Congress Foundation Day: आज इतिहास ने थाली में सजाकर कांग्रेस को दे दिया है आजादी की एक और लड़ाई में उतरने का अवसर !

Congress Foundation Day:कांग्रेस के 141 वें स्थापना दिवस पर दुसाध का संदेश।

एच एल दुसाध 

न्यूज इंप्रेशन 

 Lucknow: मित्रों, कल कांग्रेस पार्टी के 141 वें स्थापना दिवस के अवसर पर लखनऊ के कांग्रेस कार्यालय में एक संगोष्ठी का आयोजन मेरे बेहद अज़ीज़ विद्वान मनीष हिंदवी साहब के द्वारा किया गया था,जिसमें प्रदेश कांग्रेस प्रभारी श्री अविनाश पांडे सर एवं प्रदेश अध्यक्ष श्री अजय राय साहब की विशेष उपस्थित रही ।गोष्ठी में मुख्य वक्ता मेरे जनपद देवरिया के बेहद मुखर लेखक अशोक पांडे रहे। श्री प्रदीप नरवाल साहब तथा कांग्रेस मीडिया विभाग के प्रदेश चेयरमैन सीपी राय साहब के बगल में मैं भी वक्ताओं में उपस्थित रहा। मित्रों, मैं सामान्यतया वैसे आयोजनों में नहीं जाता, जहां मुझे आधे घंटे से कम बात रखने का अवसर मिलता है: ज्यादातर यूनिवर्सिटी हो अन्य कोई संगोष्ठी कम से कम सवा घंटा अवसर देना मेरी जरूरी शर्त रहती है। अब चैनलों पर जाना या संगोष्ठियों में शिरकत करने से तौबा ही कर दिया हूं।क्योंकि जानता हूं तैयारियों के साथ जाओ,पर चैनलों या संगोष्ठियों में उतना मौका नहीं मिलता है कि बात करके संतुष्टि मिले।इसलिए चैनलों और संगोष्ठियों के आयोजकों को कह देता हूं कि मुझे बुलाने से दोनों को घाटा है।यही कारण है कि डेढ़ दो सालों से न तो किसी संगोष्ठी में गया और न चैनलों पर।चैनलों से आठ दस दिन पर अक्सर निवेदन आते रहता है और विनम्रता से ठुकराते रहता हूं। एक बात और है,जितने संगोष्ठियों में अबतक भाग लिया उनमें 90% में दुसाध से बेहतर कोई अपनी बात ही नहीं रख पाया।वह क्षमता आज भी है, पर चूंकि संगोष्ठियों या चैनलों पर बोलने का डाक्यूमेंटेशन नहीं होता इसलिए नहीं जाता और अपनी बात विस्तार से लिखकर संतुष्ट होता हूं। लिखना इसलिए जरूरी लगता है कि जिसे देखो सभी बोलने में होड़ लगाते नजर आ हैं,यहां तक कि यूनिवर्सिटियों के प्रोफेसर भी लिखना छोड़ बोलने के कंप्टीशन में कूद चुके हैं।इसलिए इस शून्यता को भरने के लिए भी लिखना जरूरी रहता है और विस्तार से हर मुद्दे पर लिखता हूं भी! लेकिन मेरा विस्तार से लिखना भी व्हाट्सप युग के पाठकों को बोर करता है। मेरे असंख्य कद्रदान कह चुके हैं कि आप के लिखे का कोई मुकाबला नहीं,पर 10,15 लाइनों में लिखें,इतना बड़ा लेख कोई नहीं पढ़ना चाहता!पर मेरे लिए खुद के साथ न्याय करना जरूरी है,इसलिए सबकी अनदेखी कर विस्तार से लिखने पर जोर देता हूं! कल काग्रेस का स्थापना दिवस था, सोचा था कि 2500 शब्दों में लेख निबटा दूंगा,लेकिन वह खत्म हुआ 3964 शब्दों पर!मुझे पूरा यकीन है कि पूरे देश में स्थापना दिवस पर जितने भी लेख लिखेंगे गए होंगे, मेरे वाले से जरूर कमतर होंगे।क्योंकि जिस मुद्दे पर दुसाध कलम चला देता है,उसको अतिक्रम करने की क्षमता, किसी में ,नहीं,विशेषकर मनुवादियों में तो बिल्कुल ही नहीं!

