Rahul Gandhi’s Birthday: सौ रोगों की एक दवा : राहुल गांधी का जितनी आबादी उतना हक़ सिद्धांत!

Rahul Gandhi’s Birthday: आज अपनी उम्र के 56 वर्ष पूरे कर रहे राहुल गांधी भारत की आखिरी उम्मीद बन चुके हैं और लोग उनमें महात्मा गांधी छवि देखने लगे हैं.

 

एचएल दुसाध

न्यूज़ इंप्रेशन

Delhi: आज 19 जून है: राहुल गांधी का जन्मदिन. 14 साल की उम्र में गोलियों से छलनी अपनी दादी और 21 से भी कम उम्र में गठरी में बाँधकर लाई गई पिता की लाश का साक्षात् करने वाले राहुल गांधी आज तमाम प्रतिकूलताओं को जय कर एक जननायक की भूमिका में अवतरित हो चुके है. आज अपनी उम्र के 56 वर्ष पूरे कर रहे राहुल गांधी भारत की आखिरी उम्मीद बन चुके हैं और लोग उनमें महात्मा गांधी छवि देखने लगे हैं. अधिकांश लोग मान रहे हैं कि जिस कठिन हालात में महात्मा गांधी ने अंग्रेजो के खिलाफ भारत को आजाद कराने की लड़ाई लड़ी उससे भी विकट हालात में राहुल भारत को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. मोदी राज में जो आन्सुरिक साम्राज्यवाद और चुनावी निरंकुशता की भयावह स्थिति कायम हुई है, उसमें राहुल गांधी की स्थिति अंग्रेज भारत के भगत सिंह जैसी हो गई है. आज वह प्रायः अकेले ही अंग्रेजों से भी ज्यादा खतरनाक हिंदुत्‌वादी सत्ता के खिलाफ भगत सिंह की भांति ही शहीदी तेवर के साथ मैदान में डटे हुए हैं और भाजपा से भयाक्रांत दूसरे दलों के नेता पःरायः तमाशबीन की भूमिका में है. अघोषित हिन्दू राष्ट्र के जरिये बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से भाजपा जिस तरह हजारों साल पूर्व की मनुवादी व्यवस्था को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, धर्माधारित उस व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी यह रही कि उसमें शास्त्रों की साजिश से दलित, आदिवासी, पिछड़ों में शक्ति के स्रोतों के भोग की वासना इस तरह से लुप्त कर दी गई कि उनमें प्रगति और परिवर्तन की चाह ही मर गई और वे चिरकाल के लिए आकांक्षाहीनता के शिकार हो गए. आजादी के बाद डॉ. आंबेडकर के संविधान ने उनमें शक्ति के स्रोतों के भोग की आकांक्षा (Aspirations) का बीजारोपड़ किया और वे सहजता से डॉक्टर, प्रोफ़ेसर, इंजीनियर, सांसद विधायक बनने का सपना देखने लगे. बाद में मान्धवर कांशीराम ने उनमें शासक बनने का जो अभियान चलाया, उससे दलित, आदिवासियों की तरह ओबीसी वर्ग में भी राजनीति की संस्थाओं में जगह बनाने की चाह पनपी और देखते ही देखते आज हम राजनीति के क्षेत्र में असमानता की खाई को पाटने में सफल हो गए हैं. जरुरत थी अब एक ऐसे नायक के उदय की जो उनमें कंपनियों, अखबारों, अस्पतालों के मालिक और मैनेजर; ठेकेदार, सप्लायर, प्रोफ़ेसर ही नहीं यूनिवर्सिटियों के वीसी और पॉवर सेक्टर में संख्धानुपात में हिस्सेदार बनने का सपना दे सके! और इतिहास की इसी जरुरत को पूरा करने के दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहे हैं राहुल गांधी! शक्ति के समस्त स्रोतों सहित पॉवर सेक्टर में’ जितनी आबादी उतना हक़ लागू करने के निरंतर आह्वान के जरिये उन्होंने एक कुशल मनोचिकित्सक की भांति मनुवादी व्यवस्था के गुलामों (दलित-आदिवासी पिछड़े और आधी आबादी) की साईक में बड़ा बदलाव ला दिया है और उनमें देश की टॉप 10 कंपनियों में जगह बनाने, अस्पताल खोलने वीसी इत्यादि बनने सहित बड़ा ठेकेदार, सप्लायर इत्यादि बनने की चाह कुंडली मारने लगी है. और सत्ता में आने पर कांग्रेस’ जितनी आबादी उतना हक्र’ सिद्धांत लागू कर दलित, आदिवासी, पिछड़ों में उभरी उच्चाकांक्षा को जमीन पर उतारने का अवसर देगी, इसके प्रति ढेरों लोग आशावादी हो चले हैं. बहरहाल आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक इत्यादि तमाम क्षेत्रों में राहुल गांधी का’ जितनी आबादी, उतना हक़’ सिद्धांत मनुवादी व्यवस्था के वंचितों को प्राइवेट कंपनियों, अस्पतालों, अख़बारों चैनलों का मालिक और मैनेजर यूनिवर्सिटियों वीसी, बड़े लेवल के ठेकेदार, सप्लायर इतः यादि तो बनाएगा ही, यह कैसे सामाजिक आर्थिक विषमताजन्म समस्त समस्यायों से देश को निजात दिला सकता है, उसकी झलक निम्म पंक्यियों में देखी जा सकती है! 