Bihar News: विपक्ष के हाथ लगा है : 2015 के विधानसभा चुनाव का इतिहास दोहराने का अवसर
Bihar News: दो चरणों मे संपन्न होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टियों की ओर से घोषणापत्र जारी हो चुका और उन के स्टार प्रचारक सब कुछ छोड़कर अपने काम में जुट चुके हैं.
एचएल दुसाध
न्यूज इंप्रेशन
Bihar: बिहार में विधानसभा चुनाव प्रचार तुंग की और अग्रसर है. दो चरणों मे संपन्न होने वाले चुनाव में पार्टियों की ओर से घोषणापत्र जारी हो चुका और उन के स्टार प्रचारक सब कुछ छोड़कर अपने काम में जुट चुके हैं. इस बीच एक ऐसी घटना प्रकाश में आई है, जिसकी तुलना राजनीतिक विश्लेषक संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण समीक्षा संबंधी उस बयान से कर रहे हैं, जो उन्होंने 22 सितम्बर, 2015 को एक साक्षात्कार में जारी किया था. तब उन्होंने अपने साक्षात्कार में कहा था कि देश हित में एक कमेटी बनाई जानी चाहिए, जो आरक्षण पर समीक्षा कर यह बताए कि कौन से क्षेत्र में और कितने समय तक के लिए आरक्षण दिए जाने की जरुरत है! विपक्ष , खासकर लालू प्रसाद यादव ने उनके बयान को आरक्षण के खात्मे से जोड़कर देखा. उसके बाद लालू फुल फॉर्म में आ गए और उन्होंने बिहार के चप्पे- चप्पे तक यह संदेश पहुंचा दिया, ’तुम आरक्षण का खात्मा करना चाहते हो, हम सत्ता में आए तो सभी समुदायों को हर क्षेत्र में संख्यानुपात में आरक्षण देंगे. ’अवश्य ही इसके कुछ माह पहले से वह कहते रहे,’ मंडल ही बनेगा कमंडल की काट. ऐ बिहार के लोगों उठो और अपने वोट के जोर से कमण्डल फोड़ दो!’ भागवत के बयान पर लालू प्रसाद के आह्वान से बिहार विधानसभा चुनाव पूरी तरह सामाजिक न्याय पर केन्द्रित हो गया. ऐसे में, जैसा सभी जानते हैं कि चुनाव सामाजिक न्याय पर केन्द्रित होने से भाजपा हार वरण करने के सिवाय कुछ कर ही नहीं सकती, इसलिए जब 2015 में जब लालू प्रसाद यादव ने चुनाव को सामाजिक न्याय पर केन्द्रित कर कर दिया, मोदी के लोकप्रियता के शिखर पर रहने के बावजूद भाजपा बुरी तरह हारने लिए विवश हुई. मौजूदा बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान 30 अक्तूबर को एक ऐसी घटना प्रकाश में आई है, जिसका विपक्ष यदि 2015 वाले लालू की भांति सद्व्यवहार कर दे तो वह 2025 में भी 2015 वाले बिहार विधानसभा चुनाव का इतिहास दोहरा सकता है !
मोदी सरकार के लेबर पॉलिसी 2025 के ड्राफ्ट में मनुस्मृति का उल्लेख
30 अक्तूबर को पता चला कि केंद्र की मोदी सरकार की ओर से तैयार की गई लेबर पॉलिसी 2025 के ड्राफ्ट में प्राचीन ग्रंथ मनुस्मृति का उल्लेख किया गया है. इसकी जानकारी होते ही राजनीतिक विवाद छिड़ गया. विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे आरएसएस की विचारधारा थोपने का प्रयास बताते हुए तीखा विरोध जताया. ड्राफ्ट में श्रम को धार्मिक कर्तव्य के रूप में वर्णित किया गया है, जहां मनुस्मृति सहित कई ग्रंथों का हवाला देकर मजदूरी निर्धारण और श्रमिक हितों की रक्षा पर जोर दिया गया है. कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि यह कदम संविधान के मूल्यों से भटकाव को दर्शाता है, क्योंकि आरएसएस ने स्वतंत्र भारत के संविधान को मनुस्मृति के आदर्शों से प्रेरित न होने के कारण ही नकारा था! ड्राफ्ट पॉलिसी में श्रम की भारतीय दृष्टि को आर्थिक से आगे नैतिक और पवित्र कर्तव्य के रूप में चित्रित किया गया है. इसमें कहा गया है कि काम केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि धर्म की व्यापक व्यवस्था में योगदान है, जो सामाजिक सद्भाव और समृद्धि को मजबूत करता है. हर श्रमिक चाहे कारीगर हो, किसान हो या औद्योगिक मजदूरको सामाजिक सृजन का अभिन्न अंग माना गया है. प्राचीन ग्रंथों के संदर्भ में मनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति, नारदस्मृति, शुक्रनीति और अर्थशास्त्र का जिक्र है, जो राजधर्म के माध्यम से श्रम शासन के नैतिक आधार को रेखांकित करते हैं. इन ग्रंथों में न्यायपूर्ण मजदूरी, समय पर वेतन भुगतान और शोषण से सुरक्षा पर बल दिया गया है, जो आधुनिक श्रम कानूनों की नींव माने गए हैं! ड्राफ्ट के अनुसार, मनुस्मृति में मजदूरी निर्धारण और श्रमिक हितों की रक्षा के सिद्धांत स्पष्ट हैं, जहां वेतन भुगतान को न्याय का प्रतीक बताया गया है. वहीं, शुक्रनीति में नियोक्ता के कर्तव्य पर जोर देते हुए सुरक्षित और मानवीय कार्य वातावरण सुनिश्चित करने की बात कही गई है. कांग्रेस ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए कहा है कि मनुस्मृति का हवाला आरएसएस की प्रिय परंपरा को प्रतिबिंबित करता है, जो समावेशी समाज के खिलाफ है. जयराम रमेश ने ट्वीट कर सवाल उठाया कि क्या सरकार संविधान को दरकिनार कर प्राचीन ग्रंथों पर आधारित नीतियां बनाएगी? विपक्ष का आरोप है कि यह कदम श्रमिकों के आधुनिक अधिकारों को कमजोर कर सकता है. दूसरी ओर, सरकार समर्थक इसे भारतीय ज्ञान परंपरा को सम्मान देने का प्रयास बता रहे हैं. तमाम राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला बिहार विधानसभा चुनाव को प्रभावित कर सकता है!
लेबर पॉलिसी 2025 के ड्राफ्ट में मनुस्मृति के उल्लेख के पीछे : दो अक्तूबर के बाद आया हिन्दुत्ववादियों के आत्मविश्वास में उछाल
बहरहाल मोदी सरकार के लेबर पॉलिसी 2025 के ड्राफ्ट में जो प्राचीन ग्रंथ ‘मनुस्मृति’ का उल्लेख किया गया, उसे 2 अक्तूबर, 2025 को संघ के सौ साल पूरे होने के बाद हिंदुत्ववादियों के आत्मविश्वास में आए उछाल से जोड़कर देखे जाने की जरुरत है. वास्तव में दो अक्तूबर के बाद हिंदुत्ववादियों को यकीन हो गया है कि जैसी सामाजिक – आर्थिक व्यवस्था का सपना संघ वर्षों से देख रहा था, वह आकार लेने जा रही है इसलिए उनके आत्मविश्वास में भारी उछाल आ गया है. इसके चलते ही अक्तूबर, 2025 में दलितों के खिलाफ अत्याचार की घटनाओं में आश्चर्यजनक इजाफा हुआ, जिसकी चपेट में हरियाणा के वरिष्ठ आईपीएस वाई पूरन कुमार , सीजेआई गवई जैसे उच्च पदों पर आसीन लोग तक आए . इसी आत्मविश्वास के चलते संघ के सौ साल पूरे होने के कुछ दिन बाद यह कहते हुए हरिओम वाल्मीकि की हत्या कर दी गई कि यहां राहुल गांधी नहीं, योगी बाबा का राज चलता है. इसी आत्मविश्वास के चलते सवर्ण वकीलों और संघी नेताओं द्वारा बाबा साहेब पर लगातार हमले किये जा रहे हैं और संविधान निर्माण में उनके अवदानों को नकारा जा रहा है. इसी आत्मविश्वास के चलते अँधा संत राम भद्राचार्य ने कह दिया है कि भारत में रहना है तो जय श्रीराम कहना होगा! दरअसल संघ के सौ साल पूरे होने के बाद से हिंदुत्ववादियों को यकीन हो चला है कि वर्षों पहले संघ से जुड़े महानायकों ने आधुनिक भारत को मनुस्मृति सहित हिन्दू धर्माधारित कानूनों द्वारा परिचालित करने का जो सपना देखा था, इस दशहरा के उसे लागू करने का समय आ चुका है और इसके परीक्षण के लिए शुद्रातिशूद्रों पर अत्याचार सहित आधुनिक संविधान के रूपकार डॉ आंबेडकर के अवदानों को नकारने लगे हैं!
संघ की सामाजिक- आर्थिक सोच को सामने लाने में परहेज किये : संघ- विरोधी
काबिले गौर है कि दुनिया में जितने भी संगठन वजूद में आए हैं, उनके निर्माण के पीछे एक सामाजिक – आर्थिक सोच रही है.यह सोच ही उसके अनुयायियों को सगठन से जोडती है.संघ के निर्माण के पीछे भी एक सामाजिक आर्थिक सोच रही, जिसमें शक्ति के समस्त स्रोत – आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक, धार्मिक – गगन- स्पर्शी मानवीय मर्यादा हिन्दू ईश्वर के उत्तमांग(मुख- बाहू- जंघे ) से जन्में लोगों के हाथों में सौंपना तथा दलित- बहुजनों को अधिकारविहीन मनुष्य प्राणी में तब्दील करना रहा. इस सामाजिक – आर्थिक सोच को जमीन पर उतारने के लिए ही संघ को खड़ा करने वाले नायकों ने भारत में हिन्दू राष्ट्र का सपना देखा था और इसका संचालन मनुस्मृति सहित हिन्दू धर्माधारित विधानों से हो, इसकी कामना किया था. अधिकांश विद्वानों के मुताबिक़ हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा, जिसे हिंदुत्व के रूप में भी जाना है , भारत में एक राजनीतिक विचारधारा है जो हिन्दू धर्म-संस्कृति और पहचान पर आधारित एक राष्ट्र राज्य के स्थापना की वकालत करती है. इसके पीछे की आर्थिक – सामाजिक सोच में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता पर जोर , पारम्परिक मूल्यों का संरक्षण , और एक मजबूत , एकीकृत हिन्दू समुदाय का निर्माण करना है. कुल मिलाकर हिन्दू राष्ट्र के पीछे संघ की परिकल्पना अपनी सामाजिक- आर्थिक सोच को जमीन पर उतारने के लिए हजारों साल पुरानी वर्ण – व्यवस्था को लागू करना रहा है. वर्ण – व्यवस्था के ज़रिये संघ हिन्दू राष्ट्र में अपनी सामाजिक – आर्थिक सोच को जमीन पर उतारना चाहता है, इसका संकेत हिंदुत्व के उत्तोलक सौ साल से अधिक समय से देते रहे हैं. आज से शताधिक वर्ष पूर्व हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को परिभाषित करने वाले विनायक दामोदर सावरकर ने इस बात पर जोर दिया था कि राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था पश्चिम से उधार ली गई अवधारणाओं के बजाय प्राचीन देशी विचारों पर आधारित होनी चाहिए . जाहिर है उन्होंने वर्ण- व्यवस्था आधारित प्राचीन हिन्दू व्यवस्था द्वारा राजनीतिक- आर्थिक व्यवस्था परिचालित करने का निर्देश दिया था . हिन्दू राष्ट्र के अग्रणी विचारक प्रो. बिनॉय कुमार सरकार ने 1920 के आसपास अपनी पुस्तक ‘ बिल्डिंग ऑफ़ हिन्दू राष्ट्र ‘ में हिन्दू राज्य की संरचना और हिन्दू राज्य की सामाजिक – आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था के लिए जो दिशा निर्देश प्रस्तुत किया था , वह कौटिल्य , मनु और शुक्र जैसे विचारकों और महाभारत पर आधारित था. जाहिर है सरकार महोदय ने भी मनुवादी सामाजिक- आर्थिक व्यवस्था की कामना की थी . प्राचीन वर्ण – व्यवस्था द्वारा ही भविष्य के भारत की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था चले , इसके प्रबल पैरोकार ‘ बंच ऑफ़ थॉट्स ‘ के लेखक और आरएसएस के दूसरे प्रमुख एमएस गोलवलकर भी रहे. जिनकी आर्थिक सोच पर भाजपाइयों के गर्व का अंत नहीं है, ‘एकात्म मानववाद’ के रूप में भारतीय जनसंघ और आज की भाजपा के राजनीतिक दर्शन को सामने लाने वाले उस पंडित