UGC regulation: क्या बहुजन छात्र और गुरुजन बनेंगे मौजूदा राजनीति का विकल्प 

UGC regulation: 29 जनवरी, 2026 को सुप्रीम कोर्ट के यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन, 2026 पर रोक लगाने और पुराने 2012 फ्रेमवर्क को फिर से लागू करने के फैसले की निंदा करते हुए बहुजन छात्र और शिक्षकों का जो आन्दोलन शुरू हुआ, उससे फरवरी , 2019 के 13 पॉइंट रोस्टर विरोधी ऐतिहासिक आन्दोलन की पुनरावृति होती नजर आ रही है

 

एचएल दुसाध 

  Delhi: 29 जनवरी, 2026 को सुप्रीम कोर्ट के यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन, 2026 पर रोक लगाने और पुराने 2012 फ्रेमवर्क को फिर से लागू करने के फैसले की निंदा करते हुए बहुजन छात्र और शिक्षकों का जो आन्दोलन शुरू हुआ, उससे फरवरी , 2019 के 13 पॉइंट रोस्टर विरोधी ऐतिहासिक आन्दोलन की पुनरावृति होती नजर आ रही है. तब 13 पॉइंट रोस्टर को वापस लेने के विरोधी में फ़रवरी 2019 से शुरू हुए आन्दोलन को चरम पर पहुंचाते हुए , 5 मार्च, 2019 को भारत बंद हुआ , जिसके दबाव में मोदी सरकार 200 पॉइंट रोस्टर फिर लागू करने के लिए बाध्य हुई.इस बार यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन 2026 पर रोक के खिलाफ फरवरी के शुरुआत में दिल्ली विश्वविद्यालय से जो आन्दोलन शुरू हुआ,वह देखते ही देखते पूरे देश में फ़ैल गया. इसमें एक नया मोड़ तब आया जब इस आन्दोलन को नेतृत्व देने के लिए गठित ‘समता संघर्ष समिति’ की ओर से 9 फरवरी, 2026 को दिल्ली के प्रेस क्लब में सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट मयंक यादव के नेतृत्व में एक संवाददाता सम्मेलन आयोजित हुआ , जिसमें ढेरों ऐतिहासिक धरना-प्रदर्शनों को नेतृत्व देने वाले प्रो सुकुमार नारायण, अशोक भारती , डॉ सूरज यादव मण्डल , डॉ संदीप यादव , प्रशांत कनौजिया, मुकुल सिंह चौहान ऐंव अन्य छात्र नेता भी उपस्थित रहे: साथ में रहे डॉ अनिल जयहिंद , डॉ जयंत जिज्ञासु , डॉ अरविन्द चौधरी, डॉ देव कुमार, प्रियंका भारती ,  डॉ कंचना यादव, एडवोकेट धर्मवीर  , श्रेय यादव जैसे सामाजिक न्याय के चमकदार चेहरे!सम्मलेन में लगभग 25 संगठनों, छात्र संघ के प्रतिनिधियों , जन आन्दोलनों के बुद्धिजीवियों ने मिलकर ‘जाति के नाम पर हो रहे शोषण और अत्याचार को ख़त्म कर समता के लिए’ एक साथ आगे लड़ाई लड़ने का निश्चय किया !   

