UGC regulation 2026: हिन्दुवादियों का बेनकाब चेहरा
UGC regulation 2026: आज जब यूजीसी बिल लागू किया गया। जिस पर जिस तरह से देश भर के श्रेष्ठ जाति के मानसिकता वाले लोग यूजीसी बिल का विरोध कर रहे हैं
अलखदेव प्रसाद ‘अचल’
न्यूज़ इंप्रेशन, संवाददाता
Bokaro: हिंदुत्व को बचाने के लिए जो यह राग अलापते रहते हैं कि हम सब हिंदू एक हैं। हमें एकजुट रहना चाहिए, ताकि हमलोग हिन्दू राष्ट्र बना सकें। वैसे लोगों का समय-समय पर चेहरा भी बेनकाब होते रहा है। आज जब यूजीसी बिल लागू किया गया। जिस पर जिस तरह से देश भर के श्रेष्ठ जाति के मानसिकता वाले लोग यूजीसी बिल का विरोध कर रहे हैं, उससे एक बार फिर उनके चेहरे बेनकाब दिखने लगे हैं। जिनके चेहरे बेनकाब दिखने लगे हैं, उनमें सिर्फ ऐसा नहीं है कि सिर्फ सवर्ण जातियों में सिर्फ लुच्चे -लफंगें और सिरफिरे लोग ही हैं, बल्कि इसमें सवर्ण जाति के बड़े-बड़े नेता, अफसर और हिंदुत्व के हिमायती लोग भी हैं। जिन्हें जब भी सरकार की ओर से पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों को कुछ अधिकार दिए जाते हैं, तो ऐसे लोगों के पेट में दर्द होने लगते हैं। जो खास करके चुनाव के समय यह कहा करते हैं कि गर्व से कहो हम हिंदू हैं, उनके भी चेहरे बेनकाब होते दिखते हैं। जो अपने को प्रगतिशील सोच के कहते हैं, वे बिल का समर्थन करने के बजाय ख़ामोश हो जाते हैं, मानों हम कुछ जान ही नहीं रहे हैं।
यूजीसी बिल के विरोध करने का कोई मायने ही नहीं
यूजीसी के बिल का विरोध करने का कोई मायने ही नहीं है। क्योंकि अगर यूजीसी सवर्णों के अधिकारों को छीनकर पिछड़े, दलित, आदिवासी एवं अल्पसंख्यकों को अधिकार दे देता, तो एक बात भी होती, परंतु ऐसा भी नहीं है। बिल है ‘समता के संवर्द्धन से संबंधित विनिमय 2026’। जिसका मुख्य उद्देश्य देश भर के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में जाति आधारित भेद भाव को रोकना है। ताकि किसी भी प्रोफेसर या विद्यार्थी को जाति, लिंग, संप्रदाय, भाषा, क्षेत्र और दिव्यांगता के आधार पर भेद भाव नहीं किया जा सके।किसी भी उच्च शिक्षण संस्थानों में पिछड़े, दलित, आदिवासी व अल्पसंख्यक जातियों को भी समान अधिकार मिलेंगे। ऐसे लोगों के साथ अगर ऊंची जाति के लोग कोई दुर्व्यवहार करेंगे, भेद-भाव करेंगे, अपशब्द बोलेंगे या उपेक्षित सा व्यवहार करेंगे या फिर निम्न जाति के होने की वजह से उन्हें प्रताड़ित करेंगे, तो ऐसी स्थिति में इन जाति के लोग वैसे लोगों के विरुद्ध शिकायत दर्ज कर सकते हैं। आखिर इससे सवर्ण जातियों को नुकसान कैसे होगा कि हाय-तौबा मचा रहे हैं? सच तो यह है कि ऐसे संस्थानों में जैसे उनलोग पहले से मनमानी करते रहे हैं, उसी तरह की मनमानी करना चाहते हैं। विरोध का असली कारण यही है।
आजादी के बाद से ही छल-छद्म से राजसत्ता पर हैं काबिज
फिर भी पेट में अगर दर्द हो रहे हैं, तो कोई बात तो होगी। तो बात यह है कि आजादी के बाद से सभी संप्रदाय, समुदायों और जातियों को संविधान में समानता का अधिकार तो दे दिया है, परंतु ऐसा व्यावहारिक रूप में देखा नहीं जाता है। क्योंकि आजादी के बाद से ही उनलोग छल-छद्म से राजसत्ता पर काबिज हैं। जहॉं भी ऊंचे-ऊंचे पदों पर बैठे सवर्ण जाति के लोग हैं। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में भी सवर्ण जाति के लोग काबिज हैं। वहां निम्न जाति के प्रोफेसरों को तो उपेक्षा की दृष्टि से देखते ही हैं विद्यार्थियों के साथ भी भेद-भाव रखते रहे हैं। ऐसी ही प्रताड़ना के कारण रोहित बेमुला जैसे होनहार युवक को अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेनी पड़ी थी। ऐसी घटनाएं आज भी आए दिन देखने सुनने के लिए मिलती रहती हैं। चूंकि वैसे संस्थानों में या पुलिस महकमे में अधिकांश तो उन्हीं लोग रहते हैं, इसलिए न्याय भी नहीं मिल पाता है। निम्न जाति के लड़कों के साथ परीक्षा हो या साक्षात्कार हो, इन जगहों पर उनके साथ भेदभाव होते रहे हैं।फलस्वरुप योग्यता के बावजूद भी निम्न जाति के विद्यार्थियों को हाशिए पर धकेल दिया जाता रहा है यह सिलसिला आज भी जारी है। ऊंचे-ऊंचे पदों पर सवर्ण जाति के लोग ही कुंडली मारकर बैठे हैं।
सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण दिया गया, तो जाति के लोग विरोध प्रदर्शन नहीं किए
अगर यूजीसी बिल लागू होता है, तो स्वाभाविक रूप से विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों में या उनसे ऊंचे पदों पर जो, पिछड़े, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यकों के लिए जो आरक्षित सीटें हैं, उन्हें भरनी पड़ेगी। जब सीटें भरी जाएगी, तो स्वाभाविक रूप से निम्न जातियों की संख्या बढ़ेगी। उनलोगों का वर्चस्व समाप्त होगा। सवर्णों को पेट में दर्द होने का मूल कारण यही है। जबकि ऐसी घटिया सोच पिछड़ी, दलित, आदिवासी जाति की कभी नहीं रही। जब सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण दिया गया था, तो इधर जाति के लोग विरोध प्रदर्शन नहीं करने गए थे। इससे वैसे पिछड़े, दलित, आदिवासी जातियों को सीख लेने की जरूरत है कि चुनाव के समय में तो वही सवर्ण जाति के लोग हमें गर्व से हिंदू कहने के लिए कहते हैं। यह भी नसीहत देते हैं कि बॅंटेंगे तो कटेंगे।यह भी बोला करते हैं कि हम सभी हिंदू समान है। परंतु जहॉं अधिकार की बात आती है, वहॉं दुश्मन मानते हुए विरोध करने पर उतारू हो जाते हैं। जो साबित करता है कि यहॉं के सवर्ण जाति के लोग पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों के हितैषी नहीं हैं।वे लोग कभी नहीं चाहते हैं कि यहॉं के पिछड़े, दलित, आदिवासी जाति के लोग किसी चीज में बराबरी कर सकें। उन लोगों को भी समाज में मान-सम्मान मिल सकें।
सवर्णों की धूर्ततापूर्ण नीयत को पहचानने की जरूरत
स्वाभिमान के साथ जी सकें, योग्यता के अनुसार ऊंचे -ऊंचे पदों पर आसीन हो सकें। पेट में दर्द होने का असली कारण यही है। सवर्णों की धूर्ततापूर्ण इस नीयत को पहचानने की जरूरत है। इसीलिए तो ये धूर्त लोग पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों को मुसलमानों से नफरत करने के लिए उकसाते रहते हैं, ताकि असली दुश्मन हमलोगों को न मानकर मुसलमानों को मानने लगें।उसी में उलझे रहें। वे लोग सत्ता के मामले में भी जानते हैं कि देश में हम लोगों की जनसंख्या मुश्किल से 10 से 15% के बीच ही है। फिर भी हिंदुत्व के नाम पर या फिर और नाम पर सत्ता पर वर्चस्व स्थापित किए हुए हैं न? चाहे कांग्रेस की सरकार रही हो या बीजेपी की सरकार है। देखने में भले ही लग रहा हो कि पिछड़ी जाति का मोदी प्रधानमंत्री है, पर सच यह है कि बड़े-बड़े मंत्री सवर्ण जाति के ही हैं। अधिकांश मंत्रियों के सचिव सवर्ण जाति के लोग ही हैं। ऊंचे ऊंचे संस्थानों में ऊंचे-ऊंचे पदों पर अधिकांश सवर्ण जाति के लोग ही भरे हुए हैं। ऊंची जाति के लोग इसी तरह का वर्चस्व स्थापित रखे रखना चाहते हैं। एक छल-छद्म के सहारे पिछड़ी, दलित और आदिवासी लोगों के मुंह से ही, बेबुनियादी आरोप लगाकर उनसे दूरी बनवा देते हैं और आज तक सफल भी होते चले आ रहे हैं। उनकी इस चालाकी को समझे बिना न पिछड़े, दलित और आदिवासी जाति के लोगों का विकास हो सकता है और न उन्हें परास्त किया जा सकता है।

बेहतरीन आर्टिकल।दलित और ओ बी सी के कुछ लीडर समाज को 100 वर्ष पीछे धकेल दिया।
यू जी सी कानून कोर्ट के दबाव की वजह से बना है।
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