मोदी के निशाने पर क्यों रहता है : नेहरु- गांधी परिवार
एच. एल. दुसाध
मोदी के निशाने पर फिर नेहरु-गांधी परिवार
नरेंद्र मोदी को प्रधानमत्री बने 11 साल हो गए हैं . इन ग्यारह वर्षों में वह प्रायः अप्रतिरोध्य रहे . हाल के वर्षों में राहुल गांधी को छोड़ दिया जाय तो पक्ष या विपक्ष:कोई भी उन्हें चुनौती देने की स्थिति में नहीं रहां. बावजूद इसके वे बुरी तरह किसी से परेशान रहे तो वह नेहरु – गांधी परिवार है. इस कारण वे विगत ग्यारह वर्षों में समय-समय इस परिवार को लेकर तीखी आलोचना करते हुए अपनी परेशानी जाहिर करते रहे हैं. ताज़ी घटना संसद के मानसून सत्र की है, जिसमें ऑपरेशन सिंदूर पर अपनी बात रखने के क्रम में उन्होंने 14 बार पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु का जिक्र किया. वह अपने 102 मिनटों के भाषण में नेहरु की इतनी गलतियाँ गिनाये कि श्रोता ऊंघने लगे. संसद के बाहर एक जनसभा में कहे नेहरु-गांधी परिवार सबसे भ्रष्ट परिवार है. बहरहाल एक बार फिर नेहरु को निशाने पर लेने के बाद राजनीतिक विश्लेषक उन कारणों की खोज में व्यस्त हो गए हैं , जिन कारणों से वह नेहरु-गांधी परिवार को निशाने पर लेने का कोई अवसर नहीं चूकते! काबिले गौर है कि कांग्रेस ने आजादी के बाद से लेकर हाल के वर्षों में जनहित में कुछ सबसे बड़े फैसले तब किए हैं, जब उसका अध्यक्ष नेहरू-गांधी परिवार का कोई सदस्य रहा है. हाल के वर्षों में नरेगा, मिड डे मील, आरटीआई, उच्च शिक्षा में ओबीसी आरक्षण जैसे फैसले सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष रहने के दौरान ही हुए, जबकि नरसिम्हा राव के कार्यकाल को बाबरी मस्जिद गिराए जाने, सांप्रदायिक हिंसा और बेलगाम बाजारवाद के लिए जाना जाता है. भारत में उदारीकरण की शुरुआत एक कांग्रेसी सरकार ने अवश्य की, किन्तु संयोग से ये वह समय था जब कांग्रेस पर नेहरू-गांधी परिवार का नाममात्र का भी असर नहीं था और नरसिम्हा राव ने काफी निर्णायक ढंग से न केवल गांधी-नेहरू परिवार को बल्कि उनके करीबी समझे जाने वाले कांग्रेसी नेताओं को ये संकेत दे दिये थे कि वह स्वायत्त प्रधानमंत्री और स्वायत्त पार्टी अध्यक्ष के रूप में ही कार्य करेंगे. बहरहाल जब कांग्रेस ने जनहित में बड़े – बड़े फैसले नेहरु- गांधी परिवार के सदस्यों की अगुवाई में ही लिए हैं , तो फिर राष्ट्रवादी सोच का होने की सदम्भ घोषणा करने वाले भाजपा के नरेंद्र मोदी के साथ बाकी भाजपा नेता इस परिवार पर वंशवाद का आरोप लगाते हुए क्यों इसे निशाने पर लेते रहते हैं, खासतौर से पंडित नेहरु और राहुल गांधी को ?
कांग्रेस पर वंशवाद का आरोप कितना सही !
