Kharsavan News : 1 जनवरी को काला दिवस के रूप में मनाते हैं आदिवासी समाज, खरसावां गोलीकांड के शहीदों को दी गई श्रद्धांजलि 

Kharsavan News : 1 जनवरी 1948 खरसावां गोलीकांड के शहीदों को आदिवासी समाज के द्वारा गुरुवार को सेक्टर 12 बिरसा बासा स्थित बिरसा-अंबेडकर प्रतिमा स्थल पर श्रद्धांजलि दी गई।

न्यूज इंप्रेशन, संवाददाता 

Bokaro : 1 जनवरी 1948 खरसावां गोलीकांड के शहीदों को आदिवासी समाज के द्वारा गुरुवार को सेक्टर 12 बिरसा बासा स्थित बिरसा-अंबेडकर प्रतिमा स्थल पर श्रद्धांजलि दी गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता रेंगो बिरूवा व संचालन झरीलाल पात्रा ने किया। मौके पर आदिवासी समाज के लोगों ने अपने वीर शहीदों को ससन बिड दिरी का प्रतीक फोटो पर फूल माला, दीप प्रज्वलित और दिरी दुल सुनुम (तेल डालकर) करके पारंपरिक तरीके से सुमन श्रद्धा अर्पित कर उनकी कुर्बानी को याद किया। इस दौरान शहीदों की याद में नारे लगाए। खरसावां गोलीकांड और कोल्हान सहित झारखंड के वीर शहीद अमर रहें, अमर रहें, पोटो हो, केरसा हो, पंडुवा हो, नाराह हो, बोड़ो हो जोरोंग जीत, जोरोंग जीत, जोरोंग जीत, कोचे हो, जोंकों हो, बोरजो हो, रितुई-गुनडुई हो अमर रहे, अमर रहे। वीर बिरसा, सिदो-कान्हो, जयपाल सिंह मुंडा का जय-जयकार करते हुए पुरखो के जेहान को सदैव जिंदा रखने का आह्वान किया। बताते चले कि आदिवासी हो समाज प्रत्येक वर्ष एक जनवरी को काला दिवस के रूप में मनाते है। संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि भारत की आजादी के करीब पांच महीने बाद जब देश एक जनवरी, 1948 को आजादी के साथ-साथ नए साल का जश्न मना रहा था तब खरसावां आजाद भारत के जलियांवाला बाग कांड का गवाह बन रहा था। उस दिन साप्ताहिक हाट का दिन था। उड़ीसा सरकार ने पूरे इलाके को पुलिस छावनी में बदल दिया था। खरसावां हाट में करीब पचास हजार आदिवासियों की भीड़ पर ओडिसा मिलिट्री पुलिस गोली चला रही थी। आजाद भारत का यह पहला बड़ा गोलीकांड माना जाता है। रेंगो बिरुवा ने कहा कि उस समय झारखंड अलग राज्य की मांग उफान पर था। सरायकेला- खरसावां को उड़ीसा में विलय के बजाय यथावत रखा जाए। झगड़ा इसी बात को लेकर था। ऐसे में पूरे कोल्हान इलाके से बूढ़े- बुढ़िया, जवान, बच्चे, सभी एक जनवरी को हाट- बाजार करने और जयपाल सिंह मुंडा को सुनने- देखने भी गए थे। लोग अलग झारखंड राज्य का नारा लगा रहे थे। जयपाल सिंह मुंडा के आने के पहले ही भारी भीड़ जमा हो गई थी। इसी दौरान गोली चलाया गया। चंद्रकांत पूर्ती ने कहा कि घटना के बाद इलाके में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया। शायद आज़ाद भारत में पहला मार्शल लॉ यहीं लगा था। कुछ दिनों बाद उड़ीसा सरकार ने देहात में बाँटने के लिए कपड़े भेजे, जिसे आदिवासियों ने लेने से इंकार कर दिया। लोगों के दिल में था कि ये सरकार हम लोगों पर गोली चलाई तो हम इसका दिया कपड़ा क्यों लें। वहीं मास्टर मुंडा ने उपस्थित सभी लोगों से आग्रह एवं निवेदन किया कि आदिवासी समाज अपने इतिहास को जानने की कोशिश करें। साथ ही नया साल के त्योहार को त्याग करते हुए अपने वीर शहीदों को नमन व याद करें। इस दौरान चंद्रकांत पूर्ति, विजय एक्का, मास्टर मुंडा, मंगल सोरेन, करन बिरुली, लालदेव महतो, रवि मुंडा, संदीप पूर्ति, सन्नी डूकरी, साहिल सुंडी, विनय हेंब्रम, बुधन लाल, प्रमोद कुमार, कुशनू शर्मा, दीपक सवैंया, अरुण समद, साइलेन मेलगांडी, पप्पू कच्छप आदि शामिल थे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *