Jawaharlal Nehru Death Anniversary: संघियों के निशाने पर क्यों रहते है: पंडित जवाहरलाल नेहरु
Jawaharlal Nehru Death Anniversary: क्या संघ के नेहरु विरोध के पीछे महज वैचारिक कारण है या कुछ और ! आज आधुनिक भारत के निर्माता और देश प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु का स्मृति दिवस है.
एचएल दुसाध
न्यूज इंप्रेशन
Delhi: क्या संघ के नेहरु विरोध के पीछे महज वैचारिक कारण है या कुछ और ! आज आधुनिक भारत के निर्माता और देश प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु का स्मृति दिवस है. आज लोग राष्ट्र निर्माण में उनके उनके अवदानों के साथ उन के जीवन के अनछुए पहलुओं की चर्चा करेंगे लेकिन विविध चर्चाओं के मध्य खास चर्चा इस बात की भी होगी क्यों मोदी से लगाए तमाम संघी क्यों उनको बराबर निशाने पर लेते रहते हैं. अब जहां तक मोदी सहित तमाम संघियों दः वारा पंडित नेहरु को निशाने पर लेने का प्रश्न है, अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, नेहरु ‘धर्मनिरपेक्ष ‘प्रधानमंत्री थे. उनके लिए बिना भेदभाव वाला धर्मनिरपेक्षता आस्था का मूलमंत्र तत्ा था. यही उनकी विचारधारा का मूल भी था. उन्होंने यह पूरी तरह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि भारत कभी हिन्दू राष्ट्र; या ‘हिन्दू पाकिस्तान’ न बने. इसके लिए वह हमेशा हिन्दुत्ववादी ताकतों से उलझते रहते थे. उन्हें हाशिये पर डालने, यहाँ तक कि उन्हें बहिष्कृत करने की हर संभव कोशिश करते थे. नाथूराम गोडसे के महात्मा गांधी की हत्ह्मा ने हिन्दू साम्प्रदायिकता को हर मोड़ पर चुनौती देने के उनके संकल्प को और मजबूत कर दिया वो इसे बहुलवादी, बहु- धार्मिक भारत के अपने विचार के बिलकुल विपरीत मानते थे. उस समय आरएसएस के लिए, नेहरु सबसे बड़े ‘शत्रु’ थे, जिनसे वे वैचारिक और राजनीतिक स्तर पर बेहद नफरत करते थे… जहाँ आरएसएस अतीत और प्राचीन हिन्दू धर्मग्रंथों का महिमामंडन करना चाहता है, वहीं नेहरु तर्क और विज्ञान पर आधारित आधुनिक समाज निर्माण करना चाहते थे… संघियों के आदर्श गोलवलकर नेहरु को अपना प्रमुख विरोधी मानते थे. वो उन्हें एक ऐसा व्यक्ति मानते थे, जो हिंदुत्व को लोगों के बीच स्वीकार्यता हासिल करने से रोक रहे थे.’ बहरहाल आम राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा नेहरु विरोध के पीछे जो कारण कारण गिनाये जाते हैं, वे आंशिक रूप से ही सही हैं. पर, असल कारण कुछ और है और वह कारण है भाजपा के पितृ संगठन संघ के हिन्दू राष्ट्र निर्माण के पीछे क्रियाशील आर्थिक और सामाजिक सोच है, जिसकी राह में कांग्रेस और नेहरु ने एवरेस्ट् सरीखा अवरोध खड़ा किया और परवर्तीकाल में उनकी भावी पीढी के इंदिरा – राजीव- सोनिया और राहुल गांधी ने और अवरोध खड़ा कर दिया, जिसे अतिक्रम करना भाजपा के लिए कठिन है. हिन्दू राष्ट्र की राह में नेहरु-गांधी परिवार ने कैसे अवरोध खड़ा कर दिया, इसे समझने के लिए सबसे जरुरी है हिन्दू राष्ट्र निर्माण के पीछे संघ की आर्थिक सामाजिक सोच को जानना, जिसकी मुख्यधारा के राजनीतिक विश्लेषक अज्ञानतावश या इच्छाकृत रूप से अनदेखी करते रहते हैं. हिन्दू राष्ट्र निर्माण के पृष्ठ में क्रियाशील संघ के सामाजिक आर्थिक सोच को जाने बिना का हम समझ ही नहीं सकते कि उसकी राह में नेहरु-गांधी परिवार ने कैसे एवेरेस्ट् सरीखा अवरोध खड़ा कर दिया, जिस कारण भाजपा नेहरु को तो निशाने पर लेती ही है: गांधी- परिवार को नेस्तनाबूद करना चाहिती है!