जहां तक कांग्रेस पर वंशवाद के आरोप का सवाल है, दशकों पहले यह तब लगना शुरू हुआ जब इंदिरा गांधी के कार्यकाल में संजय गांधी का प्रभाव विस्तार हुआ पर , यह हदें तब पार किया जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने. जिन इंदिरा गांधी से कांग्रेस वंशवाद के आरोप से घिरनी शुरू हुई, उनको उनके पिता नेहरु ने उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित जरूरू किया था , लेकिन उनको प्रधानमंत्री नहीं बनाया: उनके बाद प्रधानमंत्री बने लाल बहादुर शास्त्री. इतिहासकार रामचन्द्र गुहा के मुताबिक़ चीन से युद्ध के बाद नेहरू कांग्रेस में काफी कमज़ोर हो गए थे और उनकी मर्ज़ी के खिलाफ ‘कामराज योजना’ आई, जिसके तहत उनकी पसंद के सभी वरिष्ठ मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों से इस्तीफे दिलवाकर पार्टी के काम में लगा दिया गया. उस समय नेहरू ने बहुत प्रयास करके लाल बहादुर शास्त्री को वापस मंत्रिमंडल में लिया. गुहा लिखते हैं कि नेहरू की सेहत उस समय ऐसी नहीं थी कि वह काम का बहुत बोझ ले सकते. उस समय शास्त्री एक तरह से उप-प्रधानमंत्री की तरह काम करते थे. अगर उन्हें उस समय वंशवाद चलाना होता तो वह ‘कामराज योजना’ के तहत वरिष्ठ मंत्रियों के इस्तीफे को इन्दिरा गांधी के लिए अवसर की तरह देखते, जबकि उन्होंने इसके उल्टा किया और शास्त्री को इतना महत्व दिया कि उनकी मृत्यु के बाद शास्त्री का प्रधानमंत्री बनना बहुत सरल हो गया. मोरारजी देसाई ने उस समय शास्त्री को चुनौती दी लेकिन अपने साथियों का रुख भांपकर उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया. शास्त्री ने प्रधानमंत्री का पदभार ग्रहण किया और थोड़ी अनिच्छा के बावजूद, उन्हें इन्दिरा गांधी को अपने मंत्रिमंडल में जगह देनी पड़ी . शास्त्री जी की मृत्यु के बाद कांग्रेस क्षत्रपों ने इन्दिरा गांधी को संसदीय दल और पार्टी का नेता चुना. मोरारजी देसाई ने फिर एक बार मुंह की खाई – इस बार उन्होंने कांग्रेस संसदीय दल में चुनाव भी लड़ा और 355 के मुक़ाबले 169 वोटों से हार गए. इन्दिरा न सिर्फ बरसों कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय थीं बल्कि उन्हें प्रधानमंत्री पद आंतरिक चुनाव के बाद ही मिला. आपातकाल के बाद 1977 में चुनाव हारने के बाद कांग्रेस के कुछ लोगों ने फिर एक बार इन्दिरा गांधी से (और वंशवाद से) पीछा छुड़ाने की कोशिश की लेकिन बहुसंख्यक कांग्रेसियों ने ऐसा नहीं होने दिया.
कांग्रेस के इतिहास में कथित वंशवाद का सबसे बड़ा प्रदर्शन 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुआ जब कांग्रेसियों ने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बना दिया. हालांकि राजीव गांधी कभी राजनीति में आना नहीं चाहते थे और पायलट के तौर पर अपनी अलग जिंदगी जी रहे थे. 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद फिर कांग्रेस ने नेहरू-गांधी परिवार से दूरी बनाने की एक बड़ी कोशिश की. सोनिया गांधी ने कांग्रेस में बरसों कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और नरसिम्हा राव और फिर सीताराम केसरी के नेतृत्व में सरकार और पार्टी चलती रही. इस दौरान कांग्रेस कमजोर पड़ी और नेताओं ने एक बार फिर गांधी परिवार की तरफ देखा और स्पष्ट रूप से अनिच्छुक लगने वाली सोनिया गांधी को पार्टी की बागडोर थमा दी. इसके बावजूद 2004 और 2009 में सोनिया गांधी ने खुद को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर पेश नहीं किया. हालांकि उन पर आरोप है कि पर्दे के पीछे से वे सत्ता का संचालन करती रहीं. वर्तमान में कांग्रेस सत्ता से बाहर है और पार्टी अध्यक्ष नेहरु – गांधी से बाहर का व्यक्ति है. एक और बात है वंशवाद से कोई भी पार्टी मुक्त नहीं है, यहाँ तक कि खुद भाजपा , बावजूद इसके मोदी और उनके संगी गला फाड़कर कांग्रेस पर वंशवाद का आरोप लगाते रहते हैं. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक़ उसका कारण यह कि कांग्रेस के विरुद्ध परिवारवाद का नारा ज़ोर-शोर से उठाकर भाजपा उसे बिलकुल नेस्तनाबूद करना चाहती है. इस मामले में भाजपा के दोनों हाथों में लड्डू हैं. अगर जोश में आकर और इस परिवारवाद की आलोचना से बचने के लिए गांधी परिवार कांग्रेस को सचमुच उसके हाल पर छोड़ देता है तो फिर समझिए कि कांग्रेस का टूट-फूट कर बिखरना निश्चित है. इसके उलट यदि ऐसा नहीं होता और परिवार का ही कोई सदस्य सिरमौर रहता है (या फिर कोई नाममात्र का अध्यक्ष बनता है जिसे परिवार प्रत्यक्ष तौर पर कंट्रोल करता है) तो फिर हमेशा के लिए ये आलोचना चलती ही रहेगी.
