे आम जनता, किसानों और मजदूरों तक पहुंचाया। वे केवल सड़कों पर आंदोलन करने वाले नेता नहीं थे, बल्कि वे 1929 तक उत्तर प्रदेश विधान परिषद (Legislative Council) के सदस्य भी रहे, जहां उन्होंने विधायी स्तर पर जनहित के मुद्दों और स्वतंत्रता की मांग को दृढ़ता से रखा। कांग्रेस के एक मजबूत स्तंभ के रूप में, वे नए और ऊर्जावान कार्यकर्ताओं को पार्टी से जोड़ने के लिए लगातार प्रयासरत रहते थे। उदाहरण के लिए, 1926 में उन्होंने शिव नारायण टंडन जैसे प्रमुख नेताओं को कांग्रेस में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया था। वह अंतिम समय तक कांग्रेसी आदर्शों का पालन करने वाले नेता रहे. मार्च 1931 में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी के बाद जब देश भर में तनाव का माहौल था तब कानपुर में भयानक सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे। एक सच्चे कांग्रेसी और धर्मनिरपेक्ष देशभक्त की तरह, वे अपनी जान की परवाह न करते हुए दंगों के बीच कूद पड़े। उन्होंने हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के हजारों मासूम लोगों की जान बचाई, लेकिन खुद हिंसक भीड़ का शिकार हो गए। उनकी इस शहादत पर महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘काश ऐसी मौत मुझे मिली होती।‘गणेश शंकर विद्यार्थी जी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि वे एक पत्रकार के रूप में जितने निडर थे, एक कांग्रेसी राजनेता के रूप में उतने ही समर्पित, धर्मनिरपेक्ष और जन-सरोकारों से जुड़े नेता थे!
आज हजारों लेखक-पत्रकार करें : गणेश शंकर विद्यार्थी का अनुसरण
बहरहाल देश के जिन हालातों में विद्यार्थी जी ने लेखन कर्म करते हए , कांग्रेस में योगदान किया था, आज वे हालात अंग्रेज भारत से भी बदतर है. नजरें खोलकर देखें तो पता चलेगा कि मुल्क आजादी की दूसरी लड़ाई के मुहाने पर खड़ा है. इसे समझने के लिए भारत सहित दुनिया भर में चली आजादी की लड़ाइयों के पृष्ठ में क्रियाशील कॉमन कारणों की तह में जाना होगा.स्मरण रहे सारी दुनिया में आजादी की लड़ाइयाँ शासकों और पराधीन बनाये गए लोगों के मध्य शक्ति के स्रोतों के असमान बंटवारे को लेकर संगठित होती रही हैं .स्वाधीन और पराधीन: शासक और ग़ुलाम में मुख्य फर्क शक्ति के स्रोतों के एकाधिकार में निहित रहा है. शासक वह होता है ,जिसका शक्ति के स्रोतों(आर्थिक-राजनीतिक- शैक्षिक- धार्मिक ) पर एकाधिकार होता है, जबकि गुलाम शक्ति के स्रोतों से शून्य व बहिष्कृत होते हैं. अगर सारी दुनिया में शासकों ने पराधीन बनाये गये लोगों को शक्ति के स्रोतों में वाजिब हिस्सा दिया होता, भारत सहित दुनिया में कहीं भी स्वाधीनता संग्राम संगठित नहीं होता! गांधी के नेतृत्व में भारतीयों को आजादी की लड़ाई इसलिए लड़नी पड़ी क्योंकि मुट्ठी भर अंग्रेजों ने शक्ति के स्रोतों पर एकाधिकार जमा कर भारतीयों को इससे पूरी तरह महरूम कर दिया था. आज राममंदिर आन्दोलन से मिली सत्ता के जोर से संघ ने अपने राजनीतिक संगठन भाजपा के जरिये भारत में शक्ति के समस्त स्रोतों पर अपर कास्ट का वैसा ही कब्जा करवा दिया है, जैसा अंग्रेजों ने गुलाम बनाए गए भारत सहित तमाम देशों में कायम किया था. 