Manu Smriti Dahan News 1927: कैसे रुके मनुस्मृति की वापसी

Manu Smriti Dahan News 1927 : 25 दिसंबर  1927 में आज ही के दिन बाबा साहेब ने अपने हजारों अनुयायियों के साथ मनुस्मृति-दहन जैसा ऐतिहासिक काम अंजाम दिया था।

लेखक: एचएल दुसाध 

न्यूज इंप्रेशन 

Delhi: आज 25 दिसंबर है : क्षमा के अवतार ईसा मसीह का अवतरण और बहुजनों को हजारों साल से शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत कर मानवेत्तर बनाने वाली मनुस्मृति का दहन दिवस है. 1927 में आज ही के दिन बाबा साहेब ने अपने हजारों अनुयायियों के साथ मनुस्मृति-दहन जैसा ऐतिहासिक काम अंजाम दिया था, जिससे प्रेरित होकर आंबेडकरवादी आज के दिन मनुस्मृति दहन का अनुष्ठान करने लगे हैं. वैसे तो इसका चलन मान्यवर कांशीराम के सांस्कृतिक आन्दोलनों के असर से जोर पकड़ा, किन्तु शिखर पर पहुंचा पिछले एक दशक से. आज के दिन सोशल मीडिया मनुस्मृति दिवस की सूचनाओं से पट जाती थी, किन्तु भारी विस्मय की बात है कि विगत वर्षों की तुलना में इस बार सोशल मीडिया पर सन्नाटा जैसी स्थिति है.क्या आंबेडकरवादियों को लगने लगा है कि मनुस्मृति- दहन मनुस्मृति की राह रुद्ध करने में उतना कारगर नहीं साबित हुआ और मनुस्मृति की वापसी के लक्षण स्पष्ट होने लगे हैं. बहरहाल मनुस्मृति की वापसी पर विस्तार से चर्चा करने के पहले उस दिन को एक बार फिर याद कर लिया जाय, जब बाबा साहेब ने मानव जाति के इतिहास के सबसे अमानवीय धार्मिक ग्रन्थ का दहन किया था.इसका बड़ा जीवंत वर्णन बाबासाहेब के जीवनीकार धनंजय कीर ने अपनी पुस्तक,’ डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर: जीवन- चरित’ के पृष्ठ 96–102 पर किया है! उन्होंने लिखा है -: 

’1927: दिसंबर का सर्द मौसम.क्षमा के अवतार क्राइस्ट के जन्मदिन के उपलक्ष में आनंदोत्सव के झिलमिलाते परिधानों से सज उठी थी धरती. विश्व धर्म के उत्सव का था वह विशेष दिन. मानवता की जय ध्वनि का बज रहा था मंगल घंटा, लाखों गिरजाघरों में. उसी बड़े दिन को अम्बा नामक जहाज़ से 12.30 पहुचे थे डॉ.आंबेडकर दसगांव, अपने अनुयायियों के साथ. दसगांव से मात्र 5 मील दूरी पर था महाद. 3250 सत्याग्रही पांच-पांच की कतारों में रास्ते से ‘हर हर महादेव’, ’महाद सत्याग्रह की जय’ ,’बाबासाहेब आंबेडकर की जय’जैसी गगनभेदी घोषणाएँ करते और समर गीत गाते हुए महाद को निकले. अग्रभाग में जुलूस के आगे पुलिस थी. दोपहर 2.30 वह जुलूस परिषद के स्थान पर पहुंचा. आंबेडकर जिलाधिकारी से मिले. वहां से वे परिषद के मंडप की ओर गए. मंडप के स्तंभों पर सुवचन, संतवचन, कहावतें और उद्घोष वचन के फलक झलक रहे थे. पूरे मंडप में एक ही फोटो था,वह था गाँधी का! सायंकाल 4.30 बजे परिषद का कामकाज शुरू हुआ .शुभसंदेश पढ़ा गया.बाद में तालियों की गड़गड़ाहट, घोषणाओं और जयघोष की गर्जनाओं के बीच आंबेडकर अपना अध्यक्षीय भाषण करने खड़े हुए. आठ दस हज़ार श्रोताओं में से बहुत से लोगों की पीठ नंगी थी. उनके दाढ़ी के केश बढे हुए थे. गरीब लेकिन होशियार दिखाई देनेवाली महिलाओं का समूह बड़ी उत्सुकता और अभिमान से आंबेडकर की ओर देख रहा था.  सबके चेहरे उत्साह और आशा से खिल उठे थे. नेता के हाथ उठते ही मंडप में शांति छा गयी!आंबेडकर ने अपना भाषण शांति और गंभीरता से आरंभ किया.उन्होंने कहा, ’महाद का तालाब सार्वजनिक है.महाद के स्पृश्य इतने समझदार हैं कि न सिर्फ वे खुद इसका पानी लेते हैं बल्कि किसी भी धर्म के व्यक्ति को इस इसका पानी भरने के लिए इज़ाज़त देते हैं. इसके अनुसार मुसलमान और विधर्मी लोग इस तालाब का पानी लेते हैं. मानव योनि से भी निम्न मानी गई पशु-पक्षियों की योनि के जीव-जंतु भी उस तालाब पर पानी पीते हैं तो वे शिकायत नहीं करते. किन्तु महाद के स्पृश्य लोग अस्पृश्यों को चवदार तालाब का पानी नहीं पीने देते, इसका कारण यह नहीं कि अस्पृश्यों के स्पर्श से वह गन्दा हो जायेगा या भाप बनकर उड़ जायेगा; बल्कि इसलिए अस्पृश्यों को पानी नहीं पीने देते कि शास्त्र ने जो असमान जातियां निर्धारित की है, उन्हें अपने तालाब का पानी पीने देकर उन जातियों को अपने समान स्वीकार करने की उनकी इच्छा नहीं है. ऐसी कोई बात नहीं है कि चवदार तालाब का पानी पीने से हम अमर हो जायेंगे.आज तक चवदार का पानी नहीं पिया था,तो भी तुम हम मरे नहीं हैं. यह साबित करने के लिए ही हमें उस तालाब पर जाना है कि अन्य लोगों की भांति हम भी मनुष्य हैं! हमारी यह सभा अभूतपूर्व है. यह सभा समता की नीव डालने के लिए बुलाई गई है.