क्या मोदी के नेहरु विरोध के पीछे महज वैचारिक कारण है या कुछ और !
अब जहां तक मोदी और उनके पार्टी के दूसरों लोगों द्वारा पंडित नेहरु को विशेष तौर से निशाने पर लेने का प्रश्न है राजनीतिक विश्लेषक राजदीप सरदेसाई के मुताबिक ,’ नेहरु ‘धर्मनिरपेक्ष ‘ प्रधानमंत्री थे. उनके लिए बिना भेदभाव वाला धर्मनिरपेक्षता आस्था का मूलमंत्र तत्व था . यही उनकी विचारधारा का मूल भी था . उन्होंने यह पूरी तरह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि भारत कभी हिन्दू राष्ट्र ; या ‘हिन्दू पाकिस्तान’ न बने . इसके लिए वह हमेशा हिन्दुत्ववादी ताकतों से उलझते रहते थे . उन्हें हाशिये पर डालने , यहाँ तक कि उन्हें बहिष्कृत करने की हर संभव कोशिश करते थे. नाथूराम गोडसे के महात्मा गांधी की ह्त्या ने हिन्दू साम्प्रदायिकता को हर मोड़ पर चुनौती देने के उनके संकल्प को और मजबूत कर दिया . वो इसे बहुलवादी , बहु- धार्मिक भारत के अपने विचार के बिलकुल विपरीत मानते थे . उस समय आरएसएस के लिए , नेहरु सबसे बड़े ‘शत्रु’ थे, जिनसे वे वैचारिक और राजनीतिक स्तर पर बेहद नफरत करते थे . जहाँ आरएसएस अतीत और प्राचीन हिन्दू धर्मग्रंथों का महिमामंडन करना चाहता है , वहीं नेहरु तर्क और विज्ञान पर आधारित आधुनिक समाज निर्माण करना चाहते थे …मोदी के आदर्श गोलवलकर नेहरु को अपना प्रमुख विरोधी मानते थे. वो उन्हें एक ऐसा व्यक्ति मानते थे , जो हिंदुत्व को लोगों के बीच स्वीकार्यता हासिल करने से रोक रहे थे.’ जहाँ तक मोदी के नेहरु विरोध का सवाल है अधिकाँश राजनीतिक विश्लेषकों की राय सरदेसाई से ही मिलती – जुलती है . मुख्यतः धर्मनिरपेक्षता के प्रबल हिमायती होने के कारण नेहरु मोदी और दूसरे भाजपाइयों के निशाने पर रहते हैं, ऐसा अधिकांश राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं. वह हिन्दू राष्ट्र की सोच को हतोत्साहित करते रहते थे , इसलिए मोदी और दूसरे भाजपाई उन्हें निशाने पर लेते हैं. राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा जो कारण गिनाये जाते हैं , वे आंशिक रूप से ही सही हैं . पर, असल कारण कुछ और है और वह कारण है भाजपा के पितृ संगठन संघ के हिन्दू राष्ट्र निर्माण के पीछे क्रियाशील आर्थिक और सामाजिक सोच है , जिसकी राह में कांग्रेस और नेहरु-गांधी परिवार ने एवरेस्ट सरीखा अवरोध खड़ा कर दिया , जिसे अतिक्रम करना भाजपा के लिए कठिन है. हिन्दू राष्ट्र की राह में नेहरु-गांधी परिवार ने कैसे अवरोध खड़ा कर दिया, इसे समझने के लिए सबसे जरुरी है हिन्दू राष्ट्र निर्माण के पीछे संघ की आर्थिक – सामाजिक सोच को जानना , जिसकी मुख्यधारा के राजनीतिक विश्लेषक अपने वर्गीय हित में इच्छाकृत रूप से अनदेखी करते रहते हैं. हिन्दू राष्ट्र निर्माण के पृष्ठ में क्रियाशील संघ के सामाजिक – आर्थिक सोच को जाने बिना का हम समझ ही नहीं सकते कि उसकी राह में नेहरु-गांधी परिवार ने कैसे एवेरेस्ट सरीखा अवरोध खड़ा कर दिया, जिस कारण भाजपा इस परिवार को नेस्तनाबूद करना चाहिती है!
