Congress News: राहुल गांधी-कांशीराम के भागीदारी दर्शन को व्यापक आयाम देने वाले चैम्पियन नेता!
Congress News: 1885 में स्थापित कांग्रेस के सुदीर्घ इतिहास में दूरगामी परिणाम के लिहाज से 21वीं सदी में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अधिवेशन 24 से 26 फरवरी तक रायपुर में आयोजित हुआ, जिसकी तुलना 20 वीं सदी के 1931 के करांची अधिवेशन की जा सकती है,
एचएल दुसाध
Delhi: 19 वीं शताब्दी के शेष में : 1885 में स्थापित कांग्रेस के सुदीर्घ इतिहास में दूरगामी परिणाम के लिहाज से 21वीं सदी में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अधिवेशन 24 से 26 फरवरी तक रायपुर में आयोजित हुआ, जिसकी तुलना 20 वीं सदी के 1931 के करांची अधिवेशन की जा सकती है, जहां से ऐसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित हुए थे, जो भारत की शक्ल बदलने वाले साबित हुए थे. मार्च 1931 में सरदार बल्लभ भाई पटेल की अध्यक्षता में आयोजित कांग्रेस के करांची अधिवेशन में ऐतिहासिक ‘ मौलिक अधिकार और आर्थिक कार्यक्रम’ से जुड़े प्रस्ताव पारित हुए.यहाँ से पारित प्रस्तावों ने पूर्ण स्वराज को दोहराया और पहली बार आम जनता के लिए के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता , समानता , वोट का अधिकार , संघ बनाने का अधिकार , जाति /धर्म/ लिंग के आधार पर भेदभाव न होना और कानून के समक्ष समानता , महिलाओं के लिए समान अधिकार , मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा और अल्पसंख्यकों की भाषा व संस्कृति का संरक्षण की रुपरेखा तैयार की. यहीं से प्रमुख उद्योगों, खनिजों , रेलवे और परिवहन पर राज्य का स्वामित्व , लगान व भूराजस्व में कटौती और किसानों को कर्ज से राहत जैसे आर्थिक प्रस्ताव पास हुए. ये प्रस्ताव आजादी के लिए संघर्षरत हिन्दुस्तानी अवाम के लिए वादे थे, जिन्हें आजाद भारत में लागू करने का वचन कांग्रेस ने दिया था. और अंग्रेजों से आजादी के बाद इन्हीं प्रस्तावों को अमली रूप से देने के लिए पंडित नेहरु के नेतृत्व में कांग्रेस आगे बढ़ी और कुछ ही दशकों देश की शक्ल बदल कर रख दी. किन्तु आजादी के समय किये गए वादों को पूरा करने के क्रम में जिस कांग्रेस ने देश की शक्ल बदल कर रख दी , वह बीसवीं सदी के शेष दशक में उठी सामाजिक न्याय की आंधी में सम्यक निर्णय न ले सकी! फलतः वह केन्द्रीय सत्ता से दूर छिटक गई! एक अन्तराल बाद नई सदी सदी में सामाजिक न्याय की अपनी खोई जमीन हासिल करने के लिए के कांग्रेस नेतृत्व ने 2023 में मल्लिकार्जुन खड्गे के नेतृत्व में 24-26 फरवरी तक चले रायपुर अधिवेशन में साहसिक कदम उठाने का निर्णय लिया! यूँ तो कांग्रेस ने छतीसगढ़ के रायपुर में 58 बिन्दुओं पर काम करने का संकल्प लिया, किन्तु विस्मय सृष्टि किये उसके सामाजिक न्याय से जुड़े प्रस्ताव. सामाजिक न्याय से जुड़े उसके प्रस्ताव इतने अप्रत्याशित थे कि कोई सोच नहीं सकता था कि कांग्रेस सामाजिक न्याय से जुड़े ऐसे प्रस्ताव भी पारित कर सकती है. रायपुर से पास हुए प्रस्तावों ने बड़े-बड़े स्थापित सामाजिक न्यायवादी दलों को पीछ धकेल कर कांग्रेस को सबसे आगे कर दिया था!