दींन दयाल उपाध्याय ने सामाजिक- आर्थिक मुक्ति के साधन के रूप में साम्यवाद और पूंजीवाद को अस्वीकार करते कहा था कि हिन्दुओं की आर्थिक मुक्ति, भारतीय संस्कृति और मूल्यों पर आधारित एक न्यायसंगत और आत्मनिर्भर आर्थिक प्रणाली के माध्यम से ही संभव हो सकती है! स्पष्ट है कि पंडित उपाध्याय भी वर्ण- व्यवस्थाधारित सामाजिक- आर्थिक व्यवस्था के हिमायती थे. हिंदुत्व के प्रातः स्मरणीय इन मनीषियों की सोच का प्रतिबिम्बन ही संघ के हिन्दू राष्ट्र की सामाजिक – आर्थिक सोच में हुआ है. भारी अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि बाघा-बाघा संघ विरोधियों ने उसकी सामाजिक आर्थिक सोच को खुलकर सामने लाने में परहेज किया.
संघ की अमानवीय सामजिक- आर्थिक सोच का स्रोत : हिन्दू धर्म
बहरहाल जिस सामजिक- आर्थिक सोच को लेकर संघ की स्थापना हुई थी, उसका क्रियान्वयन सिर्फ कर्म आधारित वर्ण-व्यवस्था के जरिये ही हो सकता था , इसलिए संघ के तमाम नायक कर्म आधारित वर्ण – व्यवस्था की लागू होने की कामना किये. इससे कैसे संघ की इच्छित सामाजिक-आर्थिक सोच को जमीन पर उतारा जा सकता है, इसे समझने के लिए कर्म आधारित वर्ण- व्यवस्था की विशेषता जान लेना जरुरी है. दैवीय सृष्ट वर्ण- व्यवस्था उस हिन्दू धर्म का प्राणाधार है, जिसका संघ अघोषित रूप से ठेकेदार बने बैठा है. जिसे हिन्दू धर्म कहा जाता है , उसका अनुपालन कर्म आधारित वर्ण– व्यवस्था के जरिये होता रहा है. जिस वर्ण- व्यवस्था को संघ हिन्दू राष्ट्र में लागू करना चाहता है, वह वर्ण- व्यवस्था मूलतः शक्ति के स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक , शैक्षिक और धार्मिक – के बंटवारे की व्यवस्था रही. शक्ति के स्रोतों का बंटवारा चार वर्णों- ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्रातिशूद्रों के लिए निर्दिष्ट पेशे/ कर्मों के जरिये किया गया. विभिन्न वर्णों के लिए निदिष्ट कर्म ही उनके धर्म रहे. वर्ण – व्यवस्था में ब्राह्मण का धर्म(कर्म ) अध्ययन- अध्यापन , राज्य संचालन में मंत्रणा- दान और पौरोहित्य रहा. क्षत्रिय का धर्म भूस्वामित्व, सैन्य- वृत्ति एवं राज्य –संचालन रहा , जबकि वैश्य का कर्म(धर्म) पशुपालन एवं व्यवसाय- वाणिज्य रहा. शुद्रातिशूद्रों का धर्म(कर्म) रहा तीन उच्चतर वर्णों(ब्राह्मण- क्षत्रिय और वैश्यों) की निष्काम सेवा. वर्ण- धर्म में पेशों की विचलनशीलता निषिद्ध रही , क्योंकि इससे कर्म- संकरता की सृष्टि होती और कर्म-संकरता धर्मशास्त्रों द्वारा पूरी तरह निषिद्ध रही. कर्म-संकरता की सृष्टि होने पर इहलोक में राजदंड तो परलोक में नरक का सामना करना पड़ता. धर्मशास्त्रों द्वारा पेशे/ कर्मों के विचलनशीलता की निषेधाज्ञा के फलस्वरूप वर्ण- व्यवस्था ने एक आरक्षण–व्यवस्था: हिन्दू आरक्षण व्यवस्था का रूप ले लिया, जिसमें भिन्न- भिन्न वर्णों के निर्दिष्ट पेशे/कर्म, उनके लिए अपरिवर्तित रूप से चिरकाल के लिए आरक्षित होकर रह गए. इस क्रम में हिन्दू आरक्षण में ब्राह्मणों के लिए पौरोहित्य व बौद्धिक पेशे तो क्षत्रियों के लिए भूस्वामित्व , राज्य संचालन और सैन्य-कार्य तो वैश्यों के लिए पशु-पालन व व्यवसाय- वाणिज्य के कार्य चिरकाल के लिए आरक्षित होकर रह गये.