250 वर्षों के बजाय महज कुछ दशको के मध्य भारत की आधी आबादी को पुरुषों की बराबरी में लाने के लिए: जितनी आबादी उतना हक़! आजाद भारत में लगभग दो दशकों में संघ प्रशिक्षित प्रधानमंत्रियों, विशेषकर नरेंद्र मोदी ने जो नीतियां ग्रहण कीं, उसका सबसे ज्यादा सुफल अगर अपर कास्ट्र के पुरुषों को मिला है तो इसमें सर्वाधिक वंचना का शिकार रही है आधी आबादी! मोदी राज में आधी आबादी कहां पहुंच गई है, इसकी सटीक जानकारी’ वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम’ द्वारा 2006 से प्रकाशित हो रही ‘ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट’ देती रही है. ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट में चार आयामों-आर्थिक भागीदारी और अवसर, शिक्षा का अवसर, स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता और राजनीतिक सशक्तीकरण- के आधार पर महिलाओं और पुरुषों के मध्य सापेक्ष अंतराल में हुई प्रगति का आकलन किया जाता है ताकि इस वार्षिक रिपोर्ट के आधार पर प्रत्येक देश स्त्री और पुरुषों के मध्य बढ़ती असमानता की खाई को पाटने का सम्मक कदम उठा सके। वैसे तो शुरुआत से ही इस रिपोर्ट में भारत की रैंकिंग कभी सम्मानजनक नहीं रही, फिर भी मोदी के सत्ता में आने के पूर्व 2013 में भारत की रैंकिंग 136 देशों में 101 रही। लेकिन मोदी राज में स्थिति बद से बदतर होती गई। बद से बदतर होते आज भारत की आधी आबादी कहाँ, पहुंच गई है, इसकी चौकाने वाली जानकारी ‘ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट- 2021’ में मिली, जिसमें बताया गया था कि पूरे विश्व में लैंगिक समानता का लक्ष्य पाने में जहां औसतन 135 वर्ष लग जायेंगे, वहीं भारत की आधी आबादी को पुरुषों की बराबरी में आने में 257 साल लगेंगे। यह एक ऐसा तथ्य था जिसे देखकर मोदी सरकार की नींद उड़ जानी चाहिए थी और लैंगिक असमानता का खात्मा सरकार के शीर्ष प्रोग्राम में आ जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ! मोदी सरकार नारी- शक्ति के पूजन- वंदन में लगी रही और लैंगिक असमानता ज्यों की त्यों बनी रही। बहरहाल इसमें कोई शक नहीं की 70 करोड़ आबादी की स्वामिनी भारत की आधी आबादी की समस्या संभवतः विश्व की सबसे बड़ी समस्या है. कारण, 70 करोड़ आबादी में यूरोप के तीन दर्जन से अधिक और अमेरिका जैसे दो देश समा जाएंगे. विश्व में सबसे बड़ी समस्या का रूप धारण कर चुकी इस समस्या की उत्पत्ति का कारण है धार्मिक- सांस्कृतिक कारणों स भारत में दलित- आदिवासी पिछड़े और अमेरिका के अश्वेतों की भांति शक्ति के स्रोतों से आधी आबादी का बहिष्कार (exclusion). यदि राहुल गांधी के जितनी आबादी उतना हक़ का अनुसरण करते हुए शक्ति के समस्त स्रोतों में बंटवारे में विभिन्न सामाजिक समूहों को मिलने वाली हिस्सेदारी में पहला 50% उसकी आधी आबादी को प्राथमिकता के साथ दे दिया जाय तो शर्तिया तौर पर कुछ ही दशकों के मध्य आधी आबादी भारत के पुरुषों की बराबरी में पहुँच जाएगी! ऐसे में कहा सकता है भारत में लैंगिक समानता की रामवाण दवा है राहुल गांधी का जितनी आबादी उतना हक़ सिद्धांत !