90% आबादी के सिर से
हिन्दू राष्ट्र का भूत उतारने का अवसर गवां दिए : गैर-भाजपाई बुद्धिजीवी और दल !
काबिले गौर है कि किसी भी राजनीतिक संगठन के निर्माण के पीछे सामाजिक- आर्थिक सोच का होना बहुत जरुरी है. यह सोच संगठन को दिशा देती है , उसकी नीतियों को प्रभावित करती है और उसे समाज में एक मजबूत जगह बनाने में मदद करती है. सामान्यतया सामाजिक –आर्थिक सोच राजनीतिक संगठन को ऐसी नीतियां बनाने के लिए प्रेरित करती है जो समाज के सभी वर्गों के लिए लाभदायक हो . यह सुनिश्चित करती है कि संगठन समावेशी हो और सभी को समान अवसर प्रदान करे! सामाजिक – आर्थिक सोच संगठन को एक मजबूत आधार प्रदान करती है. जब संगठन के सदस्य एक सामान्य सामाजिक – आर्थिक दृष्टिकोण साझा करते हैं , तो वे एक साथ मिलकर काम करने और लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अधिक प्रेरित होते हैं. जब राजनीतिक संगठन सामाजिक – आर्थिक मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करता है , तो जनता का समर्थन हासिल करने में सफल होता है. लोग भूले नहीं होंगे कि 2014 में मोदी धूमधाम से सत्ता में इसलिए आ पाए थे क्योंकि वह हर साल दो करोड़ युवाओं को नौकरी देने , सौ दिन में विदेशों से काला धन लाकर हर व्यक्ति के खाते में 15 लाख डालने का वादा किए थे . तब लोग हिन्दू राष्ट्र की लालच में नहीं, आर्थिक स्थिति बेहतर होने की उम्मीद में भाजपा को वोटों से लाद दिए थे . लोग ऐसे संगठनों से जुड़ना चाहते हैं जो उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए काम कर रहे हों . सामाजिक- आर्थिक सोच संगठन को स्थिरता प्रदान करती है. यदि संगठन केवल सत्ता हासिल करने के लिए काम करता है, तो वह अस्थाई होगा. लेकिन यदि वह समाज के लिए कुछ सार्थक करना चाहता है, तो लम्बे समय तक टिका रह सकता है. सारांश में कहा जा सकता है सामाजिक- आर्थिक सोच किसी भी राजनीतिक संगठन के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक शक्ति है , जो संगठन को सही दिशा में ले जाती है, उसके लक्ष्यों को निर्धारित करती है : उसे जनता का समर्थन हासिल करने में मदद करती है और उसे स्थिरता प्रदान करती है ! संघ भले ही घोषित तौर पर अराजनीतिक संगठन हो ,पर उसकी गतिविधियाँ राजनीति से प्रेरित रहीं हैं . राजनीतिक लक्ष्य साधने के लिए ही उसने पहले जनसंघ और बाद में भाजपा को जन्म दिया. जाहिर है उसकी भी सामाजिक- आर्थिक सोच रही , जिसे राजनीतिक विश्लेषकों के साथ गैर-भाजपा दलों ने सामने लाने में नहीं के बराबर रूचि ली . यदि उन्होंने इमानदारी से हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के पीछे सामाजिक – आर्थिक सोच को सामने लाने का प्रयास किया होता , तो प्रायः 90 प्रतिशत आबादी के सिर से हिन्दू राष्ट्र का भूत उतर उतर गया होता!