इसमें कहा गया कि  हम कोर्ट की इस टिप्पणी को खारिज करते हैं कि जाति-आधारित भेदभाव को ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़ित समूहों के खिलाफ अपराध के रूप में परिभाषित करना ‘बहुत व्यापक’ या ‘ पिछड़ा हुआ’ है;कि हम कानूनी रूप से लागू होने वाली सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 2026 रेगुलेशन पर लगी रोक को तुरंत हटाने की मांग करते हैं, जिसमें अनिवार्य इक्विटी समितियां और सख्त 15-दिवसीय समाधान समय-सीमा शामिल हैं;कि यह कन्वेंशन ‘जाति-तटस्थता’ की आड़ में एससी,एसटी, और ओबीसी सुरक्षा पर विशेष ध्यान को कम करने के लिए ‘प्रख्यात न्यायविदों’ की किसी भी समिति के गठन का विरोध करता है;कि हम पुष्टि करते हैं कि संविधान का अनुच्छेद 15(4) राज्य को हाशिए पर पड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान करने का अधिकार देता है, और अनुच्छेद 142 के माध्यम से इन्हें रोकने का कोई भी प्रयास सामाजिक न्याय की भावना का उल्लंघन है; कि हम सभी छात्र संगठनों और सामाजिक न्याय आंदोलनों से रोहिथ वेमुला और डॉ. पायल तडवी की विरासत की रक्षा के लिए राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन के लिए एकजुट होने का आह्वान करते हैं! तदनुसार, समिति एक ज्ञापन प्रसारित करेगी, जिस पर विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, आईआईटी, आईआईएम, एम्स आदि में छात्रों, संकाय सदस्यों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे, जिसमें सरकार से यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन 2026 को लागू करने का आग्रह किया जाएगा! यह ज्ञापन महामहिम, भारत के राष्ट्रपति को संबोधित होगा और 17 फरवरी  से 22 फरवरी 2026 के  बीच को बीडीओ, एसडीएम, डीएम, प्रिंसिपलों और कुलपतियों के माध्यम से भारत के राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाएगा!

अंत में 13 फरवरी को देश के 100 से अधिक विश्व विद्यालयों और कॉलेज परिसरों में आन्दोलन की योजना घोषित हुई और उस योजना के तहत इन पक्तियों के लिखे जाने के दौरान बहुजन छात्र और गुरुजनों का आन्दोलन शुरू हो चुका है. इस क्रम में 13 फरवरी को 5 मार्च , 2019 वाले इतिहास की पुनरावृति की सम्भावना पैदा हो गई . बहरहाल भारत में जहाँ एक ओर बहुजन छात्र और शिक्षकों का आन्दोलन जोर पकड़ता जा रहा है,वहीं पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में छात्र आन्दोलन ने एक अलग इतिहास रच दिया है. बांग्लादेश में 12 फरवरी को ऐतिहासिक आम चुनाव हुआ. यह उस बड़े छात्र आंदोलन के बाद का पहला चुनाव रहा, जिसने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को इस्तीफा देने और देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया था. डेढ़ साल पहले बांग्लादेश की सड़कों पर हुए भारी प्रदर्शन और वहां की यूनिवर्सिटीज में हुई हिंसा के बाद ‘नेशनल सिटिजन पार्टी’ के रूप एक नई राजनीतिक ताकत उभरी. यह पार्टी उन छात्र नेताओं ने बनाई है, जिन्होंने शेख हसीना के 16 साल लंबे शासन को खत्म करने में अहम भूमिका निभाई थी. छात्रों की यह पार्टी भी इस बार के आम चुनाव में उतरी स्मरण रहे जुलाई 2024 में बांग्लादेश में छात्र आन्दोलन शुरू शुरू हुआ था. शुरुआत में छात्र सरकारी नौकरियों में भेदभाव वाले आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे. यह मुद्दा लंबे समय से छात्रों और युवाओं में नाराजगी का कारण था. लेकिन धीरे-धीरे यह आंदोलन भ्रष्टाचार, दमन और निष्पक्ष चुनाव न होने के खिलाफ एक बड़े विद्रोह में बदल गया. शेख हसीना सरकार ने इसका जवाब बहुत सख्ती से दिया. पुलिस, अर्धसैनिक बलों और सत्ताधारी पार्टी के छात्र संगठन ने प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की. कर्फ्यू लगाया गया और सेना सड़कों पर उतारी गई. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, इसमें करीब 1,400 लोग मारे गए, जिनमें ज्यादातर कॉलेज स्टूडेंड और युवा थे.शेख हसीना के निर्देश पर जब पुलिस कार्रवाई कर रही थी तब गोलीबारी और घायल प्रदर्शनकारियों के वीडियो सोशल मीडिया पर फैल गए. कुछ ही हफ्तों में यह आंदोलन पूरे बांग्लादेश में फैल गया. हिंसा बढ़ती गई, युवाओं का आंदोलन उग्र होता गया. आखिर में 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना ने इस्तीफा दिया और भारत पलायन कर गईं. नवंबर 2025 में बांग्लादेश की एक अदालत ने उन्हें मानवता के खिलाफ अपराध के मामले में मौत की सजा सुनाई.हसीना के बांग्लादेश छोड़ने के बाद, नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार बनी!