भ्रष्टाचार को न्यूनतम करने के लिए: जितनी आबादी उतना हक़!

असंख्य समस्यायों से घिरे अभागे देश भारत में आजादी के 78 वर्षों बाद भी भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है. कईयों के अनुसार तो यही सबसे बड़ा मुद्दा है। कुछ वर्ष पूर्व इसे ही सबसे बड़ा मुद्दा बता और इसके निवारण के लिए जनलोकपाल लागू करने का शोर मचाकर एक एनजीओ गिरोह ने देश की राजनीति में खास जगह बना लिया, किन्तु तमाम शोर-शरावों के बावजूद आज भी पहले की भांति रह-रहकर भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े मामले सामने आ जाते हैं। इस समय विजय माल्या, नीरव मोदी, ललित मोदी, नितिन संदेसरा, चेतंम संदेसरा, हितेश कुमार नरेंद्रभाई पटेल, जुनैद इकबाल मेमन, बाजरा मे मन, मेहुल चौकसी, जतिन मेहता इत्सादि जैसे बड़े-बड़े लोग अपने दिमाज पूर्ववर्तियों: 43,000 करोड़ का स्टाम्प घोटाला (1991) करने वाले अब्दुल करीम तेलगी, 1,600 करोड़ के दूरसंचार घोटाला (1996) के नायक पंडित सुखराम, 4,000 करोड़ के प्रतिभूति घोटाला (1992) के नायक हर्षद मेहता, 32 करोड़ यूटीआई घोटाला के हीरो पी. एस. सुब्रमणियम, 1,350 करोड़ के म्युचुअल फण्डू घोटाले (2001) को अंजाम देने वाले केतन पारीख, 24,000 करोड़ के सत्पम घोटाले के महानायक रामालिंगम राजू इत्यादि को बौना बनाते हुए विदेशों में छुपे हुए हैं। कुछ वर्ष पूर्व प्रकाशित एक खबर के मुताबिक स्विट्जरलैंड के बैंकों में भारतीय कंपनियों और बड़े लोगों का धन 2021 के दौरान 50 प्रतिशत बढ़कर 14 साल के उच्च स्तर 3.83 अरब स्विस फ्रैंक (30,500 करोड़ से अधिक) पर पहुंच गया था। बहरहाल समय-समय पर बड़े-बड़े घपले-घोटालों में जिनका नाम सामने आता है, उनकी जाति पृष्ठभूमि देखने से साबित हो जाता है कि बड़े स्तर के भ्रष्टाचार में शक्तिशाली उच्च वर्णों की संलिप्तता ज्यादे रहती है: राष्ट्र को हिलाकर रख देने वाले घपला घोटाला अंजाम दे सकने का सामर्थ्य उनमे ही है. लेकिन शक्ति के समस्त स्रोतों में राहुल गांधी का जितनी आबादी.. सिद्धांत लागू होने पर वे धीरे-धीरे ऐसा काण्डू अंजाम देने में असमर्थ हो जायेंगे। कारण, तब शक्ति के सभी स्रोतों सहित पॉवर स्ट्रक्चर में अवसरों का बंटवारा भारत के प्रमुख पांच सामाजिक समूहों सवर्ण, ओबीसी, एससी, एसटी और धार्मिक अल्पसंख्यकों के स्त्री-पुरुषों के संख्यानुपात में होगा। इससे जिस खास वर्ग का उद्योग, व्यापार, मीडिया, मिलिट्री के उच्च पदों, न्सायपालिका, मंत्रालयों के सचिव आदि पदों पर 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा है, एवं जहां का भ्रष्टाचार ही राष्ट्र के लिए विराट समस्या बन गया है, वहां वे 7-8 प्रतिशत पर सिमटने के लिए बाध्य होंगे। कारण, उपरोक्त सभी क्षेत्रों में लैंगिक विविधता लागू होने पर उसका आधा हिस्सा उनकी महिलाओं के हिस्से में चला जाएगा। हालांकि राष्ट्र को हिलाकर रख देने वाले बड़े-बड़े घोटालों में कभी-कभी प्रभुवर्ग की महिलाओं का भी नाम आता है, जिन्हें अपवाद ही माना जाएगा। सामान्यतया इन महिलाओं में भी दलित-पिछड़ों की भांति ऐतिहासिक कारणों से आकांक्षा स्तर (Level of Aspirations) और उपलब्धि-अभिप्रेरणा (Achievement motivation) निम्म स्त की है। इसका आधिक्य प्रभुवर्ग के पुरुषों में ही हैं। ऐसे में प्रभुवर्ग के पुरुष जब राहुल गांधी के जितनी आबादी उतना हक़ के रास्ते महज 7-8 प्रतिशत अवसरों तक सिमटने के लिए बाध्य होंगे, तब निश्चय ही भ्रष्टाचार में मात्रात्मक गिरावट आएगी। भ्रष्टाचार कम करने में राहुल गांधी का यह सिद्धांत एक और रूप में प्रभावी साबित हो सकती है। वह इस तरह कि जब अपराधों पर रोक लगाने वाली ईडी, सीबीआई, न्यायपालिका इत्यादि में प्रभु वर्ग के पुरुषों की उपस्थिति 80-85 प्रतिशत की जगह महज 7-8 प्रतिशत पर सिमटेगी, तब उनमें मनोवैज्ञानिक सुरक्षा की कमी आ जाएगी। इस मनोवैज्ञानिक सुरक्षा के अभाव में निश्चय ही भ्रष्टाचार में गिरावट आयेगी।

