Vande Mataram : वंदे मातरम् के बहाने

Vande Mataram : भाजपा का चरित्र रहा है कि वह कुछ भी करती है, तो यों ही नहीं करती है। उसके पीछे उसका कुछ खास मकसद छिपा हुआ होता है।

 

अलखदेव प्रसाद ‘अचल’

 न्यूज इंप्रेशन 

Bihar: हम सभी ने देखा कि जिस केंद्र की सरकार को इंडिगो विमान की समस्याओं पर, देश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर, वोट चोरी पर, एसआईआर पर उठ रहे सवालों पर बहस करवाकर विपक्षी दलों को संतुष्ट करना चाहिए था, वहां केंद्र की सरकार संसद के दोनों सदनों में वंदे मातरम् पर बहस कार्रवाई। वह भी 10-10 घंटे की। इसके पीछे क्या कारण हो सकता है? भाजपा का चरित्र रहा है कि वह कुछ भी करती है, तो यों ही नहीं करती है। उसके पीछे उसका कुछ खास मकसद छिपा हुआ होता है। 

आखिर भाजपा का जो मातृ संगठन आरएसएस को उस समय के स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं रहा था। इन्हीं लोग थे, जो वंदे मातरम् को नफरत की दृष्टि से देखा करते थे। वंदे मातरम् जैसे शब्दों से दूर भागते थे। आज वंदे मातरम् जैसे शब्दों से इतना प्रेम क्यों उमड़ पड़ा? उसमें भी तब, जब सिर पर पश्चिमी बंगाल में विधानसभा का चुनाव है। जिस तरह से चाहे असम हो, झारखंड हो या बिहार हो, भाजपा को उस समय ही घुसपैठिए याद आते हैं, जब इन राज्यों में विधानसभा का चुनाव आता है। उसके पहले या बाद में घुसपैठिए शब्द ही भूल जाते हैं। यह भाजपा के छल छद्म को समझने के लिए बहुत ही विचारणीय विषय है।

संघ का कोई भी बड़ा नेता जुबान पर वंदे मातरम् लाना मुनासिब नहीं समझा 

वंदे मातरम् के रचयिता बंगाल के बहुत बड़े साहित्यकार बंकिम चंद्र चटर्जी हैं। जिसकी रचना उन्होंने 1875 ईस्वी में की थी। वैसे अगर बात की जाए तो बंकिम चंद चटर्जी जी को उस समय के स्वतंत्रता आंदोलन से कोई खास मतलब नहीं था। क्योंकि वे अंग्रेजी हुकूमत में एक अधिकारी के पद पर थे। वंदे मातरम् को 1896 ईस्वी में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन कोलकाता में इसे गाया भी गया था। फिर भी भाजपा वाले इसे तूल देने में लगे हुए हैं कि वंदे मातरम् के कुछ पैराग्राफ को मुसलमानों को खुश करने के लिए जवाहरलाल नेहरू ने अर्थात् कांग्रेस ने निकाल दिया था। ऐसा कहने के पीछे उनलोगों का मकसद शायद यह होगा कि कांग्रेस से हिंदुओं को नफरत हो जाए कि कांग्रेस मुसलमानों के हिमायती है। उसे हिन्दुओं से कोई मतलब नहीं है। पर स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास के तह में अगर आप जाएंगे, तो यही पाएंगे कि जिस समय भारत माता के वीर सपूत वंदे मातरम् बोल बोलकर फांसी पर लटक रहे थे। वंदे मातरम् का नारा लगाकर लाठियां खा रहे थे। वंदे मातरम् एक ताकत के रूप में उभर कर सामने आ रहा था। यहां के अधिकांश लोगों की जुबान से वंदे मातरम् निकल रहा था, उस समय संघ का कोई भी बड़ा से बड़ा नेता अपनी जुबान पर वंदे मातरम् लाना मुनासिब नहीं समझ रहा था। क्योंकि उन्हें वंदे मातरम् से उन लोगों को नफरत थी। उस समय उनलोग अंग्रेजों की चाटुकारिता करने में लगे हुए थे।