2024 के मई में प्रकाशित ‘ वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब’ की रिपोर्ट बताई थी कि 89 % धन-सपदा पर अपर कास्ट का कब्ज़ा हो गया है,जबकि पिछड़ों की विशाल आबादी 9 % और दलित वर्ग 2.6 % धन पर जीवन निर्वाह करने के लिए विवश है. फ्रांसीसी और रूस की वोल्सेविक क्रांति जिन वर्गों के खिलाफ संगठित हुई थी, उनका भी उन देशो की धन-संपदा पर 90 % के करीब कब्ज़ा नहीं रहा होगा. भारत सहित जिन देशों में अंग्रेजों में अंग्रेजों ने अपनी हुकूमत कायम की , वहां भी उनका शक्ति के स्रोतों पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा नहीं रहा होगा. ऐसे में तमाम लक्षण गवाही दे रहे हैं कि आज की तारीख में संघ- भाजपा ने मिलकर बिलकुल वैसे हालात पैदा कर दिए हैं, जिन हालातों में महान लेखक-पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी को आजादी की लड़ाई को नेतृत्व दे रही कांग्रेस के साथ जुड़ना पड़ा ! आज अंग्रेज भारत से भी बदतर हालात भारत में इसलिए पैदा हो गए हैं, क्योंकि संघी शासकों ने तमाम संवैधानिक संस्थाओं पर कब्ज़ा कर भारत को चुनावी निरंकुशता वाले चीन,पाकिस्तान, बांग्लादेश ,श्रीलंका इत्यादि की कतार में खड़ा कर दिया है और उनकी सरकारें वोट चोरी से बन रही हैं. अंग्रेज भारत की भांति ही देश को दूसरी गुलामी से बचाने की लड़ाई एक और गांधी : राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ही लड़ रही है.पूरा देश आज राहुल गांधी और कांग्रेस की ओर देख रहा है . दूसरी गुलामी से बचने की चाह में आज रोजाना हजारो-हजारों लोग कांग्रेस के साथ जुड़ रहे हैं. आम लोगों की भाँति आज समय की मांग है कि देश के छोटे-बड़े तमाम लेखक- पत्रकार- कवि विद्यार्थी जी से प्रेरणा लेकर कांग्रेस और राहुल गांधी के साथ जुड़ें. यदि वे कमरे में बैठ कर कलम घिसते रह गए तो जिस तरह अंग्रेजों से आजादी पाने के लिए 250 सौ साल लगे थे, विश्व के सबसे बड़े मानवता और बहुजन विरोधी सघ से भी निजात पाने में सदियां गुजर जाएंगी !
ऐसे ही हालात में दुनिया भर में सक्रिय राजनीति से जुड़े : विश्व विख्यात लेखक, कवि और पत्रकार
संघी सत्ता में भारत जिस स्टेज में पहुँच गया है, उस स्टेज में दुनिया भर में और विशेष रूप से भारत में, ऐसे कई विश्व विख्यात लेखक, कवि और पत्रकार हुए हैं जिन्होंने न केवल अपनी कलम से क्रांति की मशाल जलाई, बल्कि देश की आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय रूप से राजनीति और आंदोलनों से भी जुड़े। वैश्विक स्तर पर जो बेहद प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार देश की बदहाली में सक्रिय राजनीति से जुड़े उनमें जॉर्ज ऑरवेल (George Orwell) का नाम बहुत सम्मान से लिया जाता है. ऑरवेल फासीवाद के खिलाफ लड़ते हुए 1937 में स्पेनिश गृहयुद्ध में सक्रिय रूप से शामिल हुए और अपने राजनीतिक उपन्यासों जैसे ‘1984’ और ‘एनिमल फार्म’ के लिए विश्व विख्यात हुए। नोबेल पुरस्कार विजेता सैम्युल बेकेट (Samuel Beckett) ऐसे रहे, जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान फ्रांस को नाजी कब्जे से मुक्त कराने के लिए ‘फ्रेंच रेजिस्टेंस’ (French Resistance) आंदोलन में एक कूरियर के रूप में सक्रिय भूमिका निभाई. फ्रांट्ज़ फैनन (Frantz Fanon) भी एक ऐसे प्रसिद्ध लेखक और मनोचिकित्सक रहे, जिन्होंने अल्जीरिया के स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लिया और उनकी पुस्तक ‘द रेच्ड ऑफ द अर्थ’ (The Wretched of the Earth) उपनिवेशवाद के खिलाफ एक बड़ी आवाज बनी।