Ram Mandir Donation Scam: हिन्दू धर्मस्थलों के प्रजातंत्रीकरण की लड़ाई: बन सकती है संघ – भाजपा के अंत का सबब
Ram Mandir Donation Scam: 5 जून, 2026 को विश्व इतिहास में देवालयों में चोरी की बड़ी घटनाओं में जगह बनाए राम मंदिर चढ़ावा चोरी की घटना प्रकाश में आने के लगभग एक माह बाद: 6 जुलाई को इस पर एसआईटी की प्राथमिक रिपोर्ट आ चुकी है.
एचएल दुसाध
न्यूज इंप्रेशन
Lucknow: 5 जून, 2026 को विश्व इतिहास में देवालयों में चोरी की बड़ी घटनाओं में जगह बनाए राम मंदिर चढ़ावा चोरी की घटना प्रकाश में आने के लगभग एक माह बाद: 6 जुलाई को इस पर एसआईटी की प्राथमिक रिपोर्ट आ चुकी है. राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेन्द्र मिश्र के शब्दों में यह चोरी नहीं डकैती थी, जिसकी जांच के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योदी आदित्यनाथ ने लखनऊ के मंडलायुक्त विजय विश्वास पन्त के नेतृत्व में तीन सदस्यीय एसआईटी गठित की थी, जिसमें किरण एस (आईपीएस) और नीलरतन (विशेष सचिव,वित्त) शामिल रहे.एसआईटी ने अपनी जांच 15 जून से शुरू की . अयोध्या स्थित राम मंदिर में हुए चंदा और चढ़ावे (दलाली/गबन) की एसआईटी (SIT) जांच की जो प्रारंभिक रिपोर्ट सार्वजनिक हुई है, उसमें मंदिर की सुरक्षा और वित्तीय प्रबंधन में भारी चूक का खुलासा हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक 27 अप्रैल से 5 जून के बीच की अवधि में कर्मचारियों द्वारा करीब 70 बार नोट छिपाकर चुराने की संदिग्ध घटनाएं सीसीटीवी में कैद हुई हैं. आरोपी मंदिर के सीसीटीवी ब्लाइंड स्पॉट्स का फायदा उठाकर नोटों की गड्डियां अपनी जेबों, जूतों और मोजे में छुपाते थे. बाद में इसे बाथरूम में छिपाकर बाहर ले जाते थे. जांच से पहले कर्मचारियों के पास से लगभग 78.94 लाख रूपये और काउंटिंग रूम से जुड़े बाथरूम से 2.25 लाख बरामद किए गए थे. पुलिस को शक है कि हर दिन करीब 6 से 8 लाख रूपये का गबन किया जा रहा था. पुलिस अब मामले की तह तक जाने के लिए गिरफ्तार किए गए आरोपियों—अनूपकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा और करुणेश पांडे को पुलिस कस्टडी रिमांड पर लेकर पूछताछ कर रही है. जांच में कर्मचारियों के बैंक खतों में आय से कहीं अधिक नकद जमा और वित्तीय लेनदेन की बात सामने आई है. चोरी की रकम रिश्तेदारों के खातों में जमा करने और संपत्ति अर्जित करने के संकेत मिले हैं. गणना कक्ष में तलाशी ,जेब रहित वर्दी, निजी सामान पर रोक और बायोमेट्रिक व्यवस्था लागू नहीं की गई. ट्रष्ट और बैंक के बीच मानक प्रक्रिया संचालन प्रक्रिया (एसओपी) का पालन नहीं हुआ, जिससे चोरी की परिस्थियाँ बनीं ! इन्टरनेट मीडिया पर चांदी की ईंटों और अन्य बहुमूल्य चढ़ावे के गायब होने के आरोप जांच में सही नहीं पाए गए.ऑडिट रिपोर्ट में पहले ही 180 दिनों तक सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने और कई सुधार सुझाये गए थे, लेकिन उनका पालन नहीं हुआ. 20 सितम्बर, 2024 और 6 फरवरी, 2025 को ट्रस्ट और बैंक खाते के बीच जारी संयुक्त दिशा निर्देशों के पालन की जिम्मेदारी डॉ. अनिल मिश्र पर थी , लेकिन उनकी नियमित समीक्षा का अभाव पाया गया ! घटना की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा एसआईटी जांच की समय सीमा को बढ़ाकर 15 जुलाई कर दिया गया है ताकि पूरे नेटवर्क और धन के लेन-देन का पता लगाया जा सके!
दलित संघी कृष्णमोहन बने : श्रीराम जन्मभूमि ट्रष्ट के अंतरिम महासचिव
बहरहाल ऐतिहासिक अयोध्या घोटाले के सामने के बाद जिन दो शख्सियतों : श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, और ट्रस्टी अनिल कुमार मिश्रा का नाम बार-बार सामने आया, उन्होंने एसआईटी की रिपोर्ट सामने आने के बाद अपने-अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है और उनका इस्तीफ़ा मजूर भी हो गया है.इनके इस्तीफे पर राय देते हुए ट्रष्ट के वरिष्ठ सदस्य और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता के. परासरन ने ट्रष्ट की नियमावली का उल्लेख करते हुए कह दिया कि इस्तीफ़ा दिए जाने के बाद उस पर पुनर्विचार का प्रावधान नहीं है ,इसलिए चम्पत राय और अनिल मिश्र के त्यागपत्र नियमों के अनुसार स्वतः प्रभावी हो गए ! चंपत राय और अनिल मिश्र के इस्तीफे के बाद ट्रष्ट की एक महत्वपूर्ण बैठक में दलित समुदाय में जन्मे ट्रष्ट के वरिष्ठ सदस्य कृष्णमोहन को अंतरिम महासचिव की जिम्मेवारी सौंपी गई. इसके साथ ही बैठक में विशेष आमंत्रित सदस्य व पूर्व मंदिर व्यवस्थापक गोपाल राव को भी उनके पद से हटा दिया गया. ट्रष्ट की विशेष बैठक में कहां गया कि कुछ लोग इस दुर्भाग्यपूर्ण प्रकरण का रामजन्मभूमि , हिन्दू समाज और व्यापक हिन्दू आस्था को कमजोर करने के अवसर के रूप में उपयोग करने का प्रयास कर रहे हैं. आधारहीन आरोप जनमानस के समक्ष प्रस्तुत किये जा रहे हैं, जिनका उद्देश्य सत्य सामने लाना नहीं ,बल्कि निरंतर भ्रम फैलाना है. ट्रष्ट ऐसे लोगों को समुचित प्रत्युत्तर देने के प्रति संकल्पित है!