आज की अपनी सभा और फ़्रांस के वर्साय की 5 मई, 1759 में आयोजित फ्रेंच लोगों की क्रन्तिकारी राष्ट्रीय सभा में भारी समानता है. फ्रेंच लोगों की वह सभा फ्रेंच समाज का संगठन करने के लिए बुलाई गई थी. हमारी यह सभा हिंदू समाज का संगठन करने के लिए बुलाई गई है. फ्रेंच राष्ट्रीय महासभा ने जो जाहिरनामा निकाला, उसने केवल फ़्रांस में ही क्रांति नहीं की, बल्कि सारे विश्व में की. राजनीति का अंतिम उद्देश्य यही है कि ये जन्मसिद्ध मानवीय अधिकार कायम रहे कि सभी लोग जन्मतः समान स्तर के हैं और मरने तक समान स्तर के रहते हैं. हिंदू लोग हमें अस्पृश्य मानते और नीच समझते हैं इसलिए सरकार अपनी नौकरी में हमें प्रवेश नहीं दे सकती. साथ अस्पृश्यता की वजह से अपने हाथ की बनी हुई चीजें कोई नहीं लेगा, इसलिए खुले आम हम धंधा नहीं कर पाते. इसलिए यदि हिंदू समाज को शक्तिशाली बनाना है तो चातुर्वर्ण्य और असमानता का उच्चाटन कर हिंदू समाज की रचना एक वर्ण और समता– इन दो तत्वों की नीव पर करनी चाहिए. अस्पृश्यता के निवारण का मार्ग हिंदू समाज को मजबूत करने से अलग नहीं है.इसलिए मैं कहता हूँ अब हमारा कार्य जितना स्वहित का है, उतना ही राष्ट्र हित का, इसमें कोई संदेह नहीं.’ बाद में परिषद में अलग-अलग कई प्रस्ताव पास किये गए जिनमें एक प्रस्ताव ‘मनुस्मृति’ के दहन का था. यह प्रस्ताव पास होने के बाद क्रिसमस की रात नौ बजे शूद्रातिशुद्रों और महिलाओं का अपमान करनेवाली, उनकी प्रगति में अवरोध डालने वाली, उनका आत्मबल नष्ट करने वाली तथा उन्हें शक्ति के तमाम स्रोतों-आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षिक, धार्मिक-सांस्कृतिक-से वंचित व वहिष्कृत करने वाली मनुस्मृति को जला दिया गया. धार्मिक ग्रन्थ पर हुआ यह भयंकर हमला भले ही अभिनव भारत में हुआ पहला हमला न हो; फिर भी यह कहना चाहिए कि वह अपूर्व था. 1926 में मद्रास प्रान्त में ब्राह्मणेतर पक्ष ने मनुस्मृति जला दी थी. परन्तु अस्पृश्य भी उसे जला दें, यह उस युग की दृष्टि से बड़ा वैशिष्ट्य ही कहना चाहिए. मनुस्मृति के दहन से भारत के तथाकथित पंडित, आचार्य और शंकराचार्यों को सदमा पहुंचा. कुछ लोग डर गए और कुछ खामोश हो गए. इस घटना के महत्त्व का वर्णन करते हुए कीर ने ‘डॉ.बाबा साहब आंबेडकर:जीवन चरित्र’ के पृष्ठ 100 पर लिखा है –‘मार्टिन लूथर के समय के बाद इतना बड़ा मूर्तिभंजक हमला अहंकारी परम्परावादियों पर किसी ने नहीं किया था. इसलिए भारत के इतिहास में 25 दिसंबर, 1927 का दिन एक अत्यंत संस्मरणीय दिन कहा जायेगा.उस दिन आंबेडकर ने पुरानी स्मृति जलाकर हिंदुओं की सामाजिक पुनर्रचना के लिए उपयुक्त नई स्मृति की मांग की. इस तरह महाद हिंदू मार्टिन लूथर का विटेनबर्ग सिद्ध हुआ.’

