Holi News: जनश्रुतियों में होलिका 

 Holi News: कुछ शोध परक कार्य करने वाले विद्वानों का मानना है कि प्रह्लाद निश्चित रूप से उदंड और लंपट प्रवृत्ति का लड़का रहा होगा। जिसकी संगति नशाखोरों के साथ रही होगी। जिन लोगों ने प्रह्लाद को नशे में लाकर होलिका के साथ गलत किया गया होगा

 

अलखदेव प्रसाद ‘अचला’

न्यूज इंप्रेशन 

Bihar : जनश्रुतियों के अनुसार अगर हम होलिका और होलिका दहन पर विचार करते हैं, तो कई तथ्य उभरकर सामने आते हैं। जिसे लोगों को समझना बहुत जरूरी है। खासकर वैसे लोगों को जो होली का त्योहार बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं और इसे प्रेम और भाईचारे का त्योहार होने की दलील पेश करते हैं। वैसे बहुत सारे शब्द काल और परिस्थिति के अनुसार परिवर्तित होते रहे हैं,जिसका कोई-न-कोई ऐतिहासिक तथ्य भी होते हैं। इस संदर्भ में अगर हम होलिका की बात करें, तो पता चलता है कि उनके पिता हिरण्यकशिपु उत्तर प्रदेश के ही हरदोई जिले के राजा होंगे। जबकि पुराणों में उन्हें दैत्य कहा गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार उन्हें हरि द्रोही माना जाता था। शायद इसी वजह से उसका पौराणिक नाम हरि द्रोही रहा होगा। आगे चलकर उसी ‘हरि द्रोही’ को ‘हरदोई’ कहा जाने लगा होगा। जबकि पुराणों में ही वर्णित है कि हिरण्यकशिपु को यह वरदान प्राप्त था कि कोई उन्हें मार नहीं सकता है। जबकि यह सब कुछ मिथक ही लगता है। पर प्रतीक रूप अवश्य कुछ रहा होगा।

हिरण्यकशिपु विष्णु पूजा के विरोधी थे

जिस प्रकार से आज भी होलिका को जलाया जाता है, जो साबित करता है कि हिरण्यकशिपु निश्चित रूप से अनार्य रहे होंगे। क्योंकि आर्यों के साथ ऐसे अपमान की कथाएं नहीं मिलती हैं। चूंकि लिखने वाले भी तो आर्य लोग ही थे, अनार्यों की छवि धूमिल करने के लिए ऐसी मनगढ़ंत कथाएं लिख दी होगी। जिसकी सच्चाई शोध परक मूल्यांकन से परत दर परत सामने आने भी लगीं हैं। प्रहलाद हिरण्यकशिपु का बड़ा पुत्र था। जवान था। जिसके बारे में यह दर्शाया गया है कि वह विष्णु का पक्का भक्त था। जबकि हिरण्यकशिपु विष्णु पूजा के विरोधी थे। प्रह्लाद विष्णु का कैसा भक्त था, यह कहीं नहीं दर्शाया गया है कि वह विष्णु के लिए कैसी भक्ति करता था? वह कैसे किस तरह से भक्ति करता था? भक्ति करने के लिए कौन सी जगह पर जाता था? उसके अंदर और कौन कौन से गुण थे? अगर इसको भी थोड़ी देर के लिए सच मान लिया जाए, जनश्रुति के अनुसार हिरण्यकशिपु ने इतना बड़ा कदम कैसे उठाया था कि उसे अपने घर से कैसे निकाल दिया था? प्रह्लाद के अन्य भाइयों ने प्रह्लाद के पक्ष से अपने पिता का विरोध क्यों नहीं किया था? क्या ऐसा समाज में देखने के लिए मिलता है कि अगर कोई लड़का कपूत निकल जाता है, तो उसे घर से पिता निष्कासित कर देता है? क्योंकि पिता के लिए सबसे प्यारी संतान ही होती है। तो क्या यह नहीं समझा जाए कि यहां भी मनगढ़ंत कहानियों का ही सहारा लिया गया है?

होलिका को भी यह वरदान प्राप्त था

पुराण के अनुसार यह कहा जाता है कि प्रह्लाद होलिका का भतीजा लगता था। क्योंकि होलिका हिरण्यकशिपु की बहन थी। विष्णु का पक्का भक्त होने की वजह से हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका को प्रह्लाद को गोद में बैठाकर आग में जलाकर मार डालने के लिए कहा था। कहा जाता है कि होलिका को भी यह वरदान प्राप्त था कि उसे आग भी नहीं जला सकती है। इसलिए होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर जलती आग में बैठ गई थी। उसकी गोद से प्रह्लाद उड़ गया था और होलिका जलकर राख हो गई थी। यहां सोचने वाली बात यह है कि अगर प्रह्लाद विष्णु भक्त ही था और उसे हिरण्यकश्यपु देखना नहीं चाहता था, वह तो खुद भी मार डालने में सक्षम था। फिर अपनी बहन होलिका को क्यों कहने गया था कि तुम अपनी गोद में लेकर उसे मार डालो? फिर जब उसी पुराण के अनुसार जब होलिका को आग में न जलने का वरदान मिला था, तो फिर प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर बैठी होगी, तो वरदान का असर क्यों नहीं रहा था? यह सब कुछ साबित करता है कि उस जन श्रुति में थोड़ी भी सच्चाई नहीं है।

होली के अवसर पर अश्लील गालियों की परम्परा क्यों है?