अयोध्या में भीषणतम चढ़ावा चोरी पर संघ का आक्रामक रुख
बहरहाल ट्रष्ट की ओर से सिर्फ राम मंदिर में डकैती को भी म्लान करने वाली चंदा चोरी पर कथित भ्रम फ़ैलाने की बात नहीं कही गई, बल्कि इस काण्ड के प्रायः एक महीने बाद जब संघ ने चुप्पी तोड़ी तो उसने भी आक्रामक रुख अपनाने का संकेत कर डाला .संघ की ओर से पहली बार 3 जुलाई को इस पर चुप्पी तोड़ते हुए आरएसएस के सरकार्यवाह महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने एक्स पर लिखा कि कथित चोरी की घटना ने पूरे समाज की भावनाओं और आस्था को गहरी ठेस पहुंचाई है. उन्होंने जोर देकर कहा कि हिन्दू धैर्य और संयम बनाये रखें ,अपने खिलाफ साजिशों को विफल करें. हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि जो भी दोषी पाया जायेगा, उसे कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए . लेकिन, उनका मुख्य जोर इस घटना को हिन्दू समाज के खिलाफ साजिश बताने पर रहा. .उन्होंने दावा किया कि हिन्दू विरोधी और राष्ट्र विरोधी ताकतें ’इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का फायदा उठाकर हिन्दू धर्म को बदनाम करने की कोशिश कर रही हैं.’ जाहिर है कि उन्होंने इस ऐतिहासिक घोटाले को हिन्दू समाज और सनातन धर्म के खिलाफ साजिश बताते हुए, उन्होंने राम भक्तों को विपक्ष के खिलाफ संघ का साथ देने का आह्वान किया. सिर्फ होसबोले ही नहीं, तमाम संघी और भाजपाई नेताओं के बयान को कान लगाकर सुना जाय तो सभी इस घटना को सनातन धर्म और हिन्दू समाज के खिलाफ साजिश करार देने में सर्वशक्ति लगाते प्रतीत होंगे: कोई भी इसके लिए अपने अन्दर झाँकने के लिए तैयार नहीं दिख रहा है.इसे सबसे पहले सनातन धर्म के खिलाफ साजिश बताने का प्रयास उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने किया . उन्होंने दान चोरी काण्ड को समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की साजिश करार देते हुए कहा है कि यह सब सनातन धर्म को बदनाम करने की साजिश है. उनका आरोप है कि मुस्लिम वोटो के तुष्टिकरण के लिए विपक्ष सनातन धर्म पर हमले कर रहा है. अयोध्या काण्ड पर सत्ताधारी दल का रुख स्पष्ट संकेत कर रहा है कि उसने इस शर्मनाक घटना पर अनुशोचना प्रकट करने के बजाय आक्रमण को बचाव का हथियार बनाने का निर्णय ले लिया है. इसके तहत वह उल्टा चोर कोतवाल को डांटे की मुद्रा अख्तियार करते हुए विपक्ष के खिलाफ हमला बोलने की रणनीति अपना लिया है. इसके तहत ही विश्व हिन्दू परिषद् ने अयोध्या पुलिस को पत्र लिखकर कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी और आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल जैसे विपक्षी नेताओं के दावों की जांच की मांग कर डाली है. इस बीच बसपा सुप्रीमो मायावती भी विपक्ष को घेरते हुए कह दी हैं कि सपा,कांग्रेस और आम आदमी पार्टी सबूत दिखाए वरना ड्रामा बंद करे!
चढ़ावा चोरी के खिलाफ विपक्ष की रणनीति
बहरहाल अयोध्या दान-चोरी कांड के बाद आरएसएस और विपक्ष में तीखा राजनीतिक टकराव टकराव छिड़ गया है. संघ ने घटना को ‘घोर निंदनीय’ बताकर दोषियों पर कड़ी कार्रर्वाई की मांग की है, जिसे विपक्ष भाजपा- संघ की छवि बचाने का ‘ढोंग’ करार दिया है. कांग्रेस ,समाजवादी पार्टी , आम आदमी पार्टी , शिवसेना (यूबीटी) ने भाजपा और संघ पर चौतरफा हमला बोला है. कांग्रेस ने संघ के बयान को ख़ारिज करते हुए उनपर भेड़ की खाल में भेड़िया होने के का आरोप लगाया है. इसके अलावा , कांग्रेस ने संघ परिवार पर मंदिर प्रशासन को अनधिकृत रूप से हथियाने का भी आरोप लगाया है. कांग्रेस नेता पवन खेडा और केसी वेणुगोपाल ने इस घटना को एक बड़ा घोटाला बताते हुए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग की है. वहीं, सपा के अखिलेश यादव ने दान चुराने वालों को एक संगठित ‘ चोरों का गिरोह’ करार देते हुए करोड़ों सनातनियों और राम भक्तों को इस मामले का संज्ञान लेने की अपील की है. इस बीच शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख अयोध्या मंदिर में दान राशि के खिलाफ ‘ राम रक्षा’ आन्दोलन की शुरुआत कर दिया है, जिसका मकसद भाजपा को घेरना और कथित घोटाले की जांच करना है. उधर कांग्रेस के सीनियर नेता दिग्विजय सिंह ने दान-चोरी के खिलाफ 2 अक्तूबर से उज्जैन से अयोध्या के लिए पैदल यात्रा की घोषणा कर दिया है. इस मध्य चढ़ावा चोरी के खिलाफ उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय के निर्देश पर लखनऊ, कानपुर,प्रयागराज, लखीमपुर खीरी , सोनभद्र , बुलंद शहर , फतेहपुर सहित तमाम जिलों में ‘सद्बुद्धि पदयात्रा’ निकाली गई, जिसमे भारी संख्यक कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने ‘चंदा- चोर गद्दी छोड़’ का नारा लगाते हुए इस यात्रा को खास बनाया!