कल कांग्रेस मुख्यालय में आने की सूचना कांग्रेस मास कम्युनिकेशन के वाइस चेयर मैने मनीष हिंदवी साहब ने व्हाट्सएप पर भेजी थी,पर विशेष आग्रह एआईसीसी ( ओबीसी विभाग) आइडियोलॉजिकल एडवायजरी कमेटी के सदस्य सुरेन्द्र चौधरी साहब की ओर से रहा और मैं निर्दिष्ट समय पर पहुंच भी गया।मुझे उम्मीद नहीं थी कि संगोष्ठी में मुझे भी अपनी बात रखनी होगी। पर, हिंदवी साहब ने अचानक मुझे भी मंच पर आने का अनुरोध किया और मैं चला भी गया। इसके लिए अशेष आभार हिंदवी साहब को! कल की संगोष्ठी का माहौल दूसरा था: गंभीर अकादमिक चर्चा के बजाय कांग्रेस ने अपनी स्थापना के बाद कैसे आजादी के आंदोलन को अंजाम पर पहुंचाया और आजादी के बाद देश के नवनिर्माण और वंचितों को राष्ट्र की मुख्य धारा में लाने में क्या भूमिका अदा किया,इससे आज के लोगों को प्रेरित करना था! विषय प्रवर्तन के बाद मुख्य वक्ता अशोक पांडेजी को संबोधन के लिए आमंत्रित किया गया और वह 20,25 मिनट तक बोले।उनके बाद एक और विद्वान को माइक थामने का अनुरोध किया गया! मेरी पहले से कोई तैयारी थी नहीं, इसलिए गंभीरता से जल्दी नोट बनाने लगा और हिंदवी साहब ने इसे गौर कर लिया।वह मेरे पास आए और अनुरोध किए चूंकि प्रभारी अविनाश पांडे सर को फ्लाइट पकड़नी है,इसलिए प्लीज सिर्फ 5 मिनट में अपना संदेश दे दीजिएगा।मैं समझ गया,वास्तव में विस्तार से न बोलकर 5,7 मिनट में बात करना वक्त तकाजा है।लिहाजा मुझे अपने पुराने अभ्यास की बजाय सिर्फ पांच मिनट में अपनी बात रखने का चुनौती पूर्ण काम अंजाम देना पड़ा!

नाम लेकर एक एक वक्ताओं के प्रति सम्मान प्रकट करने के बजाय मैने सीधे सम्मानित मंच और राहुल गांधी के उपस्थित बब्बर शेरों को स्थापना दिवस की बधाई देते हुए कहा कि “आप सभी जानते है कि आज ही के थियोसोफिकल सोसाइटी के प्रमुख सदस्य रहे सेवानिवृत अंग्रेज अधिकारी एलेन ओक्टोवियन ह्यूम की पहल पर बम्बई के गोकुलदास संस्कृत कॉलेज मैदान में कांग्रेस की स्थापना हुई थी, जिसमें दादा भाई नौरोजी और दिनेश वाचा समेत कुल 72 संस्थापक सदस्य उपस्थित रहे। कांग्रेस की स्थापना का शुरुआती मकसद ब्रिटिश सरकार से भारतीय नागरिकों के लिए कुछ विशेष सुविधाएं लेनी थी,जो परवर्तीकाल में आजादी की लड़ाई में तब्दील हो गई ,जिसे महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस से शानदार तरीके से अंजाम दिया।यह लड़ाई दुनिया ने तमाम स्वाधीनता आंदोलनों में विशेष जगह बनाई!

आप जानते है आजादी की लड़ाइयां भारत ही नहीं , दुनिया के ढेरों देशों में लड़ी गई हैं।आपने यह जानने का कभी प्रयास किया कि पर, क्या कभी आपने यह जानने का प्रयास किया कबभारत सहित पूरी दुनिया के भिन्न 2 देशों में स्वाधीनता संग्राम क्यों संगठित हुए? आपको बता दूं दुनिया में हर जगह यह संग्राम शक्ति के स्रोतों के असमान बंटवारे को लेकर संगठित हुए।शासक और गुलाम में फर्क यह होता है कि जो शासक होते हैं,उनका शक्ति के समस्त स्रोतों पर एकाधिकार होता है,जबकि गुलाम इससे वंचित व एक्सक्लूड होते हैं। समाज में शक्ति के चार प्रमुख स्रोत होते हैं: आर्थिक,राजनीतिक,शैक्षिक और धार्मिक। अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि दुनिया के अधिकांश क्रांतिकारियों में डॉ आंबेडकर को छोड़कर किसी ने जाना नहीं कि धर्म भी शक्ति का एक स्रोत होता है और इसकी अहमियत आर्थिक शक्ति से जरा भी कम नहीं होती है! अब बताएं अगर दुनिया के शासकों ने अपने 2 देश के गुलामों को शक्ति के स्रोतों में हिस्सेदारी दिया होता,कहीं भी आजादी की जंग की नौबत आती? कल्पना करें अंग्रेजों ने अगर इंडियन लोगों को शक्ति के स्रोतों में वाजिब हिस्सेदारी दिया होता,क्या कांग्रेस को आजादी की लड़ाई में उतरना की जरूरत पड़ती ?