अगोस्टिनो नेटो (Agostinho Neto): एक ऐसे मशहूर कवि और राजनीतिक कार्यकर्ता रहे, जिन्होंने अंगोला को पुर्तगाल की गुलामी से आजाद कराने के लिए मुक्ति आंदोलन (MPLA) का नेतृत्व किया और बाद में अंगोला के पहले राष्ट्रपति बने! गुलामी से मुक्ति के लिए सक्रिय राजनीति से जुड़ने वालों की संख्या में भारत भी खूब कम नहीं रही ! इतिहास बताता है कि अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई में पत्रकारिता और साहित्य ही लड़ाई का सबसे बड़ा हथियार था। राष्ट्रीय आंदोलन में बड़ी भूमिका अदा करने वाले हमारे अधिकाँश नायक गणेश शंकर विद्यार्थी की भांति ही लेखक पत्रकार रहे!
‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’ का नारा देने वाले बाल गंगाधर तिलक प्रधानतः एक पत्रकार थे ,जिन्होंने ‘केसरी’ (मराठी) और ‘मराठा’ (अंग्रेजी) समाचार पत्रों के माध्यम से ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जन-जागरण चलाया। बहुत कम लोग जानते हैं कि शहीद ए आजम भगत सिंह एक उत्कृष्ट लेखक और पत्रकार भी थे। उन्होंने ‘प्रताप’ और ‘कीर्ति’ जैसी पत्रिकाओं में बलवंत सिंह और अन्य छद्म नामों से क्रांतिकारी लेख लिखे।कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष और भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने ‘अल-हिलाल’ और ‘अल-बलाघ’ जैसे उर्दू साप्ताहिक पत्रों के जरिए मुसलमानों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा। ‘नाइटिंगेल ऑफ इंडिया’ के नाम से प्रसिद्ध, सरोजिनी नायडू ने ‘द गोल्डन थ्रेशोल्ड’ जैसी बेहतरीन काव्य रचनाएं कीं। राजनीतिक योगदान कर वह महात्मा गांधी के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रूप से जेल गईं और कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं। असहयोग आंदोलन के दौरान जेल जाने वाले मध्य प्रदेश के पहले स्वतंत्रता सेनानी माखनलाल चतुर्वेदी ने ‘कर्मवीर’ और ‘प्रभा’ जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया। उनकी कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ आज भी अमर है।भारत के स्वाधीनता संग्राम को नेतृत्व देने वाले महात्मा गांधी, खुद बड़े पत्रकार थे और उनके योग्यतम शिष्य पंडित जवाहरलाल नेहरु विश्व स्तरीय लेखक! इनके अलावा सुभद्रा कुमारी चौहान (‘झांसी की रानी’ कविता की लेखिका), मदन मोहन मालवीय (‘द लीडर’ अखबार के संस्थापक), और लाला लाजपत राय (‘द पंजाबी’ और ‘वंदे मातरम’ के लेखक/संपादक) जैसे दिग्गजों ने भी राजनीति और कलम दोनों के माध्यम से आज़ादी की लड़ाई को मुकाम तक पहुंचाया। अतः एक ऐसे समय में जबकि देश दूसरी आजादी की लड़ाई के मुहाने पर खड़ा है, क्या देश, खासकर दलित,आदिवासी,पिछड़े, अल्पसंख्यक समुदायों के लेखक-पत्रकार – कवि गणेश शंकर विद्यार्थी से प्रेरणा लेकर नए ज़माने के गांधी और उनकी कांग्रेस से जुड़ने का मन बनाएंगे!
(लेखक उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के विचार विभाग के चेयरमैन हैं )