हिन्दू आरक्षण में शुद्रातिशूद्रों और आधी आबादी के हिस्से में शक्ति के स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक , धार्मिक–एक कतरा भी नहीं आया: वे चिरकाल के लिए दुनिया के सबसे अशक्त मानव समुदायों में तब्दील होने के लिए अभिशप्त हुए! तो वास्तव में संघ– भाजपा का अभीष्ट अपने आर्थिक-सामाजिक सोच को जमीन पर उतारने के लिए आधुनिक आरक्षण की जगह हिन्दू आरक्षण लागू करना है और आज वह अपने मकसद में काफी हद तक कामयाब होती नजर आ रही है. इसीलिए हिन्दू ईश्वर के उत्तमांग से जन्मे लोगों के आत्मविश्वास में इजाफा हुआ है, जिसके जोर से वे सक्षम दलित , आदिवासी ,पिछड़ों और अल्पसंख्यकों पर जुल्म- जबरदस्ती करने की स्थिति में आ गए है!
तैयार हो गया है संघ की आर्थिक– सामाजिक सोच को अकार देने वाला : संविधान
संघ अपने राजनीतिक संगठन भाजपा के जरिये जिस हिन्दू राष्ट्र के सामाजिक- आर्थिक विचार को जमीन पर उतारना चाहता है , उसके संविधान का प्रारूप 2025 के महाकुम्भ में सामने आ चुका है. इसे 12 महीने 12 दिन में 25 विद्वानों ने मिलकर तैयार किया है, जिसके पीछे चारों पीठ के शंकराचचार्यों की सहमति है. 501 पन्नों के इस संविधान की निर्माण समिति में उत्तर भारत के 14 और दक्षिण भारत के 11 विद्वान शामिल किए गए हैं. संविधान निर्माण समिति ने धर्मशास्त्रों के साथ ही रामराज्य, श्रीकृष्ण के राज्य, मनुस्मृति और चाणक्य के अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के बाद हिंदू राष्ट्र के संविधान को तैयार किया है. संविधान निर्माण समिति में काशी हिंदू विश्वविद्यालय, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के विद्वान भी शामिल रहे. इसके संरक्षक शांभवी पीठाधीश्वर के अनुसार 2035 तक हिंदू राष्ट्र की घोषणा का लक्ष्य रखा गया है. ऐसे में दावे के साथ कहा जा सकता है संघ 2035 से हिन्दू राष्ट के संविधान के जरिये एक ऐसी सामाजिक – आर्थिक सोच को जमीन पर उतारने में मुस्तैद है, जो विश्व इतिहास में कहीं नहीं देखी गई. हिटलर मुसोलिनी जैसे तानाशाह भी ऐसी सोच लेकर आगे नहीं बढे. दुनिया में कौन ऐसा संगठन हुआ जो सिर्फ देश की सिर्फ 7.5% कथित दैवीय अधिकार संपन्न लोगों को शक्ति के स्रोतों सुलभ कराने कराने में सर्वशक्ति लगाता हो; कौन ऐसा संगठन हुआ जो आधी आबादी सहित देश की 92. 5% आबादी को पढने – लिखने , पूजा-पाठ के अधिकार से वंचित करने वाली व्यवस्था का पैरोकार हो! ध्यान रहे संघ जिस उच्च वर्ण के हाथों में शक्ति के समस्त सोत सौंपना चाहता है, उसके दायरे में सवर्ण महिलाएं नहीं आती:आते हैं सिर्फ 7.5 % जनसख्या के स्वामी सवर्ण.दुनिया की खतरनाक सामाजिक- आर्थिक सोच से लैस आरएसएस ने अपनी स्थापना के सौ साल पूरे होते-होते हिन्दू की पहचान का विशेष मानदंड तैयार कर दिया है.संघ प्रशिक्षित मोदी राज में अब हिन्दू होने के लिए गोबर और गोमूत्र का सेवन अनिवार्य होने जा रहा है. बहरहाल 2035 से हिन्दू राष्ट्र का जो संविधान लागू होगा, उसका पूर्वाभ्यास शुरू है. इसी कारण 2025 का अक्तूबर दलित-बहुजनों के लिए दु:स्वप्न बन गया.पूर्वाभ्यास के तौर पर संघ के सामाजिक –अर्हिक सोच को आधार प्रदान करने वाली मनुस्मृति का उल्लेख मोदी सरकार के लेबर पॉलिसी 2025 के ड्राफ्ट में हुआ है !