हिन्दू राष्ट्र निर्माण के पीछे : संघ की सामाजिक – आर्थिक सोच
अधिकांश विद्वानों के मुताबिक़ हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा, जिसे हिंदुत्व के रूप में भी जाना , भारत में एक राजनीतिक विचारधारा है जो हिन्दू धर्म-संस्कृति और पहचान पर आधारित एक राष्ट्र राज्य की स्थापना की वकालत करती है. इसके पीछे की आर्थिक सामाजिक सोच में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता पर जोर , पारम्परिक मूल्यों का संरक्षण , और एक मजबूत , एकीकृत हिन्दू समुदाय का निर्माण करना है. कुल मिलाकर हिन्दू राष्ट्र के पीछे क्रियाशील सामाजिक- आर्थिक सोच को जमीन पर उतारने के लिए इसका हजारों साल पुरानी वर्ण – व्यवस्था को लागू करना रहा है. वर्ण – व्यवस्था के ज़रिये संघ हिन्दू राष्ट्र में अपनी सामाजिक- आर्थिक सोच को जमीन पर उतारना चाहता है, इसका संकेत हिंदुत्व के महानायक सौ साल से अधिक समय से दे रहे हैं. आज से शताधिक वर्ष पूर्व हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को परिभाषित करने वाले विनायक दामोदर सावरकर ने इस बात पर जोर दिया था कि राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था पश्चिम से उधार ली गई अवधारणाओं बजाय प्राचीन देशी विचारों पर आधारित होनी चाहिए . जाहिर है उन्होंने वर्ण- व्यवस्था आधारित प्राचीन हिन्दू व्यवस्था द्वारा राजनीतिक- आर्थिक व्यवस्था परिचालित करने का निर्देश दिया था . हिन्दू राष्ट्र के अग्रणी विचारक प्रो. बिनॉय कुमार सरकार ने 1920 के आसपास अपनी पुस्तक ‘ बिल्डिंग ऑफ़ हिन्दू राष्ट्र ‘ में हिन्दू राज्य की संरचना और हिन्दू राज्य की सामाजिक – आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था के लिए जो दिशा निर्देश प्रस्तुत किया था वह कौटिल्य , मनु और शुक्र जैसे विचारकों और महाभारत पर आधारित था. जाहिर है सरकार महोदय ने भी मनुवादी सामाजिक- आर्थिक व्यवस्था की कामना की थी . प्राचीन वर्ण – व्यवस्था द्वारा ही भविष्य के भारत की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था चले , इसके प्रबल पैरोकार ‘ बंच ऑफ़ थॉट्स ‘ के लेखक और आरएसएस के दूसरे प्रमुख एमएस गोलवलकर भी रहे. जिनकी आर्थिक सोच पर भाजपाइयों के गर्व का अंत नहीं है, ‘एकात्म मानववाद’ के रूप में भारतीय जनसंघ और आज की भाजपा के राजनीतिक दर्शन को सामने लाने वाले उस पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने सामाजिक- आर्थिक मुक्ति के साधन के रूप में साम्यवाद और पूंजीवाद को अस्वीकार करते कहा था कि हिन्दुओं की आर्थिक मुक्ति, भारतीय संस्कृति और मूल्यों पर आधारित एक न्यायसंगत और आत्मनिर्भर आर्थिक प्रणाली के माध्यम से ही संभव हो सकती है! स्पष्ट है कि पंडित उपाध्याय भी वर्ण- व्यवस्थाधारित सामाजिक- आर्थिक व्यवस्था के हिमायती थे. हिंदुत्व के प्रातः स्मरणीय इन मनीषियों की सोच का प्रतिबिम्बन ही संघ के हिन्दू राष्ट्र की सामाजिक – आर्थिक सोच में हुआ है.