 ऐसी पौराणिक कथाओं पर वैसे ही लोग विश्वास कर सकते हैं, जो मूर्ख ही नहीं, महामूर्ख होते हैं। जो तनिक भी अपना दिमाग लगाना मुनासिब नहीं समझते हैं। क्योंकि अगर प्रह्लाद जवान होगा, तो निश्चित रूप से होलिका से बलवान होगा। फिर होलिका जबरन उसे अपनी गोद में लेकर कैसे बैठी होगी और प्रह्लाद कैसे आसानी से आग के बीच होलिका की गोद में बैठ गया होगा? अगर होलिका छल से अपनी गोद में लेकर बैठ भी गयी होगी, तो स्वाभाविक रूप से दोनों को जलकर मरना चाहिए था। फिर प्रह्लाद के शरीर में पंख तो लगे थे नहीं कि वह उड़ गया होगा? जो बिल्कुल मनगढ़ंत कथा जैसी लग रही है। यहां प्रह्लाद का चमत्कारपूर्ण वर्णन इसलिए किया गया होगा कि विष्णु का भक्त होने की वजह से विष्णु ने उसमें उड़ने की शक्ति देकर बचा लिया होगा। यह ठीक है कि यह सब उन्हीं लोगों के द्वारा गढ़ी गयी कथा है। फिर आज भी होली के अवसर पर जो राख, नालियों की गंदगी, धूल, कीचड़ आदि लगाने की परंपरा है, वह क्यों है? होली के अवसर पर ही अधिक से अधिक भांग, धतूरा, गांजा या नशीली चीजों का सेवन करने की परंपरा क्यों है? क्यों कहा जाता है कि होली में इन चीजों की छूट रहती है?ललाट में अवीर लगाने की परंपरा क्यों है? ललाट में लगाए जाने वाली चीज का नाम अवीर क्यों रखा गया था?इसका कोई तथ्य क्यों नहीं मिलता है ? होली के अवसर पर अश्लील गालियों की परम्परा क्यों है? एक समूह के रूप में होली गाते हुए गली-गली घूमने की परंपरा क्यों है? यह सब कुछ यूं ही तो नहीं चल रहा है ? उपर्युक्त बातें यह साबित करने के लिए काफी है कि इसकी सच्चाई कुछ और रही होगी, जिसमें सच्चाई को छिपाई गई और अनर्गल और उसके मनगढ़ंत बातें बताई गई हैं। 

प्रह्लाद निश्चित रूप से उदंड और लंपट प्रवृत्ति का लड़का रहा होगा

कुछ शोध परक कार्य करने वाले विद्वानों का मानना है कि प्रह्लाद निश्चित रूप से उदंड और लंपट प्रवृत्ति का लड़का रहा होगा। जिसकी संगति नशाखोरों के साथ रही होगी। जिन लोगों ने प्रह्लाद को नशे में लाकर होलिका के साथ गलत किया गया होगा।जब होलिका मर गयी होगी, तो बदनामी से बचने के डर से उसे जल्दी-जल्दी लकड़ी, गोइठा या जो कुछ भी मिला होगा, उसे लाकर जलाया होगा। क्योंकि आज भी होली के पहले लड़के अंधेरी रात में चुपके से लकड़ी गोइठा आदि चुराकर अगजा के पास इकट्ठा करते हैं। वैसे भी शोध करने वाले विद्वानों के अनुसार जब बहन होलिका को मार कर जलाने की सूचना हिरण्यकशिपु को मिली, तो उसने प्रह्लाद सहित उसके साथियों को पकड़वाया था और दूसरे दिन उनके ललाट पर कालिख या चूना से अवीर लिखवाकर उन्हें गली-गली में घुमाया था कि तुम लोग अवीर अर्थात् कायर हो। फिर घूमने के क्रम में उन पर लोग कीचड़ गंदगियां आदि फेकें होंगे। वही परम्परा आज तक चली आ रही है। जो आज की होली के त्योहार से बिल्कुल मेल खाता दिखाई देता है। जिस तरह से विद्वानों के अनुसार प्रह्लाद की संगति नशाखोरों से थी। उसी तरह से आज भी होली के अवसर पर लोग गांजा, भांग शराब, धतूरा आदि पीकर नशे में धूत रहते हैं।           

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