संविधान के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जितनी आबादी – उतना हक़!

 2015 में संविधान दिवस की घोषणा करने वाली मोदी सरकार जिस तरह आंबेडकर में प्रेम में सभी दलों को बौना बनाने के बावजूद बारास्ता हिन्दू राष्ट्र मनु का विधान लागू करने में जुटी हुई है, उससे भारत का वह महान संविधान काफी हद तक निष्प्र‌भावी हो गया है, जिसकी उद्देश्यिका में भारत के लोगों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्प्राय सुलभ कराने की घोषणा की गयी है। यही कारण है आजकल वंचित वर्गों के असंख्य संगठन और नेता आरक्षण के साथ संविधान बचाने में जुटे हैं. लेकिन जिस तरह मोदी सरकार विनिवेशीकरण, इडब्ल्यूएस आरक्षण, लैटरल इंट्री सहित विविध तरीके से संविधान को व्यर्थ करने में सर्वशक्ति लगा रही है, वैसी स्थिति में एक ही उम्मीद दिखती है, वह यह कि कांग्रेस सत्ता में आए और शक्ति के समस्त स्रोतों सहित पॉवर स्ट्रक्चर में राहुल गाँधी का जितनी आबादी उतना हक़ सिद्धांत लागू करें. इसी रास्ते ही संविधान भारत के लोगों को अपनी उद्देश्यिका में वर्णित तीन न्यायः सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुलभ कराने में समर्थ हो पायेगा! पिछले कुछ सालों से जिस तरह राहुल गांधी संविधान को बचाने के जंग में झोंके हुए है, उससे लगता है सत्ता में आने पर कांग्रेस संविधान को दृढतर करने में कमी नहीं छोड़ेगी!

मुस्लिम समुदाय की बदहाली की तस्वीर को खुशहाली में बदलने के लिएः जितनी आबादी उतना हक़!

