Jitu Munda News: आज की व्यवस्था पर तमाचा
Jitu Munda News: उड़ीसा के जीतू मुंडा की घटना आज की उस व्यवस्था पर करारा तमाचा है, जिस निजाम की नजरें दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और अभिवंचित वर्गों की दुर्दशा पर नहीं जा रही हो, फिर भी सिर्फ वोट के लिए भारत माता की जयकारे लगवा रहा हो।
अलखदेव प्रसाद ‘अचल’
न्यूज इंप्रेशन
Bihar (Aurangabad): उड़ीसा के जीतू मुंडा की घटना आज की उस व्यवस्था पर करारा तमाचा है, जिसमें हमारा निजाम मंचों से गला फाड़ फाड़कर यह कहता है कि देश की ग़रीब जनता के लिए हमारी सरकार वह सब कर रही है, जो आज तक की सरकार नहीं कर सकी थी। उस दिल दहला देने वाली घटना से इस शासन व्यवस्था पर थूक देने का मन करता है। जहां का निजाम देश को विश्व गुरु बनाने का सब्जबाग दिखाता हो, जबकि देश के हालात बद से बदतर होते चले रहे हों, फिर भी हमारे निजाम को कोई फिक्र नहीं सता रहा हो कि हमारे देश की जनता किन-किन समस्याओं से जूझ रही है। खासकर जिस निजाम की नजरें दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और अभिवंचित वर्गों की दुर्दशा पर नहीं जा रही हो, फिर भी सिर्फ वोट के लिए भारत माता की जयकारे लगवा रहा हो।अपना अधिक से अधिक चुनाव प्रचार में लगा रहा हो और देश की जनता त्राहिमाम कर रही हो।इससे हास्यास्पद और क्या हो सकता है? यह वही हमारा देश है, जहां विजय माल्या, नीरव मोदी जैसे न जाने कितने फ्रॉडो ने सरकार को विश्वास में लेकर बैंक को अरबों खरबों रुपए का चूना लगाकर विदेशों में ऐश कर रहे हैं। उन पर न बैंक ही कार्रवाई कर पा रहा है और न सरकार ही कार्रवाई कर पा रही है। ऐसा लग रहा कि उन लोगों के लिए कोई अलग नियम है। जो साबित करता है कि उन लोगों ने जो भी किया वह सिर्फ बैंकों के अधिकारियों और सरकार को विश्वास में लेकर ही नहीं किया, बल्कि कुछ हिस्सेदारी इन लोगों को भी दी होगी। वैसे लोगों के लिए पता नहीं सारे नियम कहां ताख पर चले जाते हैं? वैसे लोगों के लिए बड़े-बड़े न्यायाधीशों के मुंह भी बंद हो जाते हैं। आंखों पर काली पट्टी लग जाती है। और इसका दुष्परिणाम देश की भोली भाली जनता को भुगतना पड़ रहा है। फिर भी हमारा ढपोरशंखी निजाम देश को विश्व गुरु बनाने में लगा है। चुनाव में तो ऐसा लंबा-लंबा फेंकता है, मानो वहां धरती पर ही स्वर्ग उतार देना चाहता है। जिस राज्य में उसकी पार्टी की सरकार नहीं है, वहां उसे खामियां-ही- खामियां दिखाई पड़ती हैं, पर जिन राज्यों में उसकी अपनी पार्टी की सरकार है, वहां की खामियां बिल्कुल ही नहीं दिखाई पड़ रही हैं। वहां सिर्फ सुराज- ही-सुराज नजर आ रहा है। इससे हास्यास्पद और क्या सकता है?
पांच राज्यों में फिलहाल चुनाव चल रहा था। तो हमारा निजाम यह फेंकने में मशगूल रहा कि किसी तरह हमारी पार्टी की सरकार बनवा दो। फिर देखो, इस राज्य की तस्वीर कैसे बदल जाएगी। यहां के लोग किस तरह स्वर्ग की अनुभूति करने लगेंगे। हमारा निजाम उन राज्यों में कहीं झालमुड़ी खाकर जनता को प्रभावित करने का स्वांग रचा, तो कहीं चाय के बागान में चाय की पत्तियां तोड़ने का स्वांग रचा। चर्चा में बने रहने के लिए कहीं जर्सी पहनकर फुटबॉल खेलने का स्वांग रचा। देश की जनता किस दशा में है, उसे पूरी तरह नजरअंदाज करता रहा। उसी दौरान उसी की पार्टी के शासनकाल में उड़ीसा के जीतू मुंडा की बहन कलरा मुंडा की मौत तीन महीने पहले हो गयी थी। जो विधवा थी। उसके बेटे की भी असमय मौत हो गयी थी। उस जीतू की बहन की मौत हो गयी थी,जो दाने-दाने के बिना मोहताज था। एक दिन जब बहन के बक्से को खोला तो उसमें बैंक का एक पास बुक देखा। तब उसे लगा शायद बहन ने अपनी गाड़ी कमाई में से काट छांट कर कुछ जमा किया होगा। वह बैंक गया तो पता चला कि खाते में 19300 रुपए हैं। पर बैंक कर्मियों ने बताया कि तुझे नहीं मिलेगा। जबकि जीतू मुंडा ने कहा कि अब सिर्फ मैं ही हूं। जीतू मुंडा को उतनी ही राशि बहुत बड़ी लग रही थी।उसे लग रहा था कि इतने रुपए में हमारी कई समस्याओं के समाधान हो जायेंगे। अपनी आर्थिक स्थिति से निजात पाने की चिंता सताने लगती है। जीतू ऐसे गरीब परिवार से का रहता है। आर्थिक स्थिति बदहाल होने की वजह से न वह खुद पढ़ पाता है न घर परिवार में किसी को पढ़ा पाता है। वह तो सिर्फ कमाने और खाने का हाल जानता है। उसे यह भी पता नहीं रहता है कि बैंक में जो पैसे जमा करते हैं, उसमें नॉमिनी क्या होता है? किसी परिवार के मरने के बाद मृत्यु प्रमाण पत्र क्या होता है? उसे कौन बनाता है?