विपक्ष की रणनीति के सफल होने की कितनी है सम्भावना
इसमें कोई संदेह नहीं कि विपक्ष अयोध्या में घटित बेहद निंदनीय घटना के खिलाफ अपनी भूमिका प्रभावी तरीके से निभा रहा है . लेकिन उसे कुछ खास बातों की और ध्यान देने की जरुरत है.पहला, यह कि भाजपा ने तमाम संवैधानिक संस्थाओं सहित न्यायपालिका और जांच एजेंसियों तक को अपने कब्जे में ले लिया है. ऐसे में न्यायपलिका इस कांड में विवेकपूर्ण निर्णय लेगी, इसमें पूरा संदेह है. स्मरण रहे मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान विपक्ष और जांच एजेंसियों द्वारा कई घोटालों और अनियमितताओं के आरोप लगाये गए गए, लेकिन सरकार का कुछ नहीं बिगड़ा. मोदी राज में इलेक्टोरल बांड योजना काण्ड सामने आया. इस योजना को सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2024 में असंवैधानिक घोषित किया गया , जिसके माध्यम से राजनीतिक दलों को अज्ञात स्रोतों से मिलने वाले चंदे में भारी अनियमितताओं का आरोप लगा था. फ़्रांस से राफेल विमान खरीद में प्रक्रियागत आरोप लगाये गए थे, नतीजा क्या निकला, सबको पता है. यह मामला लोगों की स्मृति से गायब हो चुका है. कोविद -19 महामारी के दौरान स्थापित पीएम केयर फंड की पारदर्शिता और ऑडिट को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाये थे ,परिणाम जीरो निकला. 2023 में आए हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट के बाद पीएम मोदी के चहेते अडाणी समूह पर स्टॉक हेरफेर के आरोप लगे , जिसपर राजनीतिक गलियारों में काफी विवाद हुआ पर , परिणाम? भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्टों में द्वारका एक्सप्रेसवे की निर्माण लागत में वृद्धि और आयुष्मान भारत योजना में मृत व्यक्तियों के नाम भुगतान के खुलासे हुए थे ,जिसका परिणाम लोगों को मालूम है.इसी तरह नोटबंदी में अकूत काले नोट की चोरी जैसे आरोप मोदी सरकार सहजता से झेल ले गई . आज मोदी राज में एग्जाम सेंटर से पेपर चोरी, पेट्रोल पम्पो से पेट्रोल चोरी की घटनाएं धडल्ले से हो रही है पर, सरकार निरापद है. कहने का मतलब यह कि मोदी राज में एक से बढ़कर एक भ्रष्टाचार के मामले सामने आए लेकिन, सरकार उसे आराम से झेल ले गई .अयोध्या चढ़ावा चोरी काण्ड उस धार्मिक सेक्टर में हुआ है , जिस पर संघ-भाजपा का एकाधिकार है. लम्बे समय से उसने बड़ी होशियारी से सम्पूर्ण विपक्ष की छवि को राम विरोधी बना दिया है. अयोध्या काण्ड में विपक्ष द्वारा ज्यादा घेरे जाने पर संघ उन्हें राम – विरोधी बताकर अग्रिम मोर्चे पर रामभक्तों को खड़ा कर देगा! ऐसे में विपक्ष को अन्य विकल्प पर विचार करना पड़ेगा!
हिन्दू धर्मस्थलों पर कब्जे के जरिये : संघ खड़ा करना चाहता है अपना आर्थिक साम्राज्य!
बहरहाल अन्य विकल्पों पर विचार करने के पहले विपक्ष को यह जान लेना होगा कि संघ अपना एक विशाल आर्थिक साम्राज्य खड़ा करने के लिए साधु – संतों को हटाकर धर्मस्थलों पर अपने लोगों का कब्ज़ा कायम करवाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है! इस विषय में 8 जुलाई को फेसबुक पर प्राख्यात पत्रकार मुकेश कुमार का आया यह पोस्ट काबिले गौर है. उन्होंने लिखा है,’ ये अब पूरी तरह से साफ़ हो गया है कि संघ परिवार और मोदी-योगी सरकार मंदिर लूट का सच कभी सामने नहीं आने देंगे। फ़र्ज़ी जाँच और झूठे बयानों के ज़रिए वे अपने पापों पर पर्दा डाल रहे हैं और हिंदुओं को बरगला रहे हैं कि सब ठीक है, विपक्ष हिंदू धर्म को बदनाम कर रहा है. दरअसल, उनकी नीयत में ही खोट है. वे नहीं चाहते कि उनकी लूट सबको पता चले और लोग उन्हें मंदिर को प्रबंधन से बाहर कर दें. उनका तो मक़सद ही यही है कि राम मंदिर उनके कब्ज़े में रहे ताकि चढ़ावे के ज़रिए उनका खाना खिलाना चलता रहे, राजनीति परवान चढ़ती रहे. यही नहीं, वे तो सारे हिंदू मंदिरों पर कब्ज़ा जमाने की फ़िराक़ में हैं ताकि अरबों की संपत्ति पर कब्ज़ा करके हिंदू धर्म और हिंदुओं की पूरी ठेकेदारी हासिल कर लें. उन साधु-संतों को बाहर कर दें जो उनके साथ नहीं चलते, उनकी राजनीति के पक्ष में नहीं हैं. इसलिए साफ़ है कि अगर राम मंदिर को बचाना है तो सबसे पहले उस पर से संघ परिवार का कब्ज़ा हटाना होगा. अगर ये नहीं होगा तो हिंदू मंदिरों में भ्रष्टाचार और राजनीति का खेल बढ़ता जाएगा, उसे कोई रोक नहीं पाएगा. इसकी वज़ह से हिंदू धर्म की बदनामी का सिलसिला भी जारी रहेगा! पूरे विवाद की जड़ वह ट्रस्ट है जिसमें मोदी सरकार ने अपने और आरएसएस के लोग भर रखे हैं. क़ायदे से होना ये चाहिए कि मंदिर की पूरी व्यवस्था ऐसे मैनेजमेंट के हाथों में हो जो राजनीति से दूर हो और पारदर्शी ढंग से हो. दक्षिण के बहुत से मंदिरों में ये व्यवस्था है.