30 नवम्बर 2006 को जब जस्टिस राजेन्द्र सच्चर की 403 पृष्ठीय रिपोर्ट प्रकाशित हुई. उसमें मुस्लिम समाज के बदहाली की तस्वीर देखकर तमाम संवेदनशील लोग सकते में आ गए थे। उस रिपोर्ट से पहली बार बता चला कि भारतीय मुसलमानों की स्थिति अनुसूचित जाति-जनजाति से भी खराब है। सच्चर रिपोर्ट में राष्ट्र को सकते में डालनेवाली तस्वीर इसलिए उभरी थी, क्योंकि कल के शासक मुस्लिम समुदाय को आजाद भारत में सुपरिकल्पित तरीके से धीरे-धीरे शक्ति के स्रोतों से दूर धकेल दिया गया था। और आज तो उन्हें आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक इत्यादि क्षेत्रों से ऐलानिया तौर पर महरूम कर, उन्हें बहुत ही बदहाल दशा में पहुंचाने का अभियान ही चल रहा है. अब किसी को भी शक नहीं कि भाजपा सरकारों की साजिश से मुस्लिम समुदाय आज बहुत ही बदहाल स्थिति में पहुँच गया हैं। उनकी बदहाली पूरी तरह से तभी दूर हो सकती है जब शक्ति के स्रोतों में उनको वाजिब हिस्सेदारी मिले। ऐसा मुमकिन हो सकता है सिर्फ राहुल गांधी का जितनी आबादी उतना हक़ सिद्धांत लागू होने से. ऐसा होने से मुस्लिम समुदाय के भी स्त्री-पुरुषों को सेना व न्यायालयों सहित सरकारी और निजीक्षेत्र की सभी स्तर की, सभी प्रकार की नौकरियों, डीलरशिप, सप्लाई, सड़क-भवन निर्माण इत्यादि के ठेकों, पार्किंग, पुरिवहन, शिक्षण संस्थानों, विज्ञापन व एनजीओ को बंटने वाली राशि, ग्राम पंचायत, शहरी निकाय, संसद-विधानसभा की सीटों, राज्य एवं केन्द्र की कैबिनेट; विभिन्न मंत्रालयों के कार्यालयों; विधान परिषद-राज्यसभा, राष्ट्रपति, राज्यपाल एवं प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री के कार्यालयों इत्यादि के कार्यबल में संख्यानुपात में अवसर मिलने की सम्भावना रहेगी। ऐसा होने से मुस्लिम समुदाय के बदहाली की तस्वीर खुशहाली में बदलना तय है।

आरक्षण से उपजते गृहयुद्ध के हालात से निजात पाने के लिए जितनी आबादी – उतना हक़ !

आज जाट, गुर्जर, पटेल, कायस्थ, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य हर किसी को आरक्षण चाहिए। विभिन्न जातियों में आरक्षण की बढ़ती मांग ने धीरे-धीरे देश में गृहयुद्ध के हालात पैदा कर दिये हैं। इससे कभी भी विस्फोटक स्थिति पैदा हो सकती है। राहुल गांधी का भागीदारी सिद्धांत लागू होने पर राष्ट्र इस विस्फोटक हालात से निजात पा जाएगा, इसकी पूरी उम्मीद है। क्योंकि जितनी आबादी उतना हक़ का सिद्धांत लागू होने पर सेना व न्यायालयों सहित सरकारी और निजीक्षेत्र की सभी स्तर की, सभी प्रकार की नौकरियों, पौरोहित्य, डीलरशिप, सप्लाई, सड़क-भवन निर्माण इत्यादि के ठेको, पार्किंग, परिवहन, शिक्षण संस्थानों, विज्ञापन व एनजीओ को बंटने वाली राशि, ग्राम-पंचायत, शहरी निकाय, संसद-विधानसभा की सीटों; राज्जा एवं केन्द्र की कैबिनेट विभिन्न मंत्रालयों के कार्यालयों; विधान परिषद-राज्यसभा, राष्ट्रपति, राज्यपाल एवं प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री के कार्यालयों इत्यादि के कार्यवल में इत्यादि में सभी समुदायों को संख्यानुपात में वाजिब हिस्सेदारी मिले ने की सम्भावना रहेगी। इससे नौकरियों में आरक्षण को लेकर फिलहाल देश में जो आन्तरिक अशांति है, उसे अतीत का विषय बनते देर नहीं लगेगी!