  

छात्र आंदोलन के कई नेता इसमें सलाहकार बने. यूनुस सरकार ने चुनाव आयोग, न्यायपालिका, पुलिस, प्रशासन और भ्रष्टाचार विरोधी संस्थाओं में बड़े सुधार का वादा किया. हालांकि यह सरकार हिंसा को रोकने में नाकामयाब रही. बांग्लादेश में कट्टरपंथी तत्वों की ताकत बढ़ती गई. अल्पसंख्यकों (खासकर हिंदुओं) और महिलाओं के खिलाफ उन्होंने हिंसा को बढ़ाने का काम किया. बहरहाल जिस छात्र आंदोलन से बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन हो गया, उस आन्दोलन के नेता नाहिद इस्लाम ने ही नेशनल सिटिजन पार्टी(एनसीपी) बनाई. एनसीपी खुद को भ्रष्टाचार और तानाशाही के खिलाफ एक नया विकल्प बताते हुए 2026 के संसदीय चुनाव में उतरी है. पार्टी ने युवाओं को रोजगार, हिंसा के पीड़ितों को न्याय और संस्थागत सुधार जैसे मुद्दे उठाए हैं. उसने मतदान की उम्र 18 से घटाकर 16 साल करने की बात भी कही. हालांकि चुनाव पास आने पर पार्टी को संगठन, अनुभव और पैसों की कमी का सामना करना पड़ा है. इसके बाद उसने जमात-ए-इस्लामी के साथ चुनावी गठबंधन किया, जिससे छात्र आंदोलन में गहरी फूट पड़ गई. कई महिला नेताओं ने इस्तीफा दे दिया और कहा कि उन्हें नजरअंदाज किया गया.खैर , इन पंक्तियों के लिखे जाने के दौरान बांग्लादेश चुनाव के परिणाम आने लगे हैं. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी(बीएनपी) ने बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है. खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान बांग्लादेश के अगले प्रधानमन्त्री होंगे.वह 35 साल बाद बांग्लादेश के प्रधानमंत्री बनने वाले पहले पुरुष पीएम होंगे. उन्होंने सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया है! जहाँ तक नेशनल सिटीजेन पार्टी का सवाल है, इसके नेता नाहिद इस्लाम चुनाव जीत गए हैं,पर पार्टी को प्रत्याशित सफलता नहीं मिली है: अभी तक एनसीपी के 6 सीटों पर जीत की ख़बरें आ रही हैं. लेकिन छात्रों के आन्दोलन से निकली एनसीपी को बांग्लादेश के 300 सीटों वाली संसद में प्रत्याशित सफलता न मिलने के बावजूद यह तय है कि संसद में उसकी आवाज गूंजेगी और आवश्यक सुधार करके भविष्य में यह पार्टी एक विकल्प के रूप में उभर सकती है! 