लेकिन संघ परिवार सरकार को बाहर रखने की आड़ में अपना नियंत्रण थोप रहा है. वह अन्य मंदिरों में भी इसीलिए दख़ल चाह रहा है. वह न केवल मंदिरों का पैसा हड़पना चाहता है बल्कि उन्हें अपनी राजनीति का हथियार भी बनाना चाहता है! तो हिंदुओं को सोचना है कि वे क्या चाहते हैं…..किसी राजनीतिक गिरोह का कब्ज़ा या धार्मिकता वाला पारदर्शी प्रबंधन?’ मुकेश कुमार की बात को आगे बढ़ाते हुए उसी दिन फेसबुक पर ही कृष्ण कान्त ने लिखा ,’ पहली बार कोई मंदिर आरएसएस और भाजपा के सीधे नियंत्रण में आया और लूट लिया गया. राम मंदिर बनने के बाद आरएसएस ने उसपर पूरी तरह कब्जा जमा लिया है.मंदिर ट्रस्ट में सारे संघ के लोग हैं. यहां तक कि अयोध्या के संतों और शंकराचार्यों को मंदिर ट्रस्ट से, किसी फैसले या अधिकार से बाहर रखा गया. ट्रस्ट में सारे फैसले, सारे अधिकार संघियों के पास हैं. इन्हीं लोगों ने मंदिर में लूट मचाई. इतनी सघन सुरक्षा में निचले स्तर के कर्मचारी महीनों तक लूटते रहे, इस पर विश्वास करना असंभव है. आश्चर्यजनक रूप से संघ प्रमुख मोहन भागवत और नरेंद्र मोदी इस लूट पर चुप हैं. फोटो खिंचाने और मजमा लूटने में ये दोनों सबसे आगे थे. मंदिर में डकैती की पोल खुलते ही दोनों सन्नाटे में क्यों चले गए? इनका मौन यह साबित करता है कि लूट में इन्हीं के लोग शामिल हैं और इनको यह जानकारी है. इसीलिए मौन हैं ताकि मामला बढ़े नहीं और ये उनको बचा सकें। कोशिश यह है कि किसी तरह मामला डायवर्ट हो जाए तो संघ भाजपा मुंह दिखाने लायक बचे रहें. इन लोगों ने भगवान राम के मंदिर और करोड़ो हिंदुओं की आस्था और पवित्रता भंग कर दी है. निजी तौर पर मुझे कोई हैरानी नहीं है.जिन्होंने राजनीति के लिए पांच दशक तक राम नाम का इस्तेमाल किया और सत्ता हासिल की, उनके राम सिर्फ सत्ता तक पहुंचने का माध्यम हैं. जो राजनीति और कुर्सी के लिए राम को इस्तेमाल कर सकता है, वह राम का भक्त नहीं हो सकता. जो राम का मंदिर लूट ले और लुटेरों के साथ खड़ा रहे, वह राम का भक्त नहीं हो सकता. न वे कल राम के भक्त थे, न आज हैं, न कल होंगे. जो भगवान को धोखा दे सकता है, वह राम का भक्त नहीं, सिर्फ राम नाम का व्यापारी है!’ सोशल मीडिया पर ध्यान दिया जाय तो पता चलेगा कि सिर्फ मुकेश कुमार या कृष्ण कान्त ही नहीं, असंख्य विवेकवान लोग ही चीख-चीख कर बता रहे है कि संघ अयोध्या ही नहीं तमाम मंदिरों पर अपने लोगों को काबिज कर अपना एक आर्थिक साम्राज्य खड़ा करना चाहता है.
धर्मस्थलों के आर्थिक साम्राज्य की सीमाएं !
इस विषय में कुछ बड़े साधु- संतों की राय भी मुकेश कुमार और कृष्ण कांतों की बात की पुष्टि करती है. शंकारचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद कह रहे हैं.’ अभी राम मंदिर बना ही नहीं है. अभी वह भाजपा और आरएसएस का कार्यालय है. जब वह कार्यालय की जगह मंदिर बन जायेगा , तब हम वहां आराधना करने जायेंगे!’ शंकारचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की भांति ही यति नरसिंहानंद ने दावा किया है कि राम मंदिर अभी बना ही नहीं है: आरएसएस ने इसे अपना मनी कलेक्टर सेंटर बना लिया है !’ बहरहाल धर्मस्थलों पर कब्जे के जरिये संघ जो आर्थिक साम्राज्य खड़ा करना चाहता है, वह कितना व्यापक है, इसे समझने के लिए हिन्दू धर्मस्थलों की गतिविधियों और उसमे होने वाले लेनदेन पर गौर करना होगा! विदित हो कि हिंदू धर्मस्थलों (मुख्य रूप से मंदिरों और तीर्थों) की गतिविधियों में दैनिक पूजा-पाठ, विशेष अनुष्ठान (जैसे यज्ञ और आरती), धार्मिक त्योहारों का आयोजन, और जन कल्याण कार्य शामिल हैं. ये स्थल आध्यात्मिक शांति, सांस्कृतिक शिक्षा और सामुदायिक सेवा के केंद्र के रूप में भी काम करते हैं.