राहुल गांधी की ऐतिहासिक ‘भारत जोड़ों यात्रा’ के समापन के कुछ अंतराल बाद लोकसभा चुनाव 2024 की पृष्ठभूमि में रायपुर में अयोजित अपने 85वें अधिवेशन ने पार्टी ने पहली बार सामाजिक न्याय का पिटारा खोला था, जिसे देखकर राजनीति के पंडित हक्के- बक्के रह गये थे. इसी रायपुर अधिवेशन मे कांग्रेस नें खुद में आमूल परिवर्तन करते हुए स्थायी तौर पर खुद को सामाजिक न्यायवादी दल के रूप में तब्दील करने का उद्योग लिया था. इसके तहत उसने यहां से सामाजिक न्याय से जुड़े जो प्रस्ताव पारित किए थे, उनमें से एक था उच्च न्यायपालिका में एससी,एसटी,ओबीसी के लिए आरक्षण का प्रस्ताव. इस संबंध में कहा गया था,’ यह सुनिश्चित करने के लिए कि न्यायपालिका भारत की सामाजिक विविधता का प्रतिबिंब है, कांग्रेस पार्टी उच्च न्यायपालिका में एससी-एसटी-ओबीसी के लिए आरक्षण पर विचार करेगी. इसी भावना से भारतीय न्यायायिक सेवा आयोग बनाने के लिए सुधार किए जाएंगे!‘ यहीं इन वर्गों के लिए आम बजट का हिस्सा निर्धारित करने और उनमें गरीब तबकों को ईडब्ल्यूएस कोटे मे शामिल करने का वादा किया गया था. रायपुर में ही महिला आरक्षण पर यू टर्न लेते हुए कांग्रेस ने कोटे मे कोटे का समर्थन किया गया था. यह यू टर्न विस्मित करने वाला था क्योंकि 2010 में कांग्रेस ने यूपीए सरकार में कोटा के भीतर कोटा लाने के सहयोगी दलों की मांग को खारिज कर दिया था. रायपुर अधिवेशन में ही कांग्रेस ने दशकीय जनगणना के साथ-साथ एक सामाजिक-आर्थिक जनगणना कराने की प्रतिबद्धता जाहिर की थी. जातिगत जनगणना में गैर- अधिसूचित और खानाबदोश जनजातियों की भी जनगणना कराने का प्रस्ताव भी पारित हुआ था. रायपुर में ही एससी,एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्य समुदायों के छात्रों के साथ शैक्षणिक संस्थानों में होने वाले भेदभाव को दूर करने तथा उनके शिक्षा सम्मान के अधिकार की रक्षा और सुरक्षा के लिए ‘ रोहित वेमुला अधिनियम’ बनाने का प्रस्ताव पास किया गया था. रायपुर से ही प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय विकास परिषद के तर्ज पर सामाजिक न्याय परिषद गठित करने का प्रस्ताव पारित हुआ था . वहीं एक बेहद अहम प्रस्ताव संगठन में दलित बहुजनों को भागीदारी देने से जुड़ा भी पास हुआ था, जिसमें कहा गया था कि पार्टी ब्लॉक , जिला , राज्य से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर वर्किंग कमिटी में 50% स्थान दलित, आदिवासी , पिछड़े , अल्पसंख्यक और महिलाओं के लिए सुनिश्चित करेगी. इस किस्म के अन्य कई प्रस्ताव भी रायपुर अधिवेशन में पास हुए थे.