नक्सलवाद के शमन के लिए जितनी आबादी उतना हक़ !

आर्थिक और सामाजिक विषमता की कोख से जिन समस्यायों को उत्पत्ति होती रहे है, उनमें से एक माओवाद /नक्सलवाद जैसी समस्सा भी है, जो भारत में गहराई से जड़ें जमा चुकी है. मोदी सरकार का दावा रहा है कि वह 31 मार्च, 2026 तक इससे पार पा लेगी. वह कितना सफल हुई कहना मुश्किल है. चूँकि इस समस्या की जड़ सामाजिक- आर्थिक विषमता है, जो शक्ति के स्रोतों के असमान बंटवारे से होती है, इसलिए इसका स्थाई समाधान अवसरों और शक्ति के स्रोतों का वाजिब बंटवारा है. इस दिशा में अबतक के प्रयास निहायत ही अपर्याप्त रहे हैं. राहुल गाँधी का जितनी आबादी उतना हक़ सिद्धांत लागू होने पर सभी सामाजिक समूहों के स्त्री और पुरुषों को उनके संख्यानुपात में, अर्थोपार्जन की समस्त गतिविधियों सहित सहित शक्ति के समस्सु स्रोतों में वाजिब हिस्सेदारी मिलने का ठोस मार्ग प्रशस्त होगा। ऐसा होने पर ही नक्सलवाद का धीरे-धीरे शमन हो जाएगा, ऐसी कल्पना द्विधामुक्त भाव से की जा सकती है!

सक्षम जातियों के अत्याचार से दलितों को बचाने के लिए जितनी आबादी उतना हक़ !

डॉ. आंबेडकर ने दलित उत्पीड़न के कारणों पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि वे उत्पीड़न का शिकार इसलिए होते हैं कि मानव समाज में जो तीन बलः धन, विद्या और जन-बल होते, अछूत इससे शून्य हैं. इनके पास जन तो है पर, एकता के अभाव में वह बल में तब्दील नहीं हो पाता और धन और विद्या बल की स्थिति तो बहुत शोचनीय है. उधर जो लोग दलितों पर तरह-तरह का जुल्म करने से जरा भी नहीं हिचकते, उनकी एक बड़ी मनोवैज्ञानिक दुर्बलता यह है कि वे सख्त का भक्त होते हैं। सख्खून का भक्त होते हैं इसलिए जो दलित धन और शिक्षा बल इत्यादि से सम्पन्न है उनकी मित्रता जीतने के लिए सदा तत्पर रहते हैं। वे उन्हीं दलितों पर अपना पराक्रम दिखाते हैं जो भूमिहीन, धनहीन और शिक्षाहीन हैं। राहुल गांधी का जितनी आबादी.. लागू होने पर दलित उद्योगपति, व्यापारी, ठेकेदार, अखबार व चैनलों के मालिक बनने लगेंगे। इससे वे शक्तिहीन से शक्तिमान समुदाय में तब्दील हो जाएंगे। तब जो समुदाय उन पर अत्याचार करते हैं, वे ही उनकी निकटता पाने के लिए तरह-तरह का उपाय ढूंढने लगेंगे। भाजपा राज के उदय पूर्व कांग्रेस की नीतियों से भारी संख्यक दलित बल- हीनता की समस्या से उबर रहे थे, जिस पर विराम लग गया है. शक्ति के समस्त स्रोतों में राहुल गांधी का जितनी आबादी उतना हक़ सिद्धांत लागू होने से वे तेजी से बल- हीनता की समस्या से उबरने लगेंगे

हिंदुत्ववादी नयी शिक्षा नीति की काट के लिए जितनी आबादी उतना हक़ !