कैसे करे महागठबंधन लेबर ड्राफ्ट के जरिये मिले अवसर का सद्व्यवहार
बहरहाल मोदी सरकार के लेबर पॉलिसी 2025 के ड्राफ्ट में मनुस्मृति के उल्लेख ने बिहार विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव के नेतृत्व में उतरे महागठबंधन के समक्ष 2015 जैसा एक स्वर्णिम अवसर सुलभ करा दिया है, जिसका सद्व्यवहार कर भाजपा को शिकस्त दिया जा सकता है. इसके लिए जिस तरह लालू यादव 2015 बिहार के चप्पे- चप्पे पर पहुँचकर भागवत के बयान का भंडाफोड़ करने के साथ , दलित,आदिवासी ,पिछड़े और अकलियतों को हर क्षेत्र में संख्यानुपात में आरक्षण देने की बात बताये थे, उसी तरह महागठबंधन के नेताओं को चप्पे- चप्पे पर पहुँच कर बताना होगा कि लेबर ड्राफ्ट पालिसी में मनुस्मृति व अन्य हिन्दू धर्मशास्त्रों के उल्लेख के पीछे भाजपा की मंशा उस आर्थिक-सामाजिक सोच को जमीन पर उतारना है, जिसके जरिये संघ अपने जन्मकाल से शक्ति के समस्त स्रोत 7.5 % संख्या के स्वामी सवर्णों के हाथों में सौंपने का प्रयत्न करता रहा है. देश का दुर्भाग्य है कि संघ विरोधियों ने अबतक उसकी सामाजिक – आर्थिक सोच को सामने लाने का सम्यक प्रयास नहीं किया. इसलिए दलित – बहुँजनों को गुलामों की स्थिति पहुँचाने का सब समय षड्यंत्र रचने वाला संघ उनका समर्थन जितने में सफल रहा है. संघ के सामाजिक – आर्थिक सोच को सामने लाने के साथ यदि महागठबंधन यह घोषणा कर दें कि सत्ता में आने पर हम जातीय जनगणना कराकर शक्ति के स्रोतों पर 70-80 % कब्ज़ा जमायें 7.5% आबादी वाले सवर्ण पुरुषों को अवसरों और संसाधनों के बंटवारे में उनके संख्यानुपात पर रोककर उनके हिस्से का अतिरिक्त(सरप्लस) 65 से 75 % अवसर मोदी द्वारा गुलामों की स्थिति में पहुचाये गए दलित,आदिवासी,पिछड़े,अकलियतों और आधी आबादी के मध्य वितरित करेंगे, स्थिति रातों-रात बदल जाएगी! और विपक्ष 2015 का इतिहास दोहराने में सफल हो जायेगा ! हालांकि अवसर का सद्व्यवहार करने के लिए महागठबंधन के पास लालू के मुकाबले समय कम है, लेकिन यह चाह दे तो टेक्नोलॉजी के जरिये उस कमी पूर्ति की जा सकती है. सवाल पैदा होता है क्या महागठबंधन संघ के आर्थिक- सामाजिक सोच से अवाम को अवगत करने के प्रति इमानदार है!
(लेखक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस(ओबीसी विभाग)के एडवाइजरी कमेटी के सदस्य हैं)