बहरहाल रायपुर अधिवेशन कांग्रेस के इतिहास में एक प्रस्थान बिन्दु था, जहाँ से पार्टी ने सामाजिक न्याय की राह पर चलने की प्रतिबद्धता जाहिर करने के साथ ही खुद को एक बहुजनवादी दल में तब्दील करने का संकेत किया था. तब वहाँ पारित सामाजिक न्याय से जुड़े प्रस्तावों को लेकर तमाम राजनीतिक विश्लेषकों ने ही संदेह जाहिर करते हुए प्राय: एक स्वर में खुलकर कहा था कि जिस पार्टी के पण्डित नेहरू , इंदिरा गांधी जैसे नेता काका कालेलकर आयोग की सिफारिशें लागू करने से पीछे हट गये थे ; जिस पार्टी के राजीव गांधी संसद में पानी पी – पी कर मंडल की सिफारिशों के खिलाफ घंटों बोले थे, क्या वह पार्टी रायपुर अधिवेशन में पारित सामाजिक न्याय से जुड़े प्रस्तावों को आगे बढ़ा सकती है? आज तीन साल बाद रायपुर अधिवेशन का सिंहावलोकन करने पर स्पष्ट नजर आता है कि पार्टी उन्हें भ्रांत साबित करने में सफल रही और जहाँ तक सामाजिक न्याय के पथ पर यात्रा का प्रश्न है, पार्टी का सफ़र शानदार रहा. यदि करांची अधिवेशन में पारित प्रस्तावों ने कालांतर में देश की शक्ल बदल कर रख दी तो रायपुर से पास हुए सामाजिक न्याय से जुड़े प्रस्ताव आने वाले दिनों में उस समतामूलक भारत निर्माण का सपना पूरा कर देंगे, जो सपना वर्षों पहले गांधी-आंबेडकर – नेहरु इत्यादि राष्ट्र निर्माताओं ने देखा था, इसके प्रति आशावादी हुआ जा सकता है!
रायपुर से निकले प्रस्तावों को आधार बनाकर कांग्रेस ने मई , 2023 मे अनुष्ठित कर्नाटक विधानसभा चुनाव को सामाजिक न्याय पर केंद्रित किया. चूंकि चुनाव सामाजिक न्याय पर केंद्रित होने से भाजपा हार वरण करने के लिए विवश रहती है, इसलिए भाजपा हेट पॉलिटिक्स को हिमालय सरीखी ऊंचाई देकर भी हार गई. उसी कर्नाटक चुनाव में राहुल गांधी ने कोलार में ‘ जितनी जिसकी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी उछालकर दुनिया को न सिर्फ हैरान दिया, बल्कि दीर्घ काल के लिए ‘जितनी आबादी- उतना हक’ को अपनी राजनीति का मूलमंत्र भी बना लिया. कर्नाटक में जिस शिद्दत के साथ चुनाव को सामाजिक न्याय पर केंद्रित करते हुए राहुल गांधी ने ऐतिहासिक सफलता अर्जित की, उसे देखते हुए दलित बुद्धिजीवियों ने उन्हे सामाजिक न्याय के नए आइकॉन के रूप में वरण किया था .
कर्नाटक में रायपुर से निकले सामाजिक न्याय का एजेंडा कारगर होने के बाद उसे नवंबर, 2023 में आयोजित 5 राज्यों- राजस्थान , मध्य प्रदेश, छतीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम – के चुनावों में भी आजमाया. लेकिन 3 दिसंबर को जब चुनाव परिणाम आया देखा गया कि कांग्रेस तेलंगाना को छोड़कार बाकी राज्यों में भारी संभावना जगाकर भी पार्टी कर्नाटक का इतिहास दोहराने में विफल रही. राजस्थान, मध्य प्रदेश , छतीसगढ़ में तमाम विश्लेषकों ने पार्टी के जीत की भविष्यवाणी कर दी थी ,पर भीतरघात के चलते पार्टी की नैया किनारे जाकर डूब गई, ऐसा अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों का मानना रहा. किन्तु, राहुल गांधी इससे हताश होने के बजाय रायपुर से निकले विचार को आगे बढ़ाने के लिए दूने उत्साह के साथ 14 जनवरी,2024 से फिर भारत जोड़ों यात्रा पर निकल पड़े पर , इस बार भारत जोड़ों के साथ ‘न्याय यात्रा’ जोड़ लिए. 14 जनवरी को मणिपुर से शुरू होकर 16 मार्च को मुंबई समाप्त हुई 63 दिवसीय ‘भारत जोड़ों न्याय यात्रा’ में रायपुर से निकले सामाजिक न्याय के बुनियादी विचार को विस्तार देते हुए पाँच न्याय तक प्रसारित कर दिया गया. भारत जोड़ों न्याय यात्रा के दोरान राहुल गांधी ने आर्थिक और सामाजिक अन्याय को सबसे बड़ी समस्या बताते हुए संदेश दिया था कि सामाजिक और आर्थिक न्याय लागू करके ही भारत को सुंदर बनाया जा सकता है. इस यात्रा के दौरान बार- बार उन्होंने यह सवाल उछाला था कि कितनी प्राइवेट कंपनियों – अस्पतालों – अखबारों इत्यादि के मालिक दलित, आदिवासी , पिछड़े हैं!ऐसा सवाल भारत के इतिहास में किसी ने भी नहीं उठाया. कहने में कोई द्विधा नहीं कि राहुल गांधी ने फरवरी , 2023 मैं रायपुर से निकले सामाजिक न्याय के विचार को दो महीने से अधिक समय तक चली ‘ भारत जोड़ों न्याय यात्रा’ में प्रत्याशा से अधिक ऊँचाई दे दिया था.भारत जोड़ों न्याय यात्रा में विकसित पांच न्याय से जुड़ा एजेंडा पाँच अप्रैल, 2024 को न्याय पत्र के रूप में जारी कांग्रेस घोषणापत्र के रूप में सामने आया और देखते ही देखते छा गया!
बहरहाल कांग्रेस ने बड़ी तेजी से न सिर्फ रायपुर से पारित सामाजिक न्याय से जुड़े प्रस्तावों को अभूतपूर्व विस्तार दिया, बल्कि सामाजिक न्याय के एजेंडे को जन-जन तक पहुचाने के लिए सामाजिक न्याय की विचारधारा से जुड़े प्रो कांचा इलैया, प्रो. रतनलाल , एच. एल. दुसाध, फ्रैंक हुजूर , डॉ. जगदीश प्रसाद , अली अनवर, प्रो. रविकांत, अमर आज़ाद पासवान जैसे ढेरों लोगों को जोड़ा. इस दिशा में कांग्रेस ने पहले डॉ. अनिल जयहिंद और बाद में राजेन्द्र पाल गौतम को क्रमशः एआईसीसी के ओबीसी और एससी विभाग का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का निर्णय लिया, जो उसका मास्टर स्ट्रोक साबित हुआ! आज इन दोनों के प्रयासों से पार्टी की शक्ल सवर्णवादी से बहुजनवादी दल की हो गई है. राहुल गांधी के मिशन मैन के रूप में विख्यात डॉ . अनिल जयहिंद ने देश के दर्जनों प्रमुख शहरों में संविधान सम्मलेन कराकर राहुल गांधी के सामाजिक न्यायवादी एजेंडे को जन-जन तक पहुँचाने का ऐतिहासिक काम किया.यही नहीं इन दोनों विभागों द्वारा कांग्रेस की बहुजनपरस्त नीतियों को देश के चप्पे-चप्पे पर पहुंचाने के लिए सामाजिक न्याय के लिए संघर्षरत नेताओं और बुद्धिजीवियों के साथ मिलकर जगह-जगह बहुजन महापुरुषों , सामाजिक सुधारकों और दलित बहुजन अधिकारों से सम्बंधित कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं. इसी क्रम में आगामी 13 मार्च को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (ओबीसी, एससी विभाग) उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के साथ मिलकर लखनऊ के जुपिटर हॉल , इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान , गोमती नगर में ‘सामाजिक परिवर्तन दिवस’ के रूप में मान्यवर कांशीराम साहब की 92 वीं जयंती मनाने जा रही है, जिसमें मुख्य अतिथि होंगे राहुल गांधी! इस आयोजन को लेकर बसपा समर्थकों में बौखलाहट पैदा हो गई है और वे खासा आक्रोश में है. इस आयोजन को लेकर उनकी नकारात्मक टिप्पणियों से सोशल मीडिया भर गई है . बहरहाल 13 मार्च को आयोजित होने वाले कांशीराम जयंती समारोह को ध्यान में रखते हुए जो बसपाई कांग्रेस और राहुल गांधी के प्रति आक्रोश जताने में जुट गए हैं, वे लोग एक बार कांशीराम के भागीदारी दर्शन और बसपा सुप्रीमो मायावती जी की भूमिका का सिंहावलोकन कर लें!