90% वंचित हिन्दू आबादी के सिर से हिन्दू राष्ट्र का भूत उतारने का अवसर गवां दिए
गैर-भाजपाई बुद्धिजीवी और दल ! काबिले गौर है कि किसी भी राजनीतिक संगठन के निर्माण के पीछे सामाजिक- आर्थिक सोच का होना बहुत जरुरी है. यह सोच संगठन को दिशा देती है, उसकी नीतियों को प्रभावित करती है और उसे समाज में एक मजबूत जगह बनाने में मदद करती है. सारांश में कहा जा सकता है सामाजिक आर्थिक सोच किसी भी राजनीतिक संगठन के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक शक्ति है, जो संगठन को सही दिशा में ले जाती है, उसके लक्ष्यों को निर्धारित करती है: उसे जनता का समर्थन हासिल करने में मदद करती है और उसे स्थिरता प्रदान करती है! संघ भले ही घोषित तौर पर अराजनीतिक संगठन हो, पर उसकी गतिविधियाँ राजनीति से प्रेरित रहीं हैं. राजनीतिक लक्ष्य साधने के लिए ही उसने पहले जनसंघ और बाद में भाजपा को जन्म दिया. जाहिर है उसकी भी सामाजिक-आर्थिक सोच रही, जिसे राजनीतिक विश्लेषकों के साथ गैर-भाजपा दलों ने सामने लाने में नहीं के बराबर रूचि ली. यदि उन्होंने इमानदारी से हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के पीछे सामाजिक आर्थिक सोच को सामने लाने का प्रयास किया होता, तो प्रायः 90 प्रतिशत वंचित हिन्दू आबादी के सिर से हिन्दू राष्ट्र का भूत उतर उतर गया होता! अधिकांश विद्वानों के मुताबिक़ हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा, जिसे हिंदुत्व के रूप में भी जाना, भारत में एक राजनीतिक विचारधारा है जो हिन्दू धर्म-संस्कृति और पहचान पर आधारित एक राष्ट्र राज्य की स्थापना की वकालत करती है. इसके पीछे की आर्थिक सामाजिक सोच में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता पर जोर, पारम्परिक मूल्यों का संरक्षण, और एक मजबूत, एकीकृत हिन्दू समुदाय का निर्माण करना है. कुल मिलाकर हिन्दू राष्ट्र के पीछे क्रियाशील सामाजिक आर्थिक सोच को जमीन पर उतारने के लिए इसका हजारों साल पुरानी वर्ण-व्यवस्था को लागू करना रहा है. वर्ण व्यवस्था के ज़रिये संघ हिन्दू राष्ट्र में अपनी सामाजिक- आर्थिक सोच को जमीन पर उतारना चाहता है, इसका संकेत हिंदुत्व के महानायक सौ साल से अधिक समय से दे रहे हैं. आज से शताधिक वर्ष पूर्व हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को परिभाषित करने वाले विनायक दामोदर सावरकर ने इस बात पर जोर दिया था कि राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था पश्चिम से उधार ली गई अवधारणाओं के बजाय प्राचीन देशी विचारों पर आधारित होनी चाहिए. जाहिर है उन्होंने वर्ण- व्यवस्था आधारित प्राचीन हिन्दू व्यवस्था द्वारा राजनीतिक- आर्थिक व्यवस्था परिचालित करने का निर्देश दिया था. हिन्दू राष्ट्र के अग्रणी विचारक प्रो. बिनॉय कुमार सरकार ने 1920 के आसपास अपनी पुस्तक ‘बिल्डिंग ऑफ़ हिन्दू राष्ट्र’ में हिन्दू राज्य की संरचना और हिन्दू राज्य की सामाजिक आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था के लिए जो दिशा निर्देश प्रस्तुत किया था वह कौटिल्य, मनु और शुक्र जैसे विचारकों और महाभारत पर आधारित था. जाहिर है सरकार महोदय ने भी मनुवादी सामाजिक- आर्थिक व्यवस्था की कामना की थी. प्राचीन वर्ण व्यवस्था द्वारा ही भविष्य के भारत की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था चले, इसके प्रबल पैरोकार ‘बंच ऑफ़ थॉट्स’ के लेखक और आरएसएस के दूसरे प्रमुख एमएस गोलवलकर भी रहे. जिनकी आर्थिक सोच पर भाजपाइयों के गर्व का अंत नहीं है, ‘एकात्म मानववाद’ के रूप में भारतीय जनसंघ और आज की भाजपा के राजनीतिक दर्शन को सामने लाने वाले उस पंडित दींन दयाल उपाध्याय ने सामाजिक आर्थिक मुक्ति के साधन के रूप में साम्पवाद और पूंजीवाद को अस्वीकार करते कहा था कि हिन्दुओं की आर्थिक मुक्ति, भारतीय संस्कृति और मूल्यों पर आधारित एक न्झायसंगत और आत्मनिर्भर आर्थिक प्रणाली के माध्यम से ही संभव हो सकती है! स्पष्ट है कि पंडित उपाध्याय भी वर्ण-व्यवस्थाधारित सामाजिक- आर्थिक व्यवस्था के हिमायती थे. हिंदुत्व के प्रातः स्मरणीय इन मनीषियों की सोच का प्रतिबिम्बन ही संघ के हिन्दू राष्ट्र की सामाजिक आर्थिक सोच में हुआ है. संघ अपने राजनीतिक संगठन भाजपा के जरिये जिस हिन्दू राष्ट्र के सामाजिक आर्थिक विचार को जमीन पर उतारना चाहता है, उसके संविधान का मसौदा 2025 के महाकुम्भ में सामने आ चुका है जिसमें स्पष्ट कहा गया है हिंदू राष्ट्र में कर्म आधारित वर्ण -व्यवस्था को विधिक रूप दिया जाएगा!