यह भारत के इतिहास का विचित्र संयोग कहा जायेगा कि जिस शख्स ने 1927 के 25 दिसंबर को हिन्दुओं का सदियों पुराना संविधान, मनुस्मृति को जला कर भष्म कर दिया था, वही शख्स लगभग बीस वर्ष बाद न सिर्फ स्वाधीन भारत का पहला विधि-मंत्री बना बल्कि नए भारत ने उसी के हाथों में थमा दिया था कलम,काला कानून मनुस्मृति का शून्य स्थान भरने के लिए.बहरहाल नए भारत ने जिस आधुनिक मनु को नयी स्मृति रचने का जिम्मा सौंपा था उसका निर्वहन उन्होंने नायकोचित अंदाज में किया . महामुनि मनु ने अपनी सदियों पुरानी स्मृति के जरिये भारतवर्ष को जिस न्याय,स्वाधनीता,समानता और भ्रातृत्व से शून्य रखा था,आधुनिक मनु आंबेडकर ने संविधान के जरिये उसे भरने का प्रयास किया.उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14, 15(4), 16(4), 17, 24, 25(2), 29(1), 38(1), 38(2), 39, 46, 164(1), 244, 257(1), 320(4), 330, 332, 334, 335, 338, 340, 341, 342, 350, 371 इत्यादि के प्रावधानों के जरिये मनुस्मृति सृष्ट विषमताओं को दूर कर एक समतामूलक आदर्श समाज निर्माण का सबल प्रयास किया. किन्तु  मनुस्मृति के सुविधाभोगी वर्ग के शासकों ने संविधान निर्माता के प्रयासों को व्यर्थ ही कर दिया. लेकिन  ढेरों कमियों और सवालों के बावजूद आजाद  भारत का शासक वर्ग आजादी के वादों के दबाव में संविधान के प्रति कुछ – कुछ सम्मान प्रदर्शित  करते हुए मनुस्मृति सृष्ट विषमताओं को दूर करने में जुटा रहा . किन्तु 7 अगस्त, 1990 को जब मंडल की रिपोर्ट के जरिये आरक्षण का विस्तार हुआ, मनुवादी शासकों की मनुस्मृति द्वारा शोषित निष्पेषित किये गए शुद्रातिशुद्रों के प्रति करुणा, शत्रुता में बदल गयी और वे मनुस्मृति की जगह लेने वाले भारत के संविधान को व्यर्थ करने में जूनून की हद तक जुट गए. भारत को नए सिरे से मनुस्मृति की राह पर ठेलने के लिए सबसे पहले प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने 24 जुलाई , 1991 को अंगीकार किया नवउदारवादी अर्थनीति, जिसे आगे बढाने में उनके बाद अटल बिहारी वाजपेयी  ने भी कोई कमी नहीं की. किन्तु, इस मामले में किसी ने सबको बौना बनाया तो वह रहे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी! जिस नवउदारवादी नीति की शुरुआत नरसिंह राव ने किया उसे भयानक हथियार के रूप इस्तेमाल किया प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने! मोदी ने जूनून के साथ वर्ग-संघर्ष का इकतरफा खेल खेलते हुए निजीकरण,विनिवेशीकरण और लैटरल इंट्री के जरिये सारा कुछ जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग के देने का अभियान चलाया, उसके फलस्वरूप सुविधाभोगी वर्ग का मनुस्मृति के स्वर्णिम काल की भांति शक्ति के तमाम स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक,धार्मिक इत्यादि – पर 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा हो गया है. आज की तारीख में दुनिया के किसी भी देश में भारत के परम्परागत विशेषाधिकारयुक्त व सुविधाभोगी वर्ग का जैसा शक्ति के स्रोतों पर दबदबा नहीं है. मनुस्मृति के सुविधाभोगी वर्ग के दबदबे ने दलित,आदिवासी, पिछड़े और इनसे धर्मान्तरित बहुसंख्य लोगों के समक्ष जैसे विकट हालात पैदा कर दिए हैं , ऐसे ही हालातों में भारत सहित दुनिया के कई देशों में स्वाधीनता संग्राम संगठित हुए! बहरहाल हिन्दुत्ववादी संघ प्रशिक्षित  प्रधानमंत्री मोदी के सौजन्य से भारत प्रायः मनुस्मृति काल में प्रवेश कर गया है और मनुस्मृति का सर्वोत्तम विकल्प आंबेडकर का संविधान अंतिम साँसे लेता प्रतीत हो रहा है. मोदी के प्रयासों से आंबेडकर रचित संविधान अंतिम साँसे ही नहीं ले रहा है, बल्कि हिन्दू राष्ट्र के संविधान के जरिये मनुस्मृति के वापसी की घोषणा भी हो चुकी है! 