ये गतिविधियां मंदिर प्रबंधन कमेटियों द्वारा संचालित होती हैं, जिन पर पुरोहित वर्ग अर्थात ब्राह्मणों का कब्ज़ा है. आज के जमाने में हिन्दू मंदिर सिर्फ आस्था का केंद्र ही नहीं , रोजगार के बड़े केंद्र के रूप में भी विकसित हो चुके हैं, इसका अनुमान शिर्डी साईंबाबा संस्थान ट्रस्ट के अध्यक्ष व भामा परमाणु केंद्र में नाभिकीय वैज्ञानिक रहे डॉ. सुरेश हारवे के अध्ययन से लगाया जा सकता है. डॉ. हारवे ने ‘टेम्पल मैनेजमेंट’ नामक अपनी पुस्तक में बत्ताया है कि भारत में छः लाख गाँव हैं तो 30 लाख मंदिर हैं!यानी कुल गाँव से पांच गुना ज्यादा मंदिर हैं.यदि एक मंदिर में औसतन 10 लोगों को प्रबंधन से जोड़ें, तो तीन करोड़ लोगों की जरुरत पड़ेगी. तिरुपति में 16,000 कर्मचारी हैं. शिर्डी में 5,500 कर्मचारी हैं.किसी छोटे –मोटे मंदिर में भी पांच-दस लोग लगते ही हैं. तो करीब तीन करोड़ लोगों के सीधे रोजगार की व्यवस्था इन मंदिरों से हो सकती है. मंदिरों के इर्दगिर्द फूल – पत्ती वाले , पूजा का सामान बेचने वाले , चाय-नाश्ता वाले, टैक्सी-ऑटो –होटल इत्यादि भी जोड़ लें ,तो करीब इतने ही लोगों को परोक्ष रोजगार भी मिलता है. देश की आबादी 140 करोड़ है.मतलब परिवार हैं 35 करोड़ .इनमे से छः करोड़ लोग यदि प्रत्यक्ष या परोक्ष रोजगार पाते हैं , तो देश के मंदिर एक बड़े रोजगार प्रदाता सेक्टर का हिस्सा बन सकते हैं.’ बहुतों के मुताबिक धर्मस्थल बन गए हैं इनडस्ट्री, जिसे चला रहा है संघ.इस इनडस्ट्री में हर कदम पर कमाई होती है: होटल, रस्टोरेंट , दुकानें ,पार्किंग ,परिवहन ,प्रसाद , दान इत्यादि! यह एक पूरी अर्थव्यवस्था है ,जिस पर संघ कब्ज़ा जमाकर अपना आर्थिक साम्राज्य कायम करना चाहता है. कहने के लिए होटल, रेस्टोरेंट , फूल-पत्ती- प्रसाद की दुकानों, पार्किंग- परिवहन इत्यादि की अनुमति देने के लिए विभिन्न प्राधिकरण हैं, पर, इन्हें संचालित करता है संघ!
धार्मिक सेक्टर में संघ के एकाधिकार को रोकने के लिए जरुरी है: धर्मस्थलों की गतिविधियों का प्रजातंत्रीकरण
बहरहाल यदि डॉ. सुरेश हारवे के मुताबिक हमारे धार्मिक उद्योग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से 6 करोड़ लोगों को रोजगार सुलभ करा सकते हैं तो, यह मानकर चलना होगा कि इसके जरिये संघ अपने 6 करोड़ लोगों को धार्मिक सेक्टर में समायोजित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है.ऐसा होने पर भविष्य में उसकी शक्ति में कई गुना इजाफा हो जायेगा. ऐसे में जो लोग संघ को भारत की एकता ,अखंडता और सद्भावना के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं, उन्हें उसका आर्थिक साम्राज्य रोकने के लिए आगे आना चाहिए . पर, सवाल पैदा होता है, उसे धार्मिक सेक्टर को कब्ज़ा करने से रोका कैसे जाय? इसका सर्वोत्तम उपाय जिस महापुरुष ने बताया है, वह हैं : डॉ. आंबेडकर ,जिन्होंने आज से लगभग 90 वर्ष पूर्व अपनी सर्वोत्तम रचना ‘जाति का विनाश‘में हिन्दू धर्म को समावेशी बनाने और एक जाति विशेष के नियत्रण से धर्मस्थलों को मुक्त करने के लिए धार्मिक सेक्टर के प्रजातंत्रीकरण का उपाय सुझाया था ! डॉ. आंबेडकर के धर्मस्थलों की गतिविधियों के प्रजातंत्रीकरण का अर्थ जानने के पहले संस्थाओं के प्रजातांत्रिकरण का अर्थ समझ लेना होगा! संस्थाओं के प्रजातंत्रीकरण (Democratization of Institutions) का एक बहुत ही महत्वपूर्ण और प्राथमिक अर्थ विभिन्न सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना होता है. प्रजातंत्रीकरण का अर्थ मात्र चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक क्षेत्रों तक है. विभिन्न सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के अलावा, इसके मुख्य आयाम हैं:समावेशी भागीदारी (Inclusive Participation): संस्थाओं के निर्णय लेने की प्रक्रिया में समाज के सभी वर्गों—विशेष रूप से हाशिए पर रहने वाले, वंचित और अल्पसंख्यकों—की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करना. जवाबदेही और पारदर्शिता (Accountability and Transparency): संस्थाओं को केवल अभिजात वर्ग (elite) के नियंत्रण से मुक्त करके आम नागरिकों के प्रति जवाबदेह और पारदर्शी बनाना. समान अवसर (Equal Opportunity): जाति, धर्म, लिंग या वर्ग के आधार पर बिना किसी भेदभाव के संस्थागत संसाधनों और पदों तक सभी की पहुँच बनाना. समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान के संदर्भ में, यह अवधारणा सामाजिक समावेश (Social Inclusion) को बढ़ावा देती है ताकि कोई भी वर्ग खुद को व्यवस्था से बाहर न समझे. जहाँ तक धर्मस्थलों के प्रजातंत्रीकरण पर डॉ आंबेडकर की राय का सवाल है, उनका मानना था कि हिंदू मंदिर सार्वजनिक संपदा हैं, इसलिए उनका नियंत्रण केवल कुछ वंशानुगत परिवारों या पुरोहितों के हाथों में नहीं होना चाहिए. उन्होंने मंदिरों के लोकतांत्रिक प्रबंधन की वकालत की, जिसमें सभी वर्गों और दलितों की भागीदारी हो, ताकि वहां होने वाले क्रिया-कलाप पारदर्शी, गैर-भेदभावपूर्ण और समाज कल्याण के अनुकूल हों.