नेहरु फेर दिया संघ के मंसूबो पर पानी
वैसे तो वर्षों से आम से लेकर खास लोग यह घोषणा करते रहे हैं कि संघ हिन्दू राष्ट्र में वर्ण व्यवस्था द्वारा अपनी सामाजिक- आर्थिक सोच को जमीन पर उतारना चाहता है पर, महाकुम्भ में हिन्दू राष्ट्र के संविधान का प्रारूप सामने आने के बाद किसी को भी संदेश नहीं रह जाना चाहिए कि वह वह कर्म आधारित वर्ण- व्यवस्था लागू करना चाहता है. आखिर क्यों वह वर्ण व्यवस्था लागू करना चाहता है, इसे जानने के लिए कर्म आधारित वर्ण-व्यवस्था की विशेषता जान लेना जरुरी है. दैवीय सृष्ट वर्ण व्यवस्था उस हिन्दू धर्म का प्राणाधार है, जिसका संघ अघोषित रूप से ठेकेदार बन बैठा है. जिसे हिन्दू धर्म कहा जाता उसका अनुपालन कर्म आधारित वर्ण – व्यवस्था के जरिये होता. जिस वर्ण- व्यवस्था को संघ हिन्दू राष्ट्र में लागू करना चाहता है, वह वर्ण- व्यवस्था मूलतः शक्ति के स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक के बंटवारे की व्यवस्था रही. इसमें शक्ति समस्त स्रोत सिर्फ उच्च वर्ण के पुरुषों के मध्य वितरित हुए और दलित, आदिवासी, पिछडो और आधी आबादी से युक्त 90% वंचित हिन्दू आबादी ही सदियों से शक्ति के स्रोतों से पूरी तरह बहिष्कृत रही. इन 90% वंचित हिन्दुओं के लिए शक्ति के स्रोतों का भोग अधर्म व निषिद्ध रहा. हिन्दू राष्ट्र में इसी वर्ण व्यवस्था के जरिये संघ 90% वंचित हिन्दू आबादी को शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत, सारा कुछ उच्च वर्ण पुरुषों, जिनकी आबादी बमुश्किल 8-9% है, के हाथ में देने का सपना लिए अपनी गतिविधियाँ चलाता रहा है. 90% वंचित हिन्दुओं को शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत करने की साजिश पर नेहरु ने आजाद भारत में अपनी नीतियों से सबसे बड़ा हमला कर, संघियों के मंसूबों पर पानी फेर दिया!