मोदी सरकार की नई शिक्षा नीति की खामियों को लेकर बहुत कुछ लिखा गया है. लेकिन थोड़े से शब्दों में कहना हो यही कहा जायेगा कि चूँकि भाजपा धर्मशास्त्रों में अतिशय आस्था दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यकों और महिलाओं का शिक्षार्जन धर्म विरुद्ध मानती है, इसलिए NEP-20 में ऐसी व्यवस्था की गयी है, जिससे गुणवत्ती शिक्षा पर मनुवादी व्यवस्था के जन्मजात सुविधाभोगी का एकाधिकार हो जाए और शुद्रातिशुद्र व अन्य वंचित समुदाय अधिक से अधिक उतनी ही शिक्षा अर्जित कर सके, जिससे शुदत्व अर्थात गुलामों की भांति सेवा-कार्य बेहतर तरीके से संपन्न कर सकें. मोदी सरकार की खतरनाक शिक्षा नीति का एक ही इलाज है शिक्षा के तीनों स्तम्भों : तमाम शिक्षण संस्थानों में छात्रों के एडमिशन, टीचिंग स्टाफ की नियुक्ति और प्रशासनिक विभाग में राहुल गांधी का जितनी आबादी उतना हक़ का सिद्धांत लागू हो! ऐसा होने पर शिक्षार्जन और अध्यापन इत्यादि में सभी सामाजिक समूहों को उचित अवसर मिलेगा, जिससे कि मनुवादी व्यवस्था के वंचितों को एजुकेशन सेक्टर से दूर धकेलने की भाजपा सरकार की साजिश पर विराम लग जायेगा! 

विविधता में सार्थकता प्रदान करने के लिए: जितनी आबादी उतना हक़!

विविधता में एकता है, यह बात अग्रेज इतिहासकार विन्सेन्ट स्मिथ ने 150 साल पहले कही थी। उनकी उस बात का अन्धानुकरण करते हुए आज भी भारत के तमाम नेता, लेखक, कवि, प्रोफेसर तोते की तरह रहते हैं- भारत की विविधता (Diversity) में एकता (Unity) है.’ किन्तु भारत की विविधता में एकता है, इससे बड़ा झूठ कुछ हो ही नहीं सकता। भारत की भाषाई, सांस्कृतिक, धार्मिक, क्षेत्रीय, सामाजिक और लैंगिक इत्यादि तमाम विविधताओं पर गंभीरता से विचार करने पर विविधता में एकता नहीं; शत्रुता, शत्रुता और सिर्फ शत्रुता का बोलबाला नजर आता है। भाषा के आधार पर राज्यों का बंटवारा होने बावजूद भाषा को लेकर झगड़े होते रहते हैं। धार्मिक विविधता में शत्रुता की व्याप्ति है, इसलिए रह-रह कर दंगों का सैलाब उठते रहता है। क्षेत्रीय विविधता में कथित एकता के परखचे उस समय उड़ने लगते हैं, जब समय-समय पर राज ठाकरों हा उदय होता है। लैंगिक विविधता में भी सौहार्द का अभाव है, इसका पत्ता स्त्री-लेखन से मिलता है। लेकिन राष्ट्र की सबसे बड़ी जो चिन्ता है, वह है सामाजिक विविधता में शत्रुता की पुरअसर व्याप्ति। सामाजिक विविधता में व्याप्त शत्रुता ने भारत की असंख्य जातियों को शत्रुता से लबरेज अलग-अलग राष्ट्रों में बांट कर रख दिया है। इसके मूल में है वर्ण-व्यवस्था जो मुख्यतः शक्ति के स्रोतों (आर्थिक राजनीतिक शैक्षिक धार्मिक) और सामाजिक मर्यादा के वितरण की व्यवस्था रही है और जिसे लागू करने की दिशा में भाजपा साधु संतों, मनुवादी लेखक पत्रकारों, मीडिया और धन्नासेठों की फ़ौज लेकर आगे बढ़ रही है। इसमें विभिन्न समाजों के मध्य शक्ति के स्रोतों और मानवीय मयांदा का ऐसा असमान बंटवारा हुआ कि सदा के लिए शक्ति का असंतुलन पैदा हो गया, जिससे राष्ट्र आज तक उबर नहीं पाया है। शक्ति के इस असंतुलन ने विभिन्न समाजों के बीच चिरस्थाई तौर पर शत्रुता पैदा कर दिया है। इसलिए यहां सामाजिक समरसता और भ्रातृत्व दूरवीक्षण यंत्र से देखने की चीज बनकर रह गई है। शक्ति के सभी स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू होने पर सदियों से चला आ रहा असंतुलन दूर हो जाएगा। ऐसा होने पर ही विविधता में एकता होगी। ऐसा जब तक नहीं होता है, तब तक हमे दिल से नहीं, जबरन कहते रहना पड़ेगा हमारी विविधता में एकता है।

धार्मिक सेक्टर में असमानता के खात्मे के लिए जितनी आबादी उतना हक़!