मंदिर प्रबंधन और वहां की गतिविधियों के बंटवारे पर उनके विचारों के प्रमुख बिंदु हैं लोकतांत्रिक और प्रतिनिधि प्रबंधन: बाबासाहेब का मानना था कि मंदिरों को किसी एक विशेष जाति या कुलीन वर्ग की जागीर नहीं रहने देना चाहिए. उन्होंने मांग की कि मंदिर समितियों में अनुसूचित जातियों (SC), अनुसूचित जनजातियों (ST), महिलाओं और अन्य वंचित समुदायों के प्रतिनिधि शामिल किए जाएं. सार्वजनिक संपत्ति का उपयोग: उनके दृष्टिकोण में मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं थे, बल्कि सामाजिक और आर्थिक उत्थान के केंद्र भी हो सकते थे. उनका तर्क था कि मंदिरों के संसाधनों का उपयोग सभी के कल्याण, शिक्षा और आर्थिक विकास के लिए होना चाहिए. सारांश में डॉ. आंबेडकर ने हिन्दू धर्मस्थलों के प्रजातंत्रीकरण का जो सुझाव दिया था, उसके अनुसार पुरोहिती में सिर्फ ब्राह्मणों का एकाधिकार न होकर , उसमें क्षत्रिय , वैश्य , दलित, आदिवासी ,पिछड़े सामाजिक समूहों के स्त्री और पुरुषों को भी पौरोहित्य का कार्य संपन्न करने का अवसर मिले. इसी तरह धर्मस्थलों को केन्द्रित करके होटल, रेस्टोरेंट , फूल-पत्ती- प्रसाद की दुकानों, पार्किंग- परिवहन इत्यादि के रूप में जो अर्थव्यवस्था विकसित होती है उसमें भी ब्रह्मणों के साथ क्षत्रिय , वैश्य , दलित, आदिवासी ,पिछड़े इत्यादि के रूप में विद्यमान ब्राह्मणेतर सामाजिक समूहों के स्त्री और पुरुषों को उचित अवसर मिले!
प्रजातंत्रीकरण से दूर है : अयोध्या का राम मंदिर
दुर्भाग्स से देश में जो लाखों मंदिर हैं, वे प्रजातंत्रीकरण से दूर हैं, जिसका अपवाद अयोध्या का राम मंदिर भी नहीं है, यद्यपि उसमें विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रयास हुआ है. गूगल से प्राप्त सूचना के मुताबिक राम मंदिर में 24 पुजारियों का चयन किया गया है, जिनमें सामाजिक समरसता का संदेश देते हुए 21 सवर्ण (ब्राह्मण), 2 अनुसूचित जाति (SC) और 1 अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से शामिल हैं. मुख्य दैनिक पूजा के लिए महिलाओं की प्रत्यक्ष हिस्सेदारी (मः ख्य पुजारी के रूप में) नहीं है. पुजारियों का चयन जाति-आधारित न होकर पूरी तरह योग्झता और ज्ञान के आधार पर किया गया है. नवंबर 2023 से शुरू हुई चयन प्रक्रिया में लगभग 3,240 अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया था, जिसमें से तीन राउंड के इंटरव्यू और 14 सवालों के आधार पर अंतिम 24 पुजारियों को चुना गया, चयनित 24 पुजारियों में 21 ब्राह्मण, 2 दलित (SC) और 1 OBC समुदाय से हैं. सभी पुजारियों को मंदिर के महंत मिथिलेश नंदिनी शरण और महंत सत्यनारायण दास द्वारा रामानंदी परंपरा और कर्मकांड/पौरोहित्य का 3 महीने का विशेष प्रशिक्षण दिया गया है. राम मंदिर की मुख्य पूजा-पद्धति और कर्मकांड का दायित्व केवल पुरुष (वैरागी) संतों को ही सौंपा गया है. मंदिर जिस रामानंदी संप्रदाय की परंपराओं का पालन करता है, उसमें मुख्य मूर्ति की दैनिक पूजा (जैसे नहलाना, वस्त्र पहनाना) केवल पुरुष पुजारियों द्वारा की जाती है. हालाँकि, अन्य क्षेत्रों और मंदिरों में महिलाओं की भागीदारी भजन-कीर्तन, दर्शन और स्वैच्छिक सेवाओं तक सीमित है! जो दलित, पिछड़े, महिलाएं धर्मादेशों के जरिए मंदिरों की धार्मिक गतिविधियों से सदियों से पूरी तरह बहिष्कृत रहे, उनका राम मंदिर की गतिविधियों में भागीदारी निश्चय ही एक क्रान्तिकारी कदम माना जायेगा. लेकिन जिस तरह पुजारियों की नियुक्ति में अब्राह्मणों: क्षत्रिय और वैश्यों की पूरी तरह अनदेखी करने के साथ एससी और ओबीसी को न्यूनतम प्रतिनिधित्व दिया गया है, उससे राम मंदिर के प्रजातान्त्रिकरण पर प्रश्न चिन्ह खड़े होते हैं. वहां जो होटल, रेस्टोरेंट, फूल-पत्ती- प्रसाद की दुकानों, पार्किंग परिवहन इत्यादि विकसित किये गए हैं, उसमें भी विभिन्न समूहों की वाजिब हिस्सेदारी होनी चाहिए !