सामने आया हिन्दू राष्ट्र के संविधान का प्रारूप !
बहरहाल संघ अपने राजनीतिक संगठन भाजपा के जरिए जिस हिन्दू राष्ट्र के सामाजिक- आर्थिक विचार को जमीन पर उतारना चाहता है , उसके संविधान का प्रारूप 2025 के महाकुम्भ में सामने आ चुका है. इसे 12 महीने 12 दिन में 25 विद्वानों ने मिलकर तैयार किया है, जिसके पीछे चारों पीठ के शंकराचचार्यों की सहमति है.501 पन्नों के इस संविधान की निर्माण समिति में उत्तर भारत के 14 और दक्षिण भारत के 11 विद्वान शामिल किए गए हैं. संविधान निर्माण समिति ने धर्मशास्त्रों के साथ ही रामराज्य, श्रीकृष्ण के राज्य, मनुस्मृति और चाणक्य के अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के बाद हिंदू राष्ट्र के संविधान को तैयार किया है. संविधान निर्माण समिति में काशी हिंदू विश्वविद्यालय, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के विद्वान भी शामिल रहे. इसके संरक्षक शांभवी पीठाधीश्वर के अनुसार 2035 तक हिंदू राष्ट्र की घोषणा का लक्ष्य रखा गया है. हिंदू राष्ट्र के पहले संविधान के आधार पर देश गणराज्य होगा. चुनाव के आधार पर ही राष्ट्र के प्रमुख का चयन किया जाएगा. संविधान में यहां पर सभी को रहने का अधिकार रहेगा, लेकिन राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के खिलाफ कार्य करने वालों को सख्त दंड का विधान भी बनाया गया है. संविधान निर्माण समिति के अध्यक्ष डॉ. कामेश्वर उपाध्याय के अनुसार हिंदू राष्ट्र में हर नागरिक के लिए सैनिक शिक्षा अनिवार्य होगी. हिंदू राष्ट्र में वर्तमान कर प्रणाली नहीं रहेगी और कृषि को पूर्णत: कर मुक्त कर दिया जाएगा। कर चोरी पर कठोर दंड का विधान होगा. संविधान के अनुसार एकसदनात्मक व्यवस्थापिका होगी और सदन का नाम संसद नहीं हिंदू धर्म संसद होगा. हर संसदीय क्षेत्र में एक धर्म सांसद निर्वाचित होगा। पूरे देश में 543 धर्म सांसद निर्वाचित होंगे. धर्मसांसद के लिए न्यूनतम आयु सीमा 25 और मतदान करने के लिए न्यूनतम आयु सीमा 16 वर्ष होगी.चुनाव लड़ने और लड़ाने का अधिकार केवल सनातन धर्म के अनुयायियों , भारतीय उप महाद्वीप के पंथ जैन, बौद्ध व सिख मत के अनुयायियों को होगा. विधर्मियों को मताधिकार से वंचित किया जायेगा. धर्मसांसद बनने के लिए उम्मीदवार को वैदिक गुरुकुल का छात्र होना अनिवार्य होगा.