जीतू मुंडा सीधा उस बैंक में पहुंच जाता है, जहां उसकी बहन ने पैसा जमा किया था। जीतू जब पैसे निकालने की बात करता है, तो बैंक कर्मी सीधा जवाब देते हैं कि जिसके नाम से पैसा जमा है, उसको आना ही होगा। जब जीतू कहता है कि वह तो मर गई, फिर कैसे आएगी? तो बैंक कर्मी का जवाब होता है कि फिर जो नॉमिनी में बेटा है, उसे आना होगा। जब जीतू मुंडा यह कहता है कि वह तो बहन से भी पहले मर गया था। तो बैंक कर्मी कहता है कि मृत्यु प्रमाण पत्र देना होगा, जिससे पता चले कि खाता धारक सचमुच में मर गयी है। इसके सिवा कोई उपाय नहीं है। जीतू मुंडा को समझ में नहीं आया कि मृत्यु प्रमाण पत्र कहां से लाऊं? जीतू मुंडा ने गिड़गिड़ाते हुए यह जरूर कहा कि हुजूर,आप लोग किसी से पूछ लीजिए कि वह मर गयी है या नहीं? मुझको छोड़कर उसका और कोई है या नहीं?मैं उसका भाई हूं या नहीं ?आप यह भी पूछ लीजिए कि वह हमारी बहन थी या नहीं? वह मेरे घर में रह रही थी या नहीं? उसका क्रिया कर्म हमने किया या नहीं? पर बैंक कर्मियों को उसके तर्क से कोई लेना देना नहीं था। उन्हें तो नियमानुसार सिर्फ मरने का प्रमाण चाहिए था। जिसके बारे में जीतू पूरी तरह से अनभिज्ञ रहता है। अनपढ़ जीतू मुंडा को कुछ भी समझ में नहीं आता है, लेकिन उसके लिए 19300 रुपए बहुत बड़ी रकम लग रही होती है। वह सोचता है कि इतने रुपए आ जाएंगे, तो हमारी कई समस्याओं का समाधान हो जाएगा। मुझे कई परेशानियों से राहत मिल जाएगी। परंतु बैंक कर्मी जीतू मुंडा की एक नहीं सुनी।
अंत में जब जीतू मुंडा को कुछ भी समझ में नहीं आया,तो उसने 27 अप्रैल को अपनी बहन की लाश को कब्र से उखाड़कर बोरी में कस कर कांधे पर टांगे क़रीब 3 किलोमीटर तक पैदल चलता हुआ बैंक पहुंचता है। उस दौरान रास्ते में न जाने हजारों लोगों ने उस दर्दनाक और खौफनाक तस्वीर को देखा होगा। उस तस्वीर को बहुत लोगों ने सोशल मीडिया पर वायरल भी किया, परंतु न बैंक कर्मियों के कानों पर जूं रेंग सका, न शासन और प्रशासन के कानों पर जून रेंग सका। जीतू मुंडा बैंक के गेट पर अपनी बहन की सड़ी- गली लाश रख देता है और कहता है कि हुजूर जिसका पैसा था, वह आपके सामने है। अब तो इसके जमा रुपए दे दीजिए। पर बैंक कर्मी अभी भी अपने नियम पर अड़े थे और बोल रहे थे कि इससे भी तुम्हारे पैसे नहीं निकलेंगे। अर्थात चाहे सरकार के गाल पर तमाचा मारो या बैंक कर्मियों के गाल पर तमाचा मारो, परंतु इस व्यवस्था में तुम्हें कीड़े-मकोड़े की तरह रेंगना होगा तो रेंगना होगा।यह व्यवस्था तुम जैसे गरीबों के लिए नहीं है।क्योंकि यह देश अभी विश्व गुरु बनने के कगार पर पहुंच चुका है। शर्मसार कर देने वाली यह घटना न जाने एक साथ कितने तंत्रों पर तमाचा मारी होगी, कहना मुश्किल है, परंतु रामराज्य का स्वप्न दिखाने वाली हमारी सरकार पर इसका कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है।

दर्दनाक दृश्य।।
जी धन्यवाद।