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि धर्मशास्त्रों की वर्जनाओं को दरकिनार हिन्दू धर्मस्थलों के गतिविधियों के प्रजातंत्रीकरण की दिशा में एक प्रयास हुआ है, जो सराहनीय है. अभी हाल ही में चंपत राय और अनिल मिश्र के इस्तीफे के बाद जिस तरह श्रीराम जन्भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रष्ट का अंतरिम महासचिव दलित समुदाय में जन्मे कृष्णमोहन को बनाया गया है, उसकी भूरि-2 सराहना हो रही है. मीडिया में कहा जा रहा है कि कृष्णमोहन के रूप में ट्रष्ट महासचिव के चयन में सबके राम’ का संदेश भी निहित है. ट्रष्ट का यह निर्णय समाज के विभिन्न वर्गों को साथ लेकर चलने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है. उनके चयन में यह संदेश भी है कि ‘मंदिर आन्दोलन’ शुरू से ही ‘सबके राम’ की अवधारणा पर आधारित रहा. निषादराज, वाल्मीकि और शबरी को प्रभु राम ने जिस सम्मान से अपनाया था, कृष्णमोहन का अंतरिम महासचिव के पद पर मनोनयन, उसी भाव का विस्तार है. ऐसे में कृष्णमोहन के चयन को लेकर जो नैरेटिव गढ़ा जा रहा है, उससे विपक्ष को सावधान रहने की जरुरत है. जमीनी स्तर पर इसे लेकर दलितों में एक गर्व बोध का भी संचार हुआ है. ऐसे में भाजपा कृष्णमोहन के जरिए राम मंदिर में हुए लूट से उभरे जनाक्रोश को कम करने का प्रयास चला सकती है और अपने प्रबल प्रचारतंत्र के जरिए कामयाब भी हो सकती है. अतः संघ के आर्थिक साम्राज्य को रोकने के साथ कृष्णमोहन के जरिये दलित जातियों में जो गर्व बोध पैदा करने का प्रयास चल रहा है, उसके लिए विपक्ष के समक्ष धर्म स्थलों के मुकम्मल प्रजातंत्रीकरण का मुद्दा खड़ा करने से भिन्न कोई विकल प नहीं है. अबतक संघ भाजपा की ओर से धर्मस्थलों के प्रजातंत्रीकरण का जो प्रयास हुआ है, वह निहायत ही प्रतीकात्मक है. ऐसे में जब राम मंदिर जैसे महा-पवित्र मंदिर में हुई चोरी में संघ के बड़े-बड़े लोगों का नाम आने से जो एक जनाक्रोश फैलता दिख रहा है, उस जनाक्रोश को तुंग पर पहुंचाने के लिए विपक्ष धर्मस्थलों की समस्स् गतिविधियों के सम्पूर्ण प्रजातंत्रीकरण का मुद्दा खड़ा काफी कारगर हो सकता है! इसके लिए विपक्ष क्षत्रिय, वैश्य, दलित, आदिवासी, पिछड़े समस्त अब्राहमण समूहों को उनकी संख्यानुपात में ट्रष्टी बोर्ड, पुजारियों की नियुक्ति सहित होटल, रेस्टोरेंट, फूल-पत्ती प्रसाद की दुकानों, पार्किंग- परिवहन इत्यादि के रूप में विकसित अर्थव्यवस्था में वाजिब हिस्सेदारी की मांग 2027 में होने वाले यूपी चुनाव के घोषणापत्र में शामिल करने पर विचार करे! ऐसा होने पर अप्रतिरोध्य बनी भाजपा कारुणिक स्थिति में पहुँच जायेगी और संघ के हिन्दू राष्टर के मंसूबों पर पानी फिर सकता। कारण, संघ प्रतीकात्मता से आगे बढ़कर धर्मस्थलों के मुकम्मल प्रजातंत्रीकरण के लिए कभी तैयार ही नहीं हो सकताः वह हर हाल में वहां ब्राह्मणों का एकाधिकार बनाये रखने का प्रयास करेगा ही करेगा. ऐसे में ट्रष्ट का मेम्ब्र, मंदिरों का पुजारी बनने सहित उसकी सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था में भागीदारी की चाह में क्षत्रिय, वैश्य, दलित, आदिवासी, पिछड़े समुदायों के स्त्री पुरुष संघ-भाजपा से छिटक कर विपक्ष के पाले में जा सकते हैं! सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था में भागीदारी की चाह में क्षत्रिय, वैश्य, दलित, आदिवासी, पिछड़े समुदायों के स्त्री पुरुष संघ-भाजपा से छिटक कर विपक्ष के पाले में जा सकते हैं! धार्मिक सेक्टर में वंचितों की भागीदारी के लिए लम्बे समय से चलाये जाते रहे हैं आन्दोलन विपक्ष यदि म दिरों के गतिविधियों के प्रजातंत्रीकरण की लड़ाई लड़ता है तो यह कोई नई बात न होकर अतीत में चलाये गए आन्दोलनों का विस्तार ही होगा! इतिहास बताता है हिन्दू धर्मस्थलों में गैर- ब्राह्मणों (विशेषकर दलित, पिछड़ों) को मंदिरों में प्रवेश और पूजा का अधिकार दिलाने के लिए कई महान नेताओं और संतों ने संघर्ष चलाया इनमे सबसे प्रमुख नाम डॉ. आंबेडकर और कोल्हापुर के राजा छत्रपति शाहूजी के आते हैं. शाहूजी महाराज ने महाराष्ट में गैर-ब्राह्मण समुदायों को सशक्त बनाने के लिए कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर में गैर-ब्राह्मणों और पिछड़े वर्ग के पुजारियों की नियुक्ति कर ब्राह्मणवादी वर्चस्स को चुनौती दी थी. डॉ. आंबेडकर ने समाज में समानता लाने के लिए 1927 में मंदिर प्रवेश आन्दोलन चलाया. इसके तहत 2 मार्च, 1930 को प्रसिद्द कालाराम मन्दि र प्रवेश सत्माग्रह किया, जिसमें हजारो लोगों ने हिस्सा लिया. 21 वी सदी में हिन्दू मंदिरों में गैर-ब्राह्मणों को पुजारी नियुक्त करने और उन्हें समान अधिकार दिलाने का बड़ा प्रयास तमिलनाडु में द्रमुक के नेता एस. करूणानिधि ने चलाया. करूणानिधि की सरकार ने हिन्दू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त अधिनियम में ऐतिहासिक संसोधन किए, जिसका मुख्य उद्देश्य जाति के बजाय योग्झता के आधार पर सभी जाति के लोगों को मंदिरों में ‘अर्चक’ (पुजारी) बनाना रहा. उनके प्रयासों के फलस्वरूप 2006 में तमिलनाडु के 36, 000 सरकारी मंदिरों में सभी जातियों (गैर-ब्राह्मणों सहित) के लोगों को पुजारी नियुक्त करने का आदेश जारी हुआ, जिसे 2021 में अमलीजामा पहनाया एमके स्टॅलिन ने. केरल के मंदिरों में पुजारियों की नियुक्ति में आरक्षण और गैर- ब्राह्मणों को शामिल करने का ऐतिहासिक आदेश अक्तूबर 2017 में त्रावणकोर देवस्म बोर्ड द्वारा जारी किया गया. धर्मस्थलों की गतिविधियों में गैर-ब्राह्मणों को हिस्सेदारी देने का दृष्टान्त आन्ध्र प्रदेश में भी कायम हुआ. वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने सितंबर 2019 में वाईएसआरसीपी (YSRCP) सरकार के तहत तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) ट्रस्ट् बोर्ड का गठन करते हुए गैर-ब्राह्मण सदस्यों को शामिल किया था। 2023 में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली राजस्थान सरकार ने राज्य के देवस्थान विभाग द्वारा संचालित मंदिरों में पहली बार गैर-ब्राहमणों को पुजारी नियुक्त किया था. अभी ताजा और उज्ज्वलतम दृष्टान्त खुद आरएसएस ने दलित कृष्णमोहन को राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रष्ट का अंतरिम महासचिव बनाकर स्थापित किया है. ये दृष्टान्त बताते हैं कि धार्मिक सेक्टर में अब्राह्मण समुदायों के स्त्री-पुरुषों की हिस्सेदारी धर्मसम्मृत है!