बहरहाल कांग्रेस के आजादी की लड़ाई का मकसद शक्ति के स्रोतों पर कब्जा जमाए विदेशी अंग्रेजों से देश को आजाद कराकर उसे वंचित में वितरित करना था और उसने किया भी।इसका सर्वाधिक लाभ दलित आदिवासियों को मिला।आज आजादी के 78 सालों बाद पीछे मुड़कर देखते हैं तो साफ नजर आता है कि आजादी के बाद देश का जो भी नवनिर्माण और दलित बहुजनों का विकास हुआ है ,उसमें 90% योगदान अकेले कांग्रेस का है। बहरहाल हिंदू धर्म के सर्वस्वहारा दलित आदिवासियों का कांग्रेस राज में डॉ आंबेडकर के संविधान के जरिए डॉक्टर,इंजीनियर, प्रोफेसर, सांसद,विधायक इत्यादि बनना हिंदुत्ववादी संघ को रास नहीं आया क्योंकि इससे हिंदू धर्म की हानि होती है।हिंदू धर्म में शक्ति के स्रोतों के भोग का सिर्फ हिंदू ईश्वर के बेस्ट ऑर्गन मुख,बाहु,जांघें से जन्मे अपर कास्ट के लिए है, ऐसा तमाम धर्मशास्त्र कहते हैं।इसलिए हिंदूवादी संघ पूना पैक्ट के जमाने से शक्ति के स्रोतों का बंटवारा करने क्वाउजर आरक्षण के खात्मे का विरोधी रहा और जब 7 अगस्त,1990 को मण्डल के जरिए आरक्षण का विस्तार हुआ,वह अपने राजनीतिक संगठन भाजपा के जरिए देश में राम मंदिर निर्माण के नाम पर आंदोलन छेड़ दिया और आज उसका प्रतिरोध्य शासन कायम हो गया है! भाजपा ने राजसत्ता का जो इस्तेमाल किया, उसके फलस्वरूप इतिहास ने कांग्रेस के समक्ष थाली में सजा कर एक और आजादी की लड़ाई लड़ने का अवसर दे दिया है। 2024 के मई में आई “वर्ल्ड इनिक्वालिटी लैब” की रिपोर्ट बताई है कि 89% धन दौलत पर अपर कास्ट का कब्जा हो गया है, जबकि दलित आदिवासी 2.6% और पिछड़ों को 9% धन पर सर्वाइव करना पड़ रहा है।भारी अफसोस की बात है कि देश के बुद्धिजीवियों और नेताओं को आधी आबादी की कोई चिंता नहीं।2006 से वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम की ओर से प्रकाशित हो रही ” ग्लोबल जेंडर गैप” रिपोर्ट 2020 से बता रही है कि भारत के आधी आबादी की स्थिति विश्व में सबसे खराब है,उसे आर्थिक दृष्टि से पुरुषों के बराबर आने में 250 से ज्यादे साल लगने हैं। आज मोदी सरकार की नीतियों के फलस्वरू भारत में शक्ति के समस्त स्रोत 7.5% आबादी के स्वामी अपर कास्ट पुरुषों के हाथ में आ चुके हैं और शेष 92.5% आबादी जिस स्थिति में है, उसी स्थिती सारी दुनिया में स्वाधीनता संग्राम संगठित हुए।इसलिए कहता हूं कि आज इतिहास ने थाली में सजाकर कांग्रेस के समक्ष आजादी की एक और लड़ाई में उतरने का अवसर दे दिया है। राहुल गांधी तमाम क्षेत्रों की भांति पॉवर ऑफ स्ट्रक्चर में जितनी आबादी,उतना हक की जो लड़ाई लड़ रहे हैं,वह इसी दूसरी आजादी की लड़ाई का पार्ट है,जिसमें शक्ति के समस्त स्रोतों में 92% वंचित आबादी को उसका वाजिब हक दिला कर आजादी पूर्णता प्राप्त की जा सकती है। आज राहुल गांधी शक्ति के स्रोतों में जितनी आबादी,उतना हक की जो लड़ाई लड़ रहे हैं,सामाजिक अन्याय के खिलाफ ऐसी लड़ाई बाबा साहेब आंबेडकर को छोड़कर भारत में किसी ने नहीं लड़ी।अतः कांग्रेस भाजपा के हिंदू राष्ट्र के विपरीत 92% वंचितों की मुक्ति की दूसरी लड़ाई को अपना एजेंडा घोषित करे.यह लड़ाई लड़ने पर एक अंतराल बाद कांग्रेस की सत्ता और 50 सालों के लिए स्थापित हो जाएगी,ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है!

आखिरी में मैने मनीष हिंदवी साहब को कोट करते हुए कहा कि इन्होंने दुसाध को ठीक पढ़ा है।इनसे पूछ ले कि दुसाध कमसे कम 200 लेख लिखकर बताया है कि भाजपा को हराने जैसा आसान पॉलिटिकल काम दुनिया में कोई नहीं,बशर्ते चुनाव को सामाजिक न्याय और भागीदारी पर ठीक से केंद्रित कर दिया जाय।” मेरी यह बात सुनते ही सभागार तालियों से फट पड़ा।

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