अध्यक्ष का चयन गुरुकुलों से होगा. धर्मशास्त्र और राजशास्त्र में पारंगत व्यक्ति जिसने राज्य संचालन का पांच वर्ष का व्यवहारिक अनुभव लिया हो वहीं राष्ट्रध्यक्ष पद के योग्य होगा. हिंदू राष्ट्र संविधान के अनुसार युद्ध के समय राजा को अपनी सेना का नेतृत्व करना होगा. राष्ट्राध्यक्ष विषय विशेषज्ञ, शास्त्र ज्ञाता, शूरवीर, शस्त्र चलाने में निपुण और प्रशिक्षित व्यक्तियों को ही मंत्री पद पर नियुक्त करना होगा. हिंदू राष्ट्र में हिंदू न्याय व्यवस्था लागू की जाएगी.यह संसार की सबसे प्राचीन न्याय व्यवस्था है.राष्ट्राध्यक्ष के नियंत्रण में मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीश होंगे.कोलेजियम जैसी कोई व्यवस्था नहीं रहेगी. भारतीय गुरुकुलों से निकलने वाले सर्वोच्च विधिवेत्ता ही न्यायाधीश के पद को सुशोभित करेंगे. सभी को त्वरित न्याय सुनिश्चित किया जाएगा. झूठे आरोप लगाने वालों पर भी दंड का विधान होगा. दंड सुधारात्मक होंगे. हिंदू राष्ट्र में प्राचीन वैदिक गुरुकुल प्रणाली को लागू किया जाएगा. अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों को गुरुकुलों में परिवर्तित किया जाएगा और शासकीय धन से संचालित सभी मदरसे बंद किए जाएंगे. मनु और याज्ञवल्क की स्मृतियों का व्यावहारिक उपयोग किया जाएगा. पिता की मृत्यु के उपरांत श्राद्ध करने वाला उत्तराधिकारी होगा. एक पति, एक पत्नी प्रथा चलेगी.हिंदू विधि का अंतिम व सर्वोच्च उद्देश्य वर्णाश्रम व्यवस्था की पुन: स्थापना है. कर्म आधारित वर्ण – व्यवस्था को विधिक रूप दिया जाएगा!
संघ क्यों लागू करना चाहता है वर्ण- व्यवस्था
वैसे तो वर्षों से आम से लेकर खास लोग यह घोषणा करते रहे हैं कि संघ हिन्दू राष्ट्र में वर्ण – व्यवस्था द्वारा अपनी सामाजिक- आर्थिक सोच को जमीन पर उतारना चाहता है पर, महाकुम्भ में हिन्दू राष्ट्र के संविधान का प्रारूप सामने आने के बाद किसी को भी संदेश नहीं रह जाना चाहिए कि वह वह कर्म आधारित वर्ण- व्यवस्था लागू करना चाहता है. आखिर क्यों वह वर्ण- व्यवस्था लागू करना चाहता है, इसे जानने के लिए कर्म आधारित वर्ण- व्यवस्था की विशेषता जान लेना जरुरी है. दैवीय- सृष्ट वर्ण- व्यवस्था उस हिन्दू धर्म का प्राणाधार है, जिसका संघ अघोषित रूप से ठेकेदार बने बैठा है. जिसे हिन्दू धर्म धर्म कहा जाता उसका अनुपालन कर्म आधारित वर्ण – व्यवस्था के जरिये होता. जिस वर्ण- व्यवस्था को संघ हिन्दू राष्ट्र में लागू करना चाहता है, वह वर्ण- व्यवस्था मूलतः शक्ति के स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक , शैक्षिक और धार्मिक – के बंटवारे की व्यवस्था रही. शक्ति के स्रोतों का बंटवारा चार वर्णों- ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्रातिशूद्रों के लिए निर्दिष्ट पेशे/ कर्मों के जरिये किया गया. विभिन्न वर्णों के लिए निदिष्ट कर्म ही उनके धर्म रहे. वर्ण – व्यवस्था में ब्राह्मण का धर्म(कर्म ) अध्ययन- अध्यापन , राज्य संचालन में मंत्रणा- दान और पौरोहित्य रहा. क्षत्रिय का धर्म भूस्वामित्व, सैन्य- वृत्ति एवं राज्य –संचालन रहा , जबकि वैश्य का कर्म(धर्म) पशुपालन