बहरहाल बांग्लादेश के संसदीय चुनाव में कुछ निराशजनक परिणाम देने के बावजूद भारत में आन्दोलनरत बहुजन छात्र- गुरुजनों को नाहिद इस्लाम की पार्टी से प्रेरणा लेते हुए बहुजनों को बुरी तरह निराश कर चुके बहुजनवादी नेताओं और दलों का विकल्प बनने के लिए सामने आना चाहिए! बहुजनवादी दलों का विकल्प बनने की जरुरत का अहसास कराते हुए मौजूदा छात्र आन्दोलन पर 5 फरवरी को मैंने जो लेख लिखा था , उसमें विस्तार से बताया था कि जिस भाजपा का पितृ संगठन आरएसएस है, उसका जन्मकाल से चरम लक्ष्य हिन्दू राष्ट्र की घोषणा रहा है, ताकि उसमे कर्म आधारित वर्ण- व्यवस्था लागू कर शक्ति के समस्त स्रोत हिन्दू ईश्वर के उत्तमांग से जन्मे(ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों) के मध्य वितरित किया जा सके. पिछले ग्यारह सालों में संघ अपने राजनीतिक संगठन भाजपा के जरिये शक्ति के प्रायः 80-90 प्रतिशत स्रोत अपने चहेते वर्ग अर्थात सवर्णों के हाथों देने में सफल हो गया है, जिसका साक्ष्य वहन करती है मई , 2024 में आई ‘वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब- 2024’ की रिपोर्ट! उस रिपोर्ट में यह तथ्य उभर कर सामने आया था कि देश की संपत्ति में 89% हिस्सेदारी सामान्य वर्ग अर्थात सवर्णों की है , जबकि दलित-आदिवासी समुदायों की हिस्सेदारी मात्र 2.6 %. है, वहीं भारत के विशालतम समुदाय ओबीसी की देश की धन- संपदा में महज 9 % की हिस्सेदारी है. आज यदि कोई गौर से देखे तो पता चलेगा कि पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमें 80-90 प्रतिशत फ्लैट्स संघ के चहेते सवर्ण वर्ग के नजर आएंगे . मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉलों में 80-90 प्रतिशत दूकानें इन्हीं की है. चार से आठ-आठ लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है, उनमें 90 प्रतिशत से ज्यादे गाड़ियां इन्हीं की होती हैं. देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल प्राय इन्ही के हैं. फिल्म और मनोरंजन पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा इन्ही का है. संसद, विधानसभाओं में वंचित वर्गों के जनप्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो, किन्तु मंत्रिमंडलों में दबदबा इन्हीं का है. मंत्रिमंडलों में लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्हीं वर्गों से हैं. न्यायिक सेवा, शासन प्रशासन, उद्योग-व्यापार, फिल्म-मीडिया, धर्म और ज्ञान क्षेत्र में भारत के अपर कास्ट जैसा दबदबा आज की तारीख में दुनिया में कहीं नहीं है. संघ के इसी चहेते वर्ग का कॉलेज/ यूनिवर्सिटियों के प्रशासनिक पदों, प्रोफ़ेसर और एसोसिएट प्रोफेसरों के पदों पर 80-90 % कब्ज़ा है. मोदी की नीतियों से शक्ति के स्रोतों पर जिसकी स्थिति दलित, आदिवासी, पिछडो एवं अल्पसंख्यकों से भी बदतर हुई है, वह है भारत की आधा आबादी, जिसकी संख्या 70 करोड़ है. 2006 से वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम की ओर से हर वर्ष प्रकाशित हो रही ग्लोबल जेंडर गैप की 2021 की रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत के आधी आबादी की स्थिति हमारे प्रतिवेशी मुल्कों बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, चीन, म्यांमार,पकिस्तान इत्यादि से तो बदतर है ही, उसे आर्थिक रूप से भारत के पुरुषों की बराबरी में आने में 250 साल से ज्यादे लगना है. तो सारांश में देखा जाय तो साफ़ नजर आएगा कि आज के भारत में दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यक और आधी आबादी जितने न्यूनतम शक्ति के स्रोतों पर गुक्जर-बसर करने के लिए विवश है, उससे बहुत बेहतर स्थिति उन देशों के अवाम की नहीं रही, जहां अतीत में स्वाधीनता संग्राम संगठित हुए!