बहरहाल डॉ. आंबेडकर ने भले ही 1927 में आज ही के दिन मनुस्मृति दहन कर आजाद भारत में लोगों को सामाजिक, आर्थिक और न्याय सुनिश्चित करने वाला संविधान रचा, लेकिन मनुस्मृति के हिसाब से भारत समाज को परिचालित करने का सपना देखने वाला हिन्दुत्ववादी आरएसएस तब वजूद में आ चुका था. आज संघ प्रशिक्षित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सौजन्य से 2035 तक संघ मनुस्मृति आधारित उस हिन्दू राष्ट्र का संविधान लागू करने जा रहा है, जिसका सपना संघ के संस्थापको ने देखा था. संघ अपने राजनीतिक संगठन भाजपा के जरिये जिस हिन्दू राष्ट्र के सामाजिक- आर्थिक विचार को जमीन पर उतारना चाहता है , उसके संविधान का प्रारूप 2025 के महाकुम्भ में सामने आ चुका है. इसे 12 महीने 12 दिन में 25 विद्वानों ने मिलकर तैयार किया है, जिसके पीछे चारों पीठ के शंकराचचार्यों की सहमति है. 501 पन्नों के इस संविधान की निर्माण समिति में उत्तर भारत के 14 और दक्षिण भारत के 11 विद्वान शामिल किए गए हैं. संविधान निर्माण समिति ने धर्मशास्त्रों के साथ ही रामराज्य, श्रीकृष्ण के राज्य, मनुस्मृति और चाणक्य के अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के बाद हिंदू राष्ट्र के संविधान को तैयार किया है. हिंदू राष्ट्र में संविधान द्वारा हिंदू न्याय व्यवस्था लागू की जाएगी.यह संसार की सबसे प्राचीन न्याय व्यवस्था है.राष्ट्राध्यक्ष के नियंत्रण में मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीश होंगे.कोलेजियम जैसी कोई व्यवस्था नहीं रहेगी. भारतीय गुरुकुलों से निकलने वाले सर्वोच्च विधिवेत्ता ही न्यायाधीश के पद को सुशोभित करेंगे. सभी को त्वरित न्याय सुनिश्चित किया जाएगा. झूठे आरोप लगाने वालों पर भी दंड का विधान होगा. दंड सुधारात्मक होंगे. हिंदू राष्ट्र में प्राचीन वैदिक गुरुकुल प्रणाली को लागू किया जाएगा. अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों को गुरुकुलों में परिवर्तित किया जाएगा और शासकीय धन से संचालित सभी मदरसे बंद किए जाएंगे. मनु और याज्ञवल्क की स्मृतियों का व्यावहारिक उपयोग किया जाएगा. पिता की मृत्यु के उपरांत श्राद्ध करने वाला उत्तराधिकारी होगा. एक पति, एक पत्नी प्रथा चलेगी.हिंदू विधि का अंतिम व सर्वोच्च उद्देश्य वर्णाश्रम व्यवस्था की पुन: स्थापना है. कर्म आधारित वर्ण – व्यवस्था को विधिक रूप दिया जाएगा!