एवं व्यवसाय- वाणिज्य रहा. शुद्रातिशूद्रों का धर्म(कर्म) रहा तीन उच्चतर वर्णों(ब्राह्मण- क्षत्रिय और वैश्यों) की निष्काम सेवा. वर्ण- धर्म में पेशों की विचलनशीलता निषिद्ध रही , क्योंकि इससे कर्म- संकरता की सृष्टि होती और कर्म-संकरता धर्मशास्त्रों द्वारा पूरी तरह निषिद्ध रही. कर्म-संकरता की सृष्टि होने पर इहलोक में राजदंड तो परलोक में नरक का सामना करना पड़ता. धर्मशास्त्रों द्वारा पेशे/ कर्मों के विचलनशीलता की निषेधाज्ञा के फलस्वरूप वर्ण- व्यवस्था ने एक आरक्षण –व्यवस्था: हिन्दू आरक्षण व्यवस्था का रूप ले लिया , जिसमें भिन्न- भिन्न वर्णों के निर्दिष्ट पेशे/कर्म , उनके लिए अपरिवर्तित रूप से चिरकाल के लिए आरक्षित होकर रह गए. इस क्रम में हिन्दू आरक्षण में ब्राह्मणों के लिए पौरोहित्य व बौद्धिक पेशे तो क्षत्रियों के लिए भूस्वामित्व , राज्य संचालन और सैन्य-कार्य तो वैश्यों के लिए पशु-पालन व व्यवसाय- वाणिज्य के कार्य चिरकाल के लिए आरक्षित होकर रह गये.हिन्दू आरक्षण में शुद्रातिशूद्रों के हिस्से में शक्ति के स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक , धार्मिक – एक कतरा भी नहीं आया:वे चिरकाल के लिए दुनिया के सबसे अशक्त मानव समुदायों में तब्दील होने के लिए अभिशप्त हुए !
वर्ण व्यवस्था को अमरत्व प्रदान करने वाले उपाय
सामाजिक – आर्थिक नजरिये से वर्ण- व्यवस्था के अध्ययन से साफ़ नजर आता है कि विदेशी मूल के आर्यों द्वारा इसका प्रवर्तन सिर्फ चिरकाल काल के लिए सुपरिकल्पित रूप से शक्ति के समस्त स्रोत हिन्दू ईश्वर के उत्तमांग(मुख- बाहु- जंघे) से जन्मे लोगों को आरक्षित करने के मकसद से किया गया था. यहां यह भी गौर करना जरुरी है कि इसमें आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक अधिकार सिर्फ उच्च वर्णों के पुरषों के लिए आरक्षित हुए : उनकी आधी आबादी शुद्रातिशूद्रों की भांति ही शक्ति के स्रोतों से प्रायः पूरी तरह बहिष्कृत रही.इससे साफ़ नजर आयेगा की वर्ण-व्यवस्थाधारित हिन्दू धर्म का पूरा ताना- बाना उच्च वर्णों के रूप में हिन्दुओं की अत्यंत अल्पसंख्यक आबादी को , जिनकी संख्या आज की तारीख में बमुश्किल 7.5% हो सकती है, स्थाई तौर पर शक्ति के समस्त स्रोतों से लैस करने को ध्यान में रखकर बुना गया था. इस व्यवस्था को ईश्वर – सृष्ट प्रचारित कर उच्च वर्णों को शक्ति के स्रोतों का दैवीय-अधिकारी वर्ग बना दिया था. इस दैवीय अधिकारी वर्ग के हित में प्रवर्तित वर्ण-व्यवस्था को प्रत्येक आक्रमण से सुरक्षित रखने के लिए आर्य मनीषियों ने कर्म कर्म-शुद्धता की अनिवार्यता और कर्म- संकरता की भांति वर्ण- शुद्धता की अनिवार्यता और वर्ण- संकरता की निषेधाज्ञा का सिद्धांत रचा. वर्ण- संकरता से समाज को बचाए रखने के लिए ही उन्होंने सती- विधवा और बालिका – विवाह- प्रथा के साथ अछूत – प्रथा को जन्म दिया. इसके फलस्वरूप पंडित राहुल सांकृत्यायन के मुताबिक सती- प्रथा के तहत भारत के समग्र इतिहास में सवा करोड़ नारियों को अग्नि-दग्ध कर मार डाला गया. इसी तरह विधवा-प्रथा के तहत जहाँ कई करोड़ नारियों की यौन- कामना को बर्फ की सिल्ली में तब्दील कर द