कुल मिलाकर आज दलित, आदिवासी ,पिछड़ों, अल्पसंख्यकों एवं आधी आबादी से युक्त 90 % से अधिक आबादी को उस स्टेज में जीना पड़ रहा है, जिस स्टेज में सारी दुनिया में वंचितों को शक्ति के स्रोतों में उनका वाजिब हक़ दिलाने के लिए आजादी की लड़ाई लड़नी पड़ी. लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि वंचित समुदायों के नेता अपने समाज की गुलामी और बदहाली से आँखे मूंदे राजनीति के पेशे के जोर से स्थापित अपना- अपना साम्राज्य बचाने में व्यस्त हैं. ऐसे में 90% से अधिक वंचित आबादी की मुक्ति का भार बहुजन छात्र और गुरुजनों पर आन पड़ा है! वर्तमान में बहुजन नेतृत्व ने अपने निकम्मेपन से यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन की बहाली के लिए आन्दोलनरत छात्र और गुरुजनों के समक्ष एक सुनहला अवसर दे दिए हैं . दुनिया में छात्र और शिक्षकों को राजनीतिक विकल्प बनने का ऐसा अवसर इतिहास ने शायद ही किसी देश के छात्र- शिक्षकों को दिया होगा.इसे समझने के लिए थोड़ा इतिहास में जाना होगा! इतिहास गवाह है कि जब भी छात्र शक्ति ने किसी बड़े आंदोलन को जन्म दिया या किसी घटना विशेष पर तीखा रुख इख्तियार किया तो देश और समाज में सकारात्मक परिवर्तन हुए और उस आन्दोलन के गर्भ से बड़ी – राजनीतिक शख्सियतों का उदय हुआ. छात्र आन्दोलन से निकल कर ही पूर्व राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन, पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह और चंद्रशेखर जैसे नेताओं ने राष्ट्रीय राजनीति मे महत्वपूर्ण जगह बनाया. छात्र राजनीति के ही जठर से ही निकल कर राम विलास पासवान, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव . ममता बनर्जी, अशोक गहलोत, प्रफुल्ल कुमार महंत, शरद यादव, सुशील मोदी, अमित शाह, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, रविशंकर प्रसाद, सीताराम येचुरी, प्रकाश करात, डी. राजा, सतपाल मलिक, सीपी जोशी, मनोज सिन्हा, विजय गोयल, विजेंद्र गुप्ता, अनुराग ठाकुर, देवेंद्र फडनवीस, सर्वानंद सोनोवाल इत्यादि ने भारतीय राजनीति में अपनी बड़ी उपस्थिति दर्ज कराया. लेकिन भारतीय राजनीति में जगह बनाने वाले इन महानायकों ने जिन हालातों में छात्र आन्दोलन से जुड़कर इतिहास के पन्नो में जगह बनाया, वे हालात तुलनामूलक रूप से आज जैसे कठिन नहीं रहे! आज हिन्दुत्ववादी मोदी सरकार से आर्थिक और सामाजिक विषमता तथा अत्याचार और अनाचार जिस स्तर पर पहुँच गया है और जिस तरह वंचित वर्गों के नेता उसकी अनदेखी कर रहे हैं, उससे बड़े सामाजिक परिवर्तनकारी छात्र आन्दोलन की अभूतपूर्व जमीन तैयार हो गई है. ऐसे में यूजीसी के इक्विटी रेगुलेशन के समर्थन में उतरे बहुजन छात्र और शिक्षक यदि सम्यक निर्णय लेते हुए निर्णायक लड़ाई जीतने में सफल हो जाते हैं तो इक्कीसवीं में भूरि-भूरि राम विलास पासवानों, नितीश कुमारों ,लालू यादवों का उदय हो सकता है. इसके लिए जरुरी है कि वे बांग्लादेश के नाहिद इस्लामों से भी प्रेरणा लें ! 

(लेखक डाइवर्सिटी फॉर इक्वालिटी ट्रस्ट के संस्थापक अध्यक्ष हैं. )

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