ब्राह्मणशाही के खात्मे के लिए वर्षों से ढेरों बुद्धिजीवी संगठन प्रयासरत हैं, लेकिन इसका कुछ खास नहीं बिगड़ा है. डॉ. आंबेडकर ने अपनी बेहतरीन रचना ‘जाति का विनाश’ में इसके खात्मे का सबसे बढ़िया उपाय पौरोहित्य के पेशे का प्रजातंत्रीकरण बताया था. संभवतः उनकी बात का ही अनुसरण करते हुए तमिलनाडु, केरल, आन्ध्र प्रदेश, राजस्थान में मंदिरों की पुजारियों की नियुक्ति में दलित, आदिवासी, पिछड़ों और महिलाओं को आरक्षण दिया. आंबेडकर के शब्दों में धर्म भी शक्ति का एक स्रोत है जिसकी अहमियत आर्थिक शक्ति के समतुल्य है. यदि भविष्य में इसे शक्ति का स्रोत मानते हुए मंदिरों के पुजारियों और ट्रस्ट्री बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति इत्यादि में हिन्दू समाज के विविध सामाजिक समूहों के स्त्रियों और पुरुषों के लिए राहुल गांधी का जितनी आबादी उतना हक़ सिद्धांत लागू किया जाए तो धार्मिक सेक्टर में भी गैर- ब्राह्मणों को वाजिब हिस्सेदारी दिलाने का लक्ष्य साथ लिया जा सकता है.

सौ रोगों की एक दवा : राहुल गांधी का जितनी आबादी उतना हक़ सिद्धांत!

उपरोक्त तथ्यों पर दुराग्रह मुक्त भाव से यदि विचार किया जाय तो साफ़ नजर आएगा कि राहुल गाँधी का ‘जितनी अबादी उतना हक़’ सिद्धांत मनुवादी व्यवस्था के कारण सदियों से विषमता के पंक में डूबे भारत के सौ रोगों की एक दवा है. भारत में सामाजिक और आर्थिक विषमता-जन्ध्र शायद ही ऐसी ऐसी कोई समस्या हो, जिसका निर्भूल समाधान राहुल गांधी के भागीदारी सिद्धांत में न हो। तमाम क्षेत्रों सहित पॉवर स्ट्रक्चर में राहुल गांधी का ‘जितनी आबादी – उतना हक़ सिद्धांत से मोदी सरकार द्वारा निर्मित आन्तरिक साम्राज्य‌वाद के ध्वंस सहित भारत की आधी आबादी को 250 सालों के 50 वर्षों में पुरुषों की बराबरी पर लाने, लाइलाज बन चुके भ्रष्टाचार को न्यूनतम करने, सच्चर रिपोर्ट में उभरी मुस्लिम समुदाय की बदहाली की तस्वीर को खुशहाली में बदलने, हिन्दुत्सवादी शिक्षा नीति की मुकम्मल काट पैदा करने, संविधान के उद्देश्यों की पूर्ति करने, हिन्दुओं के अत्याचार से दलितों को बचाने, ब्राह्मणशाही के खात्मे सहित भारत की विविधता में एकता को सार्थकता प्रदान करने सहित अन्ध्र कई मोचों पर फ़तेहयाबी मिल सकती है! ऐसे में जोर गले से कहा जा सकता है कि समतामूलक भारत निर्माण के लिए राहुल गांधी के नए भागीदारी सिद्धांत के आसपास ऐसा कोई विचार ऐसा कोई एजेंडा नहीं जो विषमता के भीषणतम दलदल से भारत को निकाल कर समता की जमीन पर खड़ा कर सके !

(लेखक डाइवर्सिटी फॉर इक्वलिटी ट्रस्ट् के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.)

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