इस वर्ष के शुरुआत में जारी हिन्दू राष्ट्र के संविधान के 2035 तक लागू होने की सम्भावना को देखते हुए कहा जा सकता है कि 1927 में दहन की गई मनुस्मृति आज नए सिरे से प्रभावी होने जा रही है. शायद इस बात को देखते हुए ही आंबेडकरवादियों में मनुस्मृति – दहन के उत्साह में भारी कमी आई है. लेकिन इससे बात नहीं बनेगी. बात तब बनेगी जब बदले ज़माने में मनुस्मृति के चरित्र का आंकलन कर दोगुने उत्साह से इसके खिलाफ सक्रिय हुआ जाय! 

 

मनुस्मृति का दहन करने वालों के साथ यह त्रासदी रही है कि उन्होंने इसे शक्ति के स्रोतों( आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक –धार्मिक )के बंटवारे के रूप में न देखकर उंच-नीच, अन्धविश्वास फ़ैलाने वाली एक सामजिक बुराई के रूप में देखा . जबकि यह मुख्यतः शक्ति के स्रोतों के बंटवारे की व्यवस्था रही, जिसमे शक्ति के समस्त स्रोत कथित हिन्दू ईश्वर के उत्तमांग(मुख-बाहु-जंघे ) से जन्मे उन सवर्ण पुरुषों के हाथों में सौंपने की निर्भूल परिकल्पना की गई, जिनकी संख्या आज की तारीख में बमुश्किल 7.5% है.शेष 92.5 % आबादी ,जिसमे खुद सवर्णों की आधी आबादी भी शामिल है , के लिए शक्ति के स्रोतों का भोग अधर्म बताकर उसे मार्क्सवादीय भाषा में चिरकाल के लिए सर्वस्व-हारा में तब्दील कर दिया गया. डॉ. आंबेडकर ने भारत के संविधान के जरिये मनुस्मृति के वितरणवादी स्वरूप पर अभूतपूर्व हमला कर शक्ति के समस्त स्रोतों में सभी समुदायों के स्त्री- पुरुषों की हिस्सेदारी सुनिश्चित करा दिया. मनुस्मृति समर्थक संघ की कोशिश शक्ति के समस्त स्रोत सवर्ण पुरुषों के हाथ में देने की रही , जिसमे वह सफल हो गया है. इसका साक्ष्य वहां करती है मई, 2024 में प्रकाशित ‘वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब’ की रिपोर्ट, जिसमे बताया गया था कि लगभग 89% धन-दौलत पर अपर कास्ट अर्थात सवर्णों का कब्ज़ा हो गया है, जबकि दलित 2.6 % और पिछड़े 9% धन-दौलत पर जीवन निर्वाह करने के लिए विवश हैं. इसके पहले 2021 की ‘ग्लोबल जेंडर गैप’ की रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत की आधी आबादी को पुरुषों की बराबरी में आने में 257 साल लगेंगे! ये आंकडे सीधे तौर पर बताते हैं कि हिंदुत्ववादी मोदी सरकार की नीतियों से शक्ति के समस्त स्रोत सवर्ण पुरुषों के हाथो में चला गए हैं , जबकि शेष 92 % आबादी उस स्टेज में पहुँच गई है, जिसमे बने रहने का निर्देश मनुस्मृति देती हैं. अतः जैसे डॉ. आंबेडकर ने संविधान के जरिये मनुस्मृति के वितरणवादी स्वरूप पर हमला किया था, वैसे ही 21 वीं सदी में मनुराज को पटखनी देनी है तो शक्ति के समस्त स्रोतों में हिन्दू धर्म के सर्वस्वहारों को वाजिब हिस्सेदारी दिलाने की लड़ाई लड़नी पड़ेगी. अगर मनुस्मृति से भयाक्रांत तबका सही में मनुस्मृति के राज को ध्वस्त करना चाहता है तो उसे निम्न क्षेत्रों में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करवाने की लड़ाई लड़नी होगी. अर्थात निम्न क्षेत्रों में भारत के प्रमुख सामाजिक समूहों- दलित, आदिवासी,पिछड़े , अल्पसंख्यक और सवर्णों- के स्त्री-पुरुषो के संख्यानुपात में बंटवारे की लड़ाई लड़नी होगी. इस लड़ाई में यदि सवर्ण पुरुषों को उनके संख्यानुपात : 7.5 % पर रोक दिया जाय तो मनुस्मृति का सारा अर्थशास्त्र ध्वस्त हो जायेगा, क्योंकि शक्ति के स्रोतों पर उनकी हिस्सेदारी 7.5% तक सिमट जाएगी और उनके हिस्से का अतिरिक्त अवसर सर्वस्वहाराओं में बंटने लगेंगे.इससे समतामूलक भारत समाज अकार लेगा और मनुवादियों के मंसूबों पर पानी फिर जायेगा!             

1-सेना व न्यायालयों सहित सरकारी और निजीक्षेत्र की सभी स्तर की, सभी प्रकार की नौकरियों व धार्मिक प्रतिष्ठानों; 2-सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा दी जानेवाली सभी वस्तुओं की डीलरशिप; 3-सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा की जानेवाली सभी वस्तुओं की खरीदारी;4-सड़क-भवन निर्माण इत्यादि के ठेकों,पार्किंग,परिवहन;5-सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा चलाये जानेवाले छोटे-बड़े स्कूलों, विश्वविद्यालयों, तकनीकि-व्यावसायिक शिक्षण संस्थाओं के संचालन,प्रवेश व अध्यापन; 6-सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा अपनी नीतियों,उत्पादित वस्तुओं इत्यादि के विज्ञापन के मद में खर्च की जानेवाली धनराशि; 7-देश –विदेश की संस्थाओं द्वारा गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीओ) को दी जानेवाली धनराशि; 8-प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मिडिया एवं फिल्म-टीवी के सभी प्रभागों; 9-रेल-राष्ट्रीय मार्गों की खाली पड़ी भूमि सहित तमाम सरकारी और मठों की खली पड़ी जमीन व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए अस्पृश्य-आदिवासियों में वितरित हो एवं 10-ग्राम पंचायत,शहरी निकाय,संसद-विधासभा की सीटों; राज्य एवं केन्द्र की कैबिनेट; विभिन्न मंत्रालयों के कार्यालयों; विधान परिषद-राज्यसभा; राष्ट्रपति, राज्यपाल एवं प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री के कार्यालयों के कार्य बल इत्यादि में! उपरोक्त क्षेत्रों में सामाजिक के साथ लैंगिक विविधता लागू करने पर 1000% दावे के साथ कहा जा सकता है कि मनुस्मृति समर्थक संघ की सारी योजना बिखर जाएगी और मनुस्मृति हमेशा के लिए दम तोड़ देगी!

(लेखक अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (ओबीसी विभाग) के एडवाइजरी कमेटी के सदस्य हैं)

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