हिन्दू राष्ट्र की विचारधारा के खिलाफ नेहरु का क्रांतिकारी उद्घोष
बहुर्ता का पता नहीं कि सावरकर हेडगेवार- गोलवलकर सहित अन्य असंख्य हिंदुत्ववादी नायकों ने आधुनिक भारत में शुक्र, कौटिल्य, मनु जैसे विचारकों का विधान लागू करने का जो सपना देखा था, उस पर सबसे बड़ा प्रहार करने में भारतीय संविधान के निर्माण के पृष्ठ में नेहरु की विराट भूमिका रही. उन्होंने 13 दिसंबर, 1946 को संविधान सभा में’ उद्देश्य प्रस्ताव’ नाम से जो प्रस्ताव पेश किया वह भारतीय संविधान के मूल सिद्धांतों को निर्धारित करने वाला रहा और बाद में भारत संविधान की प्रस्तावना का आधार बना, जो संविधान के उद्देश्यों और मूल्यों को दर्शाता है. उनका उद्देश्य प्रस्ताव 22 जनवरी, 1947 को सर्वसम्मति से अपनाया गया और 26
नवम्बर, 1949 को संविधान सभा द्वारा अंगीकृत और अधनियमित किया गया.. उसी प्रस्ताव में कहा गया था,’ सभी भारतीयों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक निष्पक्षता; पद और अवसर की समानता, कानून के समक्ष समानता; और अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था, उपासना, व्यवसाय, संघ और कार्य की बुनियादी स्वतंत्रता -कानून और सार्वजानिक नैतिकता के अधीन की गारंटी दी जानी चाहिए.’ नेहरु का यह उद्घोष संघ की मनुवादी सोच के खिलाफ एक क्रन्तिकारी उद्घोष था, जिसे संघी आज तक भूल नहीं पाए है और अपना आक्रोश समय-समय पर जाहिर करते रहते हैं. जवाहरलाल नेहरु ने आधुनिक भारत के निर्माण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने योजना आयोग की स्थापना करनेके साथ, विज्ञानं और प्रौद्योगिकी के विकास को बढ़ावा दिया. भारत के विकास में असाधारण योगदान देने वाली तीन पंच वर्षीय योजनाओं की शुरुआत करने वाले पंडित नेहरु की नीतियों से देश में कृषि और उद्योग के नए युग की शुरुआत हुई, जो वर्ण-व्यवस्था द्वारा सदियों से शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत हिन्दू तबकों के जीवन में बड़ा बदलाव लाने में बुनियादी काम कीं.
इंदिरा – राजीव और सोनिया गांधी बनेः संघ की सामजिक आर्थिक सोच की राह के रोड़े
नेहरु के हिन्दू राष्ट्र विरोधी विचार का अनुसरण नेहरु गांधी परिवार के बाद के लोग भी करते रहे. कुछ कमियों और सवालों के बावजूद इंदिरा गांधी ने वर्ण-व्यवस्था के वंचित हिन्दुओं के जीवन में बदलाव लाने के लिए गरीबी उन्मूलन, सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता वाली नीतियाँ बनाया उनकी नीतियों में भूमि सुधार, राजाओं के प्रिवी पर्स का खात्मा, बैंकों, एलआईसी, खदानों इत्यादि के राष्ट्रीयकरण और 20 सूत्रीय कार्यक्रम से वंचितों के जीवन में बड़े बदलाव आए. उनके सौजन्म से सर्वाधिक वंचित दलित हिन्दुओं को मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज के एडमिशन में आरक्षण मिला और उनमें एक ऐसा मध्य वर्ग उभरा जो साहित्य सृजन के साथ सामाजिक और राजनीतिक संगठनों के निर्माण में भारी अर्थदान कर सका अनिच्छा पूर्वक राजनीति में आए इंदिरा गांधी के योग्य पुत्र राजीव गांधी भी अल्पआयु में निधन के पूर्व ऐसे कुछ काम कर गए, जो संघ की सामाजिक आर्थिक व्यवस्था की राह में बड़ा अवरोध साबित हुआ. 18 साल की उम्र में वोट का अधिकार दिलाने और पंचायती राज अधिनियम के जरिये गावों की आबादी को अपना फैसला खुद करने की आजादी देने वाले राजीव गांधी ने दो ऐसे काम किये जो संघी सामाजिक आर्थिक व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती साबित हुए. पहला, कम्प्यूटर क्रांति ! राजीव गांधी की कम्प्यूटर क्रांति संभवतः भारत की सबसे बड़ी क्रांति है, जिसकी जद में दो वर्ष के बच्चे तक आ गए है. उनकी इस क्रांति का विरोध संघ परिवार सहित अधिकांश दलों ने किया था. उन्होंने जब दिल्ली में एटीएम मशीन लगाई आरएसएस ने भारत बंद का आह्वान कर दिया था. उनकी इस क्रांति ने वर्ण- व्यवस्था से अंधकारमय हुए भारत में सूचना और ज्ञान का आलोक फैला दिया था. अगर उन्होंने यह क्रांति नहीं की होती तो आज भारत के युवा, जिसमें सुविधाभोगी के साथ वंचित हिन्दुओं के युवा भी शामिल हैं किस स्थिति में होते, उसकी कल्पना कर रोंगटे खड़े हो जायेंगे. कम्प्यूटर क्रांति के साथ 1986 की अपनी शिक्षानीति के जरिये अज्ञानता के अंधकार में घिरे गावों की वंचित हिन्दू प्रतिभाओं को सर्वोच्च स्तर की शिक्षा मुहैया कराने के लिए देश भर में जवाहर नवोदय विद्यालयों की जो श्रृंखला खड़ी उससे गुरुकुल शिक्षा के हिमायतियों के होश उड़ गए और वे आज भी उन्हें माफ़ नहीं कर पाए हैं.
प्रधानमंत्री का पद ठुकराने वाली नेहरु- गांधी परिवार की बहू सोनिया गांधी कभी अपनी सास और पति की भांति सत्ता की बागडोर तो नहीं थामीं, किन्तु उनके योग्य मार्गदर्शन में ढेरों ऐसे काम हुए जो हिन्दू राष्ट्रवादियों के लिए भारी पीड़ादायक रहे. सबसे पहले तो उन्होंने धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय के डॉ. मनमोहन सिंह को पीएम बनाकर उन्हें निराश किया. बाद में उसी मनमोहन सिंह ने सोनिया गांधी के मार्गदर्शन में भारतीय अर्थव्यवस्था को उंचाई देने का ऐतिहासिक काम किया उनकी नीतियों से भारत एक विश्व आर्थिक महाशक्ति बना और देश में विशाल मध्यम वर्ग का उदय हुआ, जिसमें वर्ण व्यवस्था के जन्मजात वंचित हिन्दुओं दलित, आदिवासी, पिछड़ों की भी हिस्सेदारी रही. मनमोहन सिंह की उसी अर्थनीति की फसल आज मोदी भी काट रहे हैं. मनरेगा, शिक्षा का अधिकार, स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं इत् यादि के हिन्दू वंचितों के जीवन में सुधार लाने वाले कार्य सोनिया गांधी की ही देखरेख में हुए. उन्हीं की देखरेख में 2006 में उच्च शिक्षा में और 2012 में पिछड़ों को पेट्रोलियम प्रोडक्ट के वितरण में आरक्षण मिला; उन्हीं के दौर में मध्य प्रदेश से डाइवर्सिटी की आइडिया निकली, जिसके फलस्वरूप आज दलित, आदिवासी, पिछड़ों जैसे वंचित हिन्दुओं में नौकरियों से आगे बढ़कर सप्लाई, डीलरशिप, ठेकेदारी, मीडिया इत्यादि में हिस्सेदारी की चाह पैदा हुई, जिसका ऐतिहासिक असर सामने आने लगा है. सोनिया गांधी की देखरेख में ही फरवरी, 2023 में कांग्रेस की ओर से पहली बार सामाजिक न्झाय का पिटारा खुला, जिसे आगे बढ़ाते हुए उनके पुत्र राहुल गांधी हिन्दू राष्ट्र की राह में सबसे बड़ी चुनौती बन गए हैं!
हिन्दू राष्ट्र की राह में एवरेस्ट् बनते : राहुल गांधी
अगर वर्ण- व्यस्थाधारित सामाजिक- आर्थिक व्यवस्था की राह में चुनौती खड़ी करने में नेहरु-गांधी परिवार में कोई कमी रह गई तो उसे पूरा करते दिख रहे हैं, राहुल गांधी, जिनमें लोग नेहरु- इंदिरा राजीव और सोनिया गांधी का मिलाजुला अक्स देख रहे है. भारत के इतिहास में एक महान जननायक के रूप में उभर चुके राहुल गांधी आज हिन्दू राष्ट्र की राह में एवरेस्ट बनकर खड़े हो गए. भारत के इतिहास में मनुवादी व्यवस्था के जरिये सामाजिक अन्याय का जो विशाल अध्याय रचित हुआ, उसकी उपलब्धि करते हुए राहुल गांधी ने घोषणा कर दिया है कि सामाजिक और आर्थिक अन्याय सबसे बड़ी समस्या है और सामाजिक न्याय लागू करके ही भारत को सुन्दर और समतामूलक बनाया जा सकता है. आज जननायक राहुल के जितनी आबादी उतना हक़ के नारे से भारत का चप्पा-चप्पा गूंज रहा है. जिस दिन कांग्रेस सत्ता में आई, राहुल गांधी का जितनी आबादी उतना हक़ सिद्धांत 90 % वंचित हिन्दुओं को शक्ति के स्रोतों में वाजिब हिस्सेदारी सु निश्चित करा देगा तब संघ का थोड़े से सुविधाभोगी वर्ग के हिन्दुओं में शक्ति के समस्त स्रोत सौंपने का सपना धूलिसात हो जायेगा. ऐसा न हो, इसके लिए संघ देश में वह माहौल बनाने जुट गया है जो महात्मा गांधी की हत्मा के पूर्व बनाया था.