धर्मस्थलों की गतिविधियों में प्रजातंत्रीकरण के दो खास फायदे
वैसे तो धर्मस्थलों की गतिविधियों में प्रजातंत्रीकरण के ढेरों फायदे हैं, लेकिन दो ऐसे विशेष फायदे हैं, जिससे हिन्दू धर्म को अपार लाभ मिल सकता है. इनमे पहला लाभ यह होगा कि इससे हिन्दू धर्म को शर्मसार करने वाले दान /चढ़ावा चोरी में भारी कमी आ जाएगी. चूँकि ब्राह्मण खुद को भूदेवता समझने की मानसिकता से पुष्ट हैं, इसलिए वे ईश्वर के नाम पर मिले दान के भोग का खुद को अधिकारी समझते हैं. यही कारण है मंदिरों की धन संपत्ति की चोरी में अक्सर ब्राह्मणों का नाम प्रकाश में आता है. ब्राह्मणों के विपरीत गैर- ब्राह्मण जातियों में ईश्वर के प्रति श्रद्धा व भय का भाव रहता है, इसलिए वे मंदिरों में चोरी का जल्दी दुसाहस नहीं कर सकते दूसरी बात यह है कि गैर-ब्राह्मणों, विशेषकर दलित आदिवासी में आकांक्षा स्त्र (Level of Aspiration) बहुत निम्स होता है, इसलिए वे थोड़े में संतुष्ट रहते हैं और बड़ा आर्थिक अपराध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते. धर्म के मामले में ब्राह्मणों का आकांक्षा स्म्र (Level of aspiration) बहुत ही उच्च होता है. वे थोड़े से संतुष्ट नहीं हो पाते, वे मंदिर के सारे धन पर अपना दैवीय अधिकार समझते हैं, इसलिए भगवान के नाम पर मंदिरों में पड़े धन को अपना मानकर अयोध्या जैसे कांड अंजाम दे देते है. भ्रष्टाचार के पीछे क्रियाशील इस सामजिक मनोविज्ञान के कारण गैर-ब्राह्मणों की उपस्थिति में धर्मस्थलों पर भ्रष्टाचार में कमी आना तय है! गैर-ब्राह्मणों को हिस्सेदारी देने से मंदिरों में चोरी- गबन की घटनाओं में कमसे कम 75 प्रतिशत गिरावट आएगी, इसके प्रति आश्वस्त हुआ जा सकता है. धर्मस्थलों में भ्रष्टाचार की कमी के साथ जो दूसरा बड़ा लाभ होगा, वह यह कि इससे हिन्दू धर्म में समावेशीकरण (Inclusion) की प्रक्रिया तेज होगी. इससे गैर- ब्रह्मण जातियां दिल से हिन्दू धर्म से जुड़ना शुरू करेंगी. अबतक वे मंदिरों की गतिविधियों में बहिष्कार (Exclusion) का शिकार रही हैं. धर्मस्थलों में अबतक Exclusive नीति का पालन होता रहा है, जिसका लाभार्थी वर्ग ब्राहमण रहे है. हिंदू मंदिरों की Exclusive नीति के तहत ही ब्राह्मणों का मंदिरों की गतिविधियाँ चलाने और सुख सुविधाओं के भोग के एकाधिकारी हैं. मंदिरों में ब्राह्मणेतर जातियों के बहिष्कार के कारण देश में धर्मान्तरण की बाढ़ आई. करोड़ों हिन्दू मुसलमान- ईसाई- बौद्ध बने. आज भी यह प्रक्रिया जारी है. धर्मस्थलों के प्रजातंत्रीकरण से समावेशीकरण Inclusion की प्रक्रिया शुरू होगी, जिससे हिन्दू धर्म को बेहिसाब लाभ मिलेगा. अगर मीडिया और भाजपा समर्थक सोचते कि संघ ने दलित संघी कृष्णमोहन को कृष्णमोहन को राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रष्ट का अंतरिम महासचिव बनाकर ‘सबके राम’ का संदेश दे दिया है तो वे भ्रम में हैं: ‘सबके राम’ का सही संदेश उस दिन पूरी दुनिया में जायेगा, जिस दिन समस्त हिन्दू धर्मस्थलों का प्रजातंत्रीकरण होगा !
(लेखक उत्तर प्रदेश के कांग्रेस कमेटी के विचार विभाग के चेयरमैन हैं.)