बीसवीं सदी के शेष कुछ दशकों में भारतीय राजनीति में जलजला पैदा करने वाले कांशीराम आंबेडकर के बाद दलितों के सबसे बड़े नेता के रूप में जगह बनाने के क्रम में उनके पढे-लिखे नौकरीशुदा तबकों को ‘पे बैक टू द सोसाइटी’ के मंत्र से दीक्षित करने के साथ हजारों साल के दबे – कुचले लोगों में शासक बनने की जो महत्वाकांक्षा पैदा किया, वह भारतीय राजनीति की सबसे हैरतअंगेज घटनाओं में एक है. लेकिन वह बहुजनों में शासक बनने की भावना पैदा करके ही अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर लिए! शासन- सूत्र हाथ में लेने के बाद जरूरी होता है एक आर्थिक नीति, जिसकी जोर से वंचितों को शक्ति के स्रोतों में उनका प्राप्य दिलाया जा सके. वैसे तो मुख्यधारा के तमाम बुद्धिजीवी ही एक स्वर में कहते रहे है कि कांशीराम एक कुशल संगठनकर्ता के गुणों से तो समृद्ध रहे, पर, उनकी कोई आर्थिक सोच नहीं रही. लेकिन उनका एक आर्थिक दर्शन था जो ‘जिसकी जितनी संख्या भारी- उसकी उतनी भागीदारी’ के रूप मे सामने आया. उनके इस भागीदारी दर्शन ने पूरे जमाने को प्रभावित किया और ढेरों राजनीतिक दलों ने इसका लाभ उठाने का प्रयास किया, किन्तु खुद उनकी उत्तराधिकारी मायावती ही इसका भरपूर उपयोग करने में चूक गईं! अगर उन्होनें साहब कांशीराम के भागीदारी दर्शन को शक्ति के समस्त स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक – में हिस्सेदारी तक प्रसारित कर बहुजनों को उसमें हिस्सा दिलाने तक अपनी गतिविधियां प्रसारित करतीं तो बसपा केंद्र की सत्ता पर काबिज होती और वह कब की पीएम बन गई होतीं ! किन्तु उन्होंने साहब के भागीदारी दर्शन को सिर्फ सत्ता में भागीदारी तक सीमित रखकर विभिन्न जातीय समूहों को सांसद-विधायक और मंत्री बनाने तक सीमित रखा और बीसवी सदी तक आते-आते उन्होंने सतीश मिश्र के साथ मिलकर बसपा संस्थापक के नारे को ही उलट दिया और घोषित किया ,’ जिसकी जितनी तैयारी- उसकी उतनी हिस्सेदारी!‘ जिसकी जितनी तैयारी की थ्योरी से बसपा में भारत के जन्मजात शोषकों : सवर्णों की भीड़ लग गई और कांशीराम का नारा हो गया निष्प्रभावी! हाँ इतना जरूर हुआ कि मायावती ने जिस तरह कांशीराम के भागीदारी नारे को सत्ता में भागीदारी तक सीमित किया, उसका प्रयोग दूसरे दल भी करने लगे. इस मामले में चैंपियन बने नरेंद्र मोदी. मोदी जहाँ एक और बहुजनों को गुलामों की स्थिति में पहुचाने के सरकारी उपक्रमों के अन्धाधुन बिक्री में जुटे रहे तो दूसरी ओर सत्ता में भागीदारी देकर बहुजन नेताओं को अपन्रे पाले में करते रहे और उनके सौजन्य से सत्ता में भागीदारी पाए बहुजन नेता,उनकी बहुजन विरोधी नीतियों को लागू करवाने में सहायक बनते रहे.आज कांशीराम के नारे को महज सत्ता में भागीदारी तक सिमित रखने के मामले में मोदी ने मायावती को भी बौना बना दिया है. इस नारे के जोर से उन्होंने तमाम बहुजन राजनीतिक प्रतिभाओं को भाजपा से जोड़कर विश्व की सबसे खतरनाक पार्टी को अप्रतिरोध्य बना दिया है!
कांशीराम ने भागीदारी का जो दर्शन दिया ,वह सिर्फ सत्ता में भागीदारी तक सीमित न होकर शक्ति के समस्त स्रोतों तक के लिए था, जिसके तहत विविधतामय भारत के विविध सामाजिक समूहों को राजसत्ता की सभी संस्थाओं सहित अर्थोपार्जन की समस्त गतिविधियों(नौकरी सहित सप्लाई,डीलरशिप, ठेकेदारी, फिल्म-मीडिया, पार्किंग-परिवहन इत्यादि), शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों के प्रवेश और टीचिंग स्टाफ की नियुक्ति इत्यादि सहित पुजारियों की नियुक्ति तक में प्रसारित करना था.लेकिन दलित बुद्धिजीवियों द्वारा बार-बार अपील किए जाने के बावजूद मायावती इसमें चूक गईं और भागीदारी के मोर्चे पर बड़ी शून्यता छोड़ गईं.आज उनके द्वारा छोड़े गए शून्यता को भरने के लिए ही ‘जितनी आबादी- उतना हक’ के नारे के साथ मैदान में राहुल गांधी कूदे हैं और उसे इतना व्यापक विस्तार दे दिया है, जिसकी कल्पना शायद खुद मान्यवर कांशीराम भी नहीं किये होंगे . रायपुर अधिवेशन के कुछ माह बाद से ही कांशीराम के भागीदारी दर्शन को ‘जितनी आबादी – उतना हक’ के रूप में उद्घोष करने वाले राहुल गांधी ने न्याय पत्र के नाम से लोकसभा 2024 मे जारी कांग्रेस के घोषणापत्र में भागीदारी का मुकम्मल नक्शा पेश कर दिया. कांग्रेस के जिस घोषणापत्र ने 2024 के लोकसभा चुनाव की दिशा बदल कर रख दिया, उसका ठीक से अध्ययन करने पर स्पष्ट रूप में दिखेगा कि वह कांशीराम के भागीदारी दर्शन का शक्ति के समस्त स्रोतों तक विस्तार था. चुनाव के पहले से जिस तेवर से राहुल गांधी सवाल उठाते रहे कि दलित, आदिवासी और ओबीसी की आबादी 73% है और 73% वाले कितनी प्राइवेट कंपनियों, यूनिवर्सिटीज, मीडिया, अखबारों ,अस्पतालों इत्यादि के मालिक और मैनेजर हैं? ,राहुल गांधी का वह तेवर कांशीराम से उधार लिया हुआ था , जिसे मायावती कबकी खो चुकी हैं ! कांशीराम से प्रेरित होकर कुछ दलित बुद्धिजीवी वर्षों से शक्ति के स्रोतों में डाइवर्सिटी लागू करवाने की बात कर रहे थे ,राहुल गांधी ने उसे भी सम्मान दे दिया . इस क्रम में उन्होंने आरक्षण का 50 % दायरा तोड़ने का एजेंडे देने के साथ अपने घोषणापत्र मे एससी-एसटी समुदायों से संबंधित ठेकेदारों को ज्यादा सार्वजनिक कान्ट्रैक्ट देने के लिए पब्लिक खरीद पॉलिसी का दायरा बढ़ाने का वादा किया. ओबीसी, एससी,एसटी छात्रों के लिए स्कालरशिप की धनराशि दो गुना करने , हायर एजुकेशन के लिए एससी और एसटी के छात्रों को विदेश मे पढ़ने में सहायता देने और पीएचडी करने के लिए स्कालरशिप की मात्रा दो गुना करने की जो बात कांग्रेस के घोषणापत्र में आई थी , उसके भी पीछे दलित बुद्धिजीवियों को सम्मान देने की भावना क्रियाशील थी. डाइवर्सिटीवादी बुद्धिजीवियों के सुझाव को सम्मान देते हुए ही कांग्रेस के घोषणापत्र में राहुल गांधी ने डाइवर्सिटी आयोग गठित करने का वादा किया था जो सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में रोजगार और शिक्षा के संबंध में विविधता की स्थिति का आंकलन करने के साथ विविधता को बढ़ावा देगा. कुल मिलाकर राहुल गांधी ने जिस तरह पिछले कुछ सालों से कांशीराम के भागीदारी दर्शन को सत्ता में भागीदारी से आगे बढ़ाकर शक्ति के समस्त स्रोतों तक प्रसारित किया है, उस कारण ही लोग उन्हे दूसरा कांशीराम कहने लगें ! अब दूसरे कांशीराम का मुकाबला करने के लिए मायावती के सामने एक ही रास्ता बचा है, वह है सेना व न्यायालयों सहित सरकारी और निजी क्षेत्र की सभी प्रकार की नौकरियों ,पुजारियों की नियुक्ति; सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा की जाने वाली खरीदारी, सड़क-भवन निर्माण इत्यादि के ठेकों,पार्किंग-परिवहन; प्रिन्ट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सभी प्रभागों; विज्ञापन निधि की बँटने वाली धनराशि सहित शक्ति के समस्त स्रोतों में बसपा संस्थापक साहेब कांशीराम के भागीदार दर्शन को लागू करने की घोषणा करें! सिर्फ घोषणा ही नहीं इसके लिए फील्ड में उतर एवं सघन अभियान चला कर ही वह राहुल गांधी का मुकाबला कर सकती हैं, नहीं तो उनको मुट्ठी भर सजातियों के वोट पर ही निर्भर रहने के लिए अभिशप्त रहना होगा!लोग कह रहे हैं कि कांग्रेस का 13 मार्च का जयंती प्रोग्राम 2027 के यूपी विधान सभा चुनाव को दृष्टिगत रखकर आयोजित हो रहा है , जो शायद सही है. अब बहन जी यदि 2027 में कांग्रेस और राहुल गांधी का मुकाबला करना चाहती हैं तो उन्हें 25 लाख के बजाय 25 करोड़ तक के सरकारी ठेकों में आरक्षण देने की घोषणा करनी होगी, क्योंकि कांग्रेस बिहार में ऐसी घोषणा कर चुकी . कांग्रेस के मुकाबले के लिए उन्हें 2027 में सेना, न्यायपालिका इत्यादि सहित समस्त पॉवर स्ट्रक्चर में कांशीराम का भागीदारी दर्शन लागू करना होगा. ऐसे में बसपा समर्थकों को चाहिए कि कांग्रेस और राहुल गांधी के खिलाफ नकारात्मक टिप्पणियों से सोशल मीडिया को भरने के बजाय मान्यवर के भागीदारी दर्शन को उलटने वालीं अपने बहन जी पर शक्ति के स्रोतों में हिस्सेदारी दिलाने के मामले में राहुल गांधी से मुकाबला करने का दबाव बनाएं!
(लेखक अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (ओबीसी विभाग) की आइडियोलॉजिकल एडवाइजरी कमेटी के सदस्य हैं