वंदे मातरम् भाजपा के शायद ही सांसदों का मुंह खुला।

सदन में बहस के दौरान जब कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन, आप पार्टी के संजय सिंह, सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव सहित कई विपक्षी नेताओं ने जब आर एस एस और जनसंघ की बखिया उड़लते हुए जब भाजपा के मंत्रियों और सांसदों से सवाल पूछा कि चार अपने बड़े नेताओं का नाम बताओ जिसकी जुबां स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कभी वंदे मातरम् आया हो ? तुमलोग नहीं बता सकते, क्योंकि तुम्हारे लोग, जिन्हें तुमलोग आदर्श मानते हो, उनलोगों ने कभी वंदे मातरम् नहीं बोला,तो भाजपा के लोगों के चेहरे काले पड़ गए। किसी के मुंह से कोई शब्द नहीं निकला । हास्यास्पद तो यह रहा कि जिस समय भाषण के अंत में मलिकार्जुन और संजय सिंह जैसे नेताओं ने जब वंदे मातरम् कहा, तो विपक्ष के सभी नेताओं ने वंदे मातरम् कहा, लेकिन भाजपा के शायद ही सांसदों का मुंह खुला। तो फिर आखिर वंदे मातरम् पर बहस करने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का क्या मंशा रहा होगा? उनका यह मंशा तो नहीं रहा कि वंदे मातरम् पर चर्चा करवाकर आर एस एस का मुंह काला करवा दें ? संघ की बोलती बंद कर दें, ताकि संघ आगे से सरकार पर किसी तरह का दबाव न बनाए। देश के कोने कोने में संघ की फजीहत होती रहे। या फिर सिर पर पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव है। जहां भाजपा वंदे मातरम् के बहाने वोटों का ध्रुवीकरण करना चाहती होगी। बंगाल के हिंदुओं में फूट डालना चाहती होगी कि देखो, हम लोगों को बंकिम चंद चटर्जी साहब से कितना स्नेह है। हम लोग वंदे मातरम् के बहाने बंकिम चंद चटर्जी साहब को याद करना चाहते हैं, वहीं विपक्ष इसको लेकर हमलावर है। बंकिम चंद चटर्जी साहब के प्रति कांग्रेस की नजरिया क्या रही है। ऐसी स्थिति में जब वोटों का ध्रुवीकरण होगा, तो अधिक से अधिक बंगाल में हिंदुओं के वोट हमें मिलेंगे और बंगाल विधानसभा चुनाव में हो सकता है कि सरकार बनाने के लिए हमें बहुमत मिल जाए। 

सिर्फ वोट बटोरने के लिए नाटक है।       

परंतु कितना हास्यास्पद है कि मणिपुर कई महीनों तक जलता रहा, वहां हत्याएं होती रही, बलात्कार होते रहे, मणिपुर में हाय तौबा मचता रहा, चीख चीत्कार सुनाई देती रही,पर मणिपुर न प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जा सके थे और न संसद में उस विषय पर बहस करवा सके थे। वहीं एकाएक वंदे मातरम् कैसे याद आ गया, जो उस पर बहस करवाने की जरूरत पड़ गई? उसमें भी पश्चिमी बंगाल विधानसभा चुनाव के ठीक पहले? जो यह दर्शाता है कि भाजपा आज कोई भी कदम उठाती है, तो उसके केंद्र में होता है वोट की राजनीति। कौन-सा ऐसा काम करना है। कौन-सा ऐसा मुद्दा उछालना है, जिससे वोटों का ध्रुवीकरण हो और हमें अधिक-से-अधिक लाभ प्राप्त हो। भाजपा की इस नीयत को आज आम जनता को समझना बहुत जरूरी हो गया है कि जो राष्ट्र गान का विरोध करती रही, राष्ट्रीय ध्वज का विरोध करती रही, जो महात्मा गांधी का हत्यारा रहा है, उसमें देशभक्ति की भावना आ ही नहीं सकती। अगर वर्तमान सरकार देशभक्ति की बात करती है, तो वह सिर्फ वोट बटोरने के